फर्जी शस्त्र लाइसेंस मामला: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने विभागीय जांच पर रोक लगाने से किया इनकार, कलेक्ट्रेट कर्मी की याचिका खारिज

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भिंड जिले के कथित फर्जी शस्त्र लाइसेंस मामले में कलेक्ट्रेट की एक कर्मचारी के खिलाफ चल रही विभागीय जांच पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कर्मचारी की याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी के विरुद्ध आपराधिक मुकदमा लंबित होने मात्र से आंतरिक अनुशासनात्मक कार्यवाही पर रोक नहीं लगाई जा सकती।

कलेक्ट्रेट की शस्त्र शाखा में पदस्थ सहायक ग्रेड-3 कर्मचारी मधुबाला मौर्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस आनंद सिंह बहरावत ने कहा कि सामान्य तौर पर आपराधिक मुकदमा और विभागीय जांच दोनों समानांतर रूप से जारी रह सकते हैं। अदालत ने रेखांकित किया कि पुलिस ने इस मामले में एफआईआर 10 जनवरी को दर्ज की थी, जबकि विभागीय जांच पहले से ही चल रही थी। अदालत के अनुसार, केवल आरोपों की समानता या आपराधिक मामले के विचाराधीन होने के आधार पर विभागीय जांच स्थगित नहीं की जा सकती।

दोनों कार्यवाहियों के कानूनी मानक अलग

याचिकाकर्ता मधुबाला मौर्य ने हाईकोर्ट में 22 जुलाई के आदेश को चुनौती देते हुए गुहार लगाई थी कि जब तक भिंड के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत में विचाराधीन आपराधिक मुकदमे का निपटारा नहीं हो जाता, तब तक उनके खिलाफ चल रही विभागीय जांच रोक दी जाए।

याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता निर्मल शर्मा ने दलील दी कि दोनों कार्यवाहियां एक जैसे आरोपों, गवाहों और सबूतों पर टिकी हैं। उन्होंने कहा कि दोनों प्रक्रियाएं एक साथ चलने से आपराधिक मुकदमे में याचिकाकर्ता के बचाव के अधिकार पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।

READ ALSO  कर्नाटक हाईकोर्ट ने दूसरे उप-लोकायुक्त पर सरकार को नोटिस जारी किया

इसके विपरीत, राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता मोनिका मिश्रा ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि आपराधिक अभियोजन और विभागीय जांच दोनों की कानूनी प्रकृति स्वतंत्र है। दोनों में दोष साबित करने के पैमाने अलग-अलग होते हैं, इसलिए दोनों का एक साथ चलना पूरी तरह विधिक है।

सबूतों के पैमाने अलग: सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जो यह साबित करे कि विभागीय जांच जारी रहने से याचिकाकर्ता के आपराधिक बचाव पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। अदालत ने पाया कि इस मामले में कानून या तथ्यों के ऐसे कोई गंभीर व जटिल प्रश्न शामिल नहीं हैं, जिसके चलते अदालत को असाधारण हस्तक्षेप करते हुए जांच पर रोक लगानी पड़े।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि दोनों कार्यवाहियों के उद्देश्य, दायरे और साक्ष्य के स्तर में बुनियादी अंतर होता है। आपराधिक मुकदमे में अभियोजन को अपराध ‘संदेह से परे’ साबित करना होता है, जबकि अनुशासनात्मक जांच में निर्णय ‘संभावनाओं की प्रबलता’ के आधार पर लिए जाते हैं। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में याचिकाकर्ता का यह तर्क मान्य नहीं है कि विभागीय जांच के दौरान आपराधिक कार्रवाई शुरू होने पर जांच रोक दी जानी चाहिए।

READ ALSO  विक्की कौशल और कैटरीना कैफ को जान से मारने की धमकी देने वाले शख्स को दो दिन की पुलिस हिरासत में भेजा गया

भिंड शस्त्र शाखा का पृष्ठभूमि घटनाक्रम

मामले के तथ्यों के मुताबिक, मधुबाला मौर्य प्रतियोगी परीक्षा में चयन के बाद वर्ष 2017 में सहायक ग्रेड-3 पद पर नियुक्त हुई थीं। जुलाई 2024 में उनका स्थानांतरण कलेक्ट्रेट की शस्त्र शाखा में किया गया था। मौर्य का दावा है कि बार-बार आग्रह के बावजूद उनके पूर्ववर्ती कर्मचारी ने उन्हें पद का औपचारिक प्रभार नहीं सौंपा था।

इसी वर्ष जनवरी में पुलिस ने भिंड जिले में फर्जी शस्त्र लाइसेंस जारी किए जाने के संबंध में एफआईआर दर्ज की, जिसमें कई लाइसेंस वर्ष 2015 से जुड़े पाए गए। इसके बाद मौर्य के खिलाफ आपराधिक मामले और विभागीय जांच दोनों में आरोप पत्र (चार्जशीट) दायर किए गए थे।

READ ALSO  "डिक्री का निष्पादन न होना न्याय का उपहास है": सुप्रीम कोर्ट ने 8.8 लाख लंबित मामलों पर जताई चिंता, निपटारे के लिए 6 महीने की और मोहलत दी
Ad 20- WhatsApp Banner

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles