‘असामाजिक तत्व’ बताकर आवाजाही पर रोक लगाना पड़ा भारी, पटना हाईकोर्ट ने दो लोगों को ₹1-1 लाख मुआवजा देने का दिया निर्देश

पटना हाईकोर्ट ने बिना उचित सत्यापन के दो लोगों को “असामाजिक तत्व” घोषित कर उनकी आवाजाही पर पाबंदी लगाने के बिहार सरकार के फैसले को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने दोनों याचिकाकर्ताओं को ₹1-1 लाख मुआवजा और ₹10-10 हजार मुकदमे के खर्च के रूप में देने का निर्देश दिया है।

जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस सुनील दत्ता मिश्रा की डिवीजन बेंच ने 11 सितंबर के अपने आदेश में पाया कि संबंधित अधिकारियों ने आरोपों की पुष्टि किए बिना जल्दबाजी में कार्रवाई की। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को मुआवजे और मुकदमे की लागत की रकम जिम्मेदार अधिकारियों से वसूलने का भी निर्देश दिया है। हालांकि, वसूली से पहले अधिकारियों को सुनवाई का अवसर देना होगा।

पुलिस की सिफारिश पर शुरू हुई थी कार्रवाई

मामला शशि कुमार उर्फ फुकन और अजय सिंह से जुड़ा है। पिछले साल विधानसभा चुनाव के दौरान राजगीर के अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी (SDPO) की रिपोर्ट के आधार पर नालंदा के पुलिस अधीक्षक ने दोनों को “असामाजिक तत्व” के रूप में दर्ज करने की सिफारिश की थी।

याचिकाकर्ताओं ने इस कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि उन्हें आपराधिक मामलों में झूठा फंसाया गया था और उन मामलों में उन्हें पहले ही जमानत मिल चुकी थी।

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इसके बाद बिहार अपराध नियंत्रण अधिनियम के तहत उनके खिलाफ कार्यवाही शुरू की गई। नालंदा के जिलाधिकारी ने 10 सितंबर, 2025 को दोनों को कारण बताओ नोटिस जारी कर सक्षम अधिकारियों के समक्ष उपस्थित होने को कहा।

बाद में जिलाधिकारी ने यह कहते हुए उनके खिलाफ आदेश पारित किया कि वे अपने बचाव में कोई ठोस सामग्री पेश नहीं कर सके और उनकी स्वतंत्र आवाजाही से इलाके में कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा हो सकती है।

हाईकोर्ट ने आदेशों को बताया ‘कट-एंड-पेस्ट’ प्रकृति का

हाईकोर्ट ने जिलाधिकारी के आदेशों की भाषा और उनमें दिए गए आधारों पर गंभीर सवाल उठाए। बेंच ने पाया कि ऐसे ही शब्दों और आधारों का इस्तेमाल कई अन्य आदेशों में भी किया गया था, जिन्हें कोर्ट पहले देख चुका है।

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कोर्ट ने कहा कि लगभग एक जैसे शब्दों में पारित किए गए ऐसे आदेश प्रथम दृष्टया यह धारणा पैदा करते हैं कि उन्हें विवेकपूर्ण तरीके से विचार किए बिना पारित किया गया।

बेंच ने यह भी पाया कि कारण बताओ नोटिस जारी करते समय और अंतिम आदेश पारित करते समय जिलाधिकारी ने “असामाजिक तत्व” की परिभाषा पर उचित रूप से विचार नहीं किया।

कोर्ट के मुताबिक, जिलाधिकारी ने केवल अनुमान और आशंकाओं के आधार पर यह मान लिया कि याचिकाकर्ता विधानसभा चुनाव के दौरान कानून-व्यवस्था बिगाड़ सकते हैं। उनके खिलाफ ऐसी कोई सामग्री नहीं थी जिससे यह साबित हो कि उन्होंने पहले कभी सार्वजनिक व्यवस्था में बाधा डाली थी।

तीन महीने तक आवाजाही पर लगी थी पाबंदी

दोनों याचिकाकर्ताओं की आवाजाही तीन महीने के लिए सीमित कर दी गई थी। उन्हें सप्ताह में तीन बार सिलाव पुलिस स्टेशन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का निर्देश दिया गया था, जो करीब 40 किलोमीटर दूर था।

हाईकोर्ट ने पाया कि पुलिस डायरी में दर्ज आरोपों की पुष्टि के लिए कोई सत्यापन रिपोर्ट या अन्य सामग्री पेश नहीं की गई थी।

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बेंच ने कहा कि संबंधित पुलिस अधीक्षक, अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी और थाना प्रभारी ने आरोपों की उचित जांच और सत्यापन किए बिना “जल्दबाजी में” कार्रवाई की।

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाकर्ताओं के खिलाफ की गई कार्रवाई को रद्द कर दिया और प्रत्येक को ₹1 लाख मुआवजा तथा ₹10,000 मुकदमे का खर्च देने का निर्देश दिया। साथ ही राज्य सरकार से कहा कि संबंधित अधिकारियों को सुनवाई का मौका देने के बाद यह रकम दोषी अधिकारियों से वसूली जाए।

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