दिल्ली हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय राजधानी में वक्फ बोर्ड के गठन में हो रही लंबी देरी को लेकर केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार से जवाब तलब किया है। कोर्ट ने इस संबंध में दायर एक याचिका पर दोनों सरकारों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर अपना औपचारिक रुख स्पष्ट करने का निर्देश दिया है।
जस्टिस अनीश दयाल ने यह आदेश 8 सितंबर को जारी किया। मामले की अगली सुनवाई अब 10 दिसंबर को होगी।
अगस्त 2023 से लंबित है बोर्ड का पुनर्गठन
यह याचिका मोहम्मद शाहिद द्वारा दायर की गई है, जिसमें अधिकारियों को वक्फ अधिनियम 1995 (वर्ष 2025 में संशोधित) के तहत वैधानिक प्रक्रिया पूरी कर नए बोर्ड के गठन का निर्देश देने की मांग की गई है। मामले में याचिकाकर्ता का पक्ष वकील रिजवान अहमद, फिरोज खान गाजी, मोहम्मद वासिक खान, हिमांशु गुप्ता और मोहम्मद शोएब अंसारी ने रखा।
अदालत को अवगत कराया गया कि दिल्ली वक्फ बोर्ड का पिछला कार्यकाल अगस्त 2023 में ही समाप्त हो चुका है, लेकिन इसके बाद से नए बोर्ड के गठन के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। यद्यपि दिल्ली प्रशासन ने कामकाज संभालने के लिए जनवरी 2024 में एक प्रशासक की नियुक्ति जरूर की, लेकिन कानूनन अनिवार्य वैधानिक बोर्ड का गठन अब तक नहीं किया गया है।
याचिका के अनुसार, 2025 के संशोधनों के बावजूद संसद ने प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में वक्फ बोर्ड गठित करने के वैधानिक दायित्व को बरकरार रखा है। ऐसे में संबंधित प्राधिकारियों द्वारा बोर्ड का गठन न करना इस वैधानिक कर्तव्य का सीधा उल्लंघन है।
राजधानी की वक्फ संपत्तियों पर खतरे की आशंका
याचिका में आरोप लगाया गया है कि निर्वाचित व वैधानिक बोर्ड की गैर-मौजूदगी के कारण राजधानी भर में मौजूद करोड़ों की वक्फ संपत्तियों पर अतिक्रमण, अवैध कब्जे, अनाधिकृत हस्तांतरण, दुरुपयोग और बदहाली का गंभीर जोखिम बना हुआ है।
याचिका में कहा गया है कि मस्जिदें, कब्रिस्तान, मदरसे और धर्मार्थ संस्थाएं जो कानूनी निगरानी पर निर्भर हैं, उन्हें बोर्ड के अभाव में भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसके चलते मुस्लिम समुदाय के लोग, नमाजी और इन संस्थानों के लाभार्थी संसद द्वारा तय सुरक्षा उपायों से वंचित हो रहे हैं।
कानून के शासन का उल्लंघन
अदालत में यह दलील भी रखी गई कि कार्यपालिका अपनी निष्क्रियता के जरिए संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून को निष्प्रभावी नहीं बना सकती। याचिकाकर्ता का कहना था कि जब संसद ने स्पष्ट रूप से वैधानिक बोर्ड के गठन का आदेश दिया है, तो सरकारी प्राधिकारी एक उचित समय सीमा के भीतर यह प्रक्रिया पूरी करने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य हैं। इस तरह की अनिश्चितकालीन देरी मनमानी प्रशासनिक विफलता है और यह सीधे तौर पर कानून के शासन को कमजोर करती है।

