केरल हाईकोर्ट ने एलडीएफ सरकार के विज्ञापनों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर राज्य से जवाब मांगा

केरल हाईकोर्ट ने गुरुवार को एलडीएफ सरकार द्वारा जारी विज्ञापनों को चुनौती देने वाली दो जनहित याचिकाओं पर राज्य सरकार से जवाब तलब किया। अदालत ने राज्य को 10 दिनों के भीतर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया कि इन याचिकाओं की सुनवाई न्यायालय में की जा सकती है या नहीं।

मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन और न्यायमूर्ति स्याम कुमार वी.एम. की खंडपीठ ने राज्य सरकार से इन याचिकाओं की मेंटेनेबिलिटी (सुनवाई योग्य होने) पर अपना पक्ष रखने को कहा। अदालत ने इस संबंध में 10 दिनों के भीतर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।

ये दोनों जनहित याचिकाएं उन विज्ञापनों को लेकर दायर की गई हैं, जिनमें आरोप है कि सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) सरकार ने अपने कामकाज को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया है और पूर्ववर्ती यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) सरकार को नकारात्मक रूप में दिखाया है।

पहली याचिका एर्नाकुलम जिला कांग्रेस कमेटी (डीसीसी) के अध्यक्ष मुहम्मद शियास ने अधिवक्ता अनूप वी. नायर के माध्यम से दाखिल की है। दूसरी याचिका एर्नाकुलम जिला पंचायत के पूर्व सदस्य शेरोन डी. पनक्कल ने दायर की है।

याचिकाओं में कहा गया है कि ये विज्ञापन आगामी केरल विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर जारी किए गए हैं।

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मुहम्मद शियास ने अपनी याचिका में दावा किया है कि ऐसे विज्ञापनों का प्रकाशन राज्य सरकार की ओर से “असंवैधानिक और रंगरूप बदलकर की गई शक्ति के प्रयोग” का उदाहरण है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकारी तंत्र और सार्वजनिक धन का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ हासिल करने के लिए किया जा रहा है।

याचिका में कहा गया है,
“सार्वजनिक धन जनता के भरोसे पर रखा गया एक सामूहिक संसाधन है। यदि इसका इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए किया जाता है तो इससे संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के सिद्धांत और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में समान अवसर की भावना प्रभावित होती है।”

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याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि ये विज्ञापन “राजनीतिक रूप से पक्षपातपूर्ण प्रकाशन” हैं, जिनके जरिए यह दिखाने की कोशिश की गई है कि यूडीएफ सरकार के समय राज्य की स्थिति गिरावट में थी, जबकि मौजूदा सरकार को उसकी उपलब्धियों के साथ सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है।

शेरोन डी. पनक्कल की याचिका में भी इसी प्रकार के आरोप लगाए गए हैं और सरकारी संसाधनों का राजनीतिक प्रचार के लिए उपयोग किए जाने पर सवाल उठाया गया है।

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अब अदालत राज्य सरकार के हलफनामे का इंतजार करेगी, जिसके बाद यह तय किया जाएगा कि इन जनहित याचिकाओं पर आगे सुनवाई की जाएगी या नहीं।

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