‘समाज सेवा अनमोल है’: सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व CJI को ‘बचाने’ के लिए ₹1 करोड़ की फीस मांगने वाली वकील की याचिका खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को लखनऊ के एक वकील द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने केंद्र सरकार को ₹1 करोड़ की फीस और खर्चों का भुगतान करने का निर्देश देने की मांग की थी। वकील अशोक पांडे का दावा था कि यह राशि 2018 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) दीपक मिश्रा के समर्थन में छह मामले दायर करने के उनके प्रयासों के बदले देय है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने इस याचिका को “पूरी तरह से गलत” करार दिया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि याचिकाकर्ता के कार्य संस्थान की रक्षा के लिए थे, तो ऐसी “समाज सेवा” का मूल्यांकन पैसों में नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के मार्च 2023 के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। हाईकोर्ट ने पांडे की ₹1 करोड़ के भुगतान की मांग वाली याचिका को पहले ही खारिज कर दिया था।

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अशोक पांडे का यह दावा जनवरी 2018 में सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों द्वारा की गई ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद उनके द्वारा किए गए कानूनी हस्तक्षेपों से उपजा था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि उन्होंने तत्कालीन CJI दीपक मिश्रा की गरिमा की रक्षा के लिए छह अलग-अलग मामले दर्ज किए थे, क्योंकि “जज मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं कर सकते” और यह स्थापित मानदंडों के खिलाफ था।

जुलाई 2024 में, विधि एवं न्याय मंत्रालय ने भी ₹1 करोड़ की फीस के उनके दावे को आधिकारिक रूप से खारिज कर दिया था, जिसे उन्होंने हाईकोर्ट के फैसले के साथ चुनौती दी थी।

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“समाज सेवा अनमोल होती है”

सुनवाई के दौरान पांडे ने बेंच को बताया कि इन मामलों की पैरवी में उन्होंने व्यक्तिगत रूप से ₹2 लाख खर्च किए थे और इस कानूनी लड़ाई को जारी रखने के लिए अपनी बेटी से पैसे लिए थे।

हालांकि, बेंच ने याचिकाकर्ता के रुख और उनके पिछले आचरण पर सवाल उठाए। चीफ जस्टिस ने सुनवाई के दौरान पूछा, “जजों के खिलाफ हर तरह के आरोप लगाने के बाद, अब आप ‘माननीय’ शब्द का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं?”

संस्थान की रक्षा के नाम पर भारी भुगतान की मांग पर टिप्पणी करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा:

“आपने संस्थान के लिए समाज सेवा की। समाज सेवा हमेशा अनमोल होती है। इसका आकलन ₹1 करोड़ या 2 करोड़ में कैसे किया जा सकता है?”

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बेंच ने आगे कहा कि कोर्ट उनकी स्व-घोषित सेवा के लिए प्रशंसा तो कर सकता है, लेकिन निजी मुकदमों के लिए केंद्र के खिलाफ वित्तीय दावे की पुष्टि नहीं कर सकता। बेंच ने कहा, “यदि आप प्रशंसा चाहते थे, तो हम इसके लिए आपकी सराहना करते हैं।”

इस याचिका को खारिज करने के साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने वकील द्वारा उन मामलों के लिए सरकार से पेशेवर फीस प्राप्त करने के बहु-वर्षीय प्रयास को समाप्त कर दिया है जो उन्होंने स्वतंत्र रूप से शुरू किए थे। अदालत ने स्पष्ट किया कि “समाज सेवा” के रूप में किए गए कानूनी कार्यों से सार्वजनिक खजाने से मुआवजे का कोई अधिकार पैदा नहीं होता है।

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