किसी भी व्यक्ति को आधिकारिक दस्तावेजों में दो अलग-अलग जन्मतिथियों के साथ रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, भले ही तय समय सीमा बीत चुकी हो। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग (एनआईओएस) को निर्देश दिया है कि वह एक पूर्व छात्र के रिकॉर्ड में दर्ज जन्मतिथि की लिपिकीय त्रुटि को दुरुस्त करे और उसे नए प्रमाण पत्र जारी करे।
जस्टिस जसमीत सिंह की पीठ ने 16 सितंबर के अपने आदेश में स्पष्ट किया कि प्रशासनिक सुविधा का तर्क अपनी जगह सही हो सकता है, लेकिन यह किसी वैधानिक शैक्षणिक संस्थान की उस जिम्मेदारी से ऊपर नहीं हो सकता, जिसके तहत उसे सार्वजनिक रिकॉर्ड को सही रखना होता है। कोर्ट ने रेखांकित किया कि यदि इस टाइपिंग की गलती को ठीक नहीं किया गया, तो याचिकाकर्ता के पास कानूनी रूप से दो अलग-अलग जन्मतिथियां हो जाएंगी, जो न केवल अव्यावहारिक है बल्कि कानून की दृष्टि से भी अनुचित है।
जन्मतिथि के विवाद का पूरा मामला
याचिकाकर्ता ने साल 2005 में एनआईओएस से दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। बोर्ड की ओर से जारी अंकपत्र और प्रमाण पत्र में उसकी जन्मतिथि 10 फरवरी 1989 दर्ज हो गई थी।
छात्र का कहना था कि यह केवल टाइपिंग की भूल थी, जबकि उसकी वास्तविक जन्मतिथि 10 फरवरी 1990 है। उसके मूल जन्म प्रमाण पत्र, पूर्व स्कूल के रिकॉर्ड, ट्रांसफर सर्टिफिकेट और अन्य सभी सरकारी पहचान पत्रों में 10 फरवरी 1990 की तारीख ही दर्ज है।
दफ्तरों से अदालतों तक लंबी कानूनी लड़ाई
याचिकाकर्ता ने रिकॉर्ड दुरुस्त कराने के लिए सबसे पहले 13 अगस्त 2018 को एनआईओएस से संपर्क किया था। उस समय संस्थान ने यह कहते हुए अर्जी खारिज कर दी कि आवेदन तय समय सीमा समाप्त होने के बाद दिया गया है। छात्र ने इस फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन 8 मार्च 2019 को उसकी याचिका खारिज हो गई।
इसके बाद 6 जुलाई 2022 को एनआईओएस ने अपने नियमों में संशोधन किया, जिसके तहत वास्तविक लिपिकीय और तथ्यात्मक गलतियों को सुधारने का प्रावधान जोड़ा गया। नए नियमों के आधार पर छात्र ने जरूरी दस्तावेजों के साथ 14 अक्टूबर 2025 को दोबारा आवेदन दाखिल किया। हालांकि, जब संस्थान ने नए आवेदन पर कोई फैसला नहीं लिया, तो उसे इंसाफ के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें और फैसला
सुनवाई के दौरान एनआईओएस की ओर से पेश वकील एस. राजप्पा और गौरीशंकर ने तर्क दिया कि छात्र का पंजीकरण 2005 का है। तत्कालीन नियमों के अनुसार जन्मतिथि में सुधार की मांग पहली परीक्षा से पहले या पंजीकरण की तारीख से तीन साल के भीतर ही की जा सकती थी। उनका कहना था कि आवेदन काफी देर से आया है, इसलिए यह समय सीमा के नियम के तहत खारिज होने योग्य है।
दूसरी तरफ, याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील सुरीति चौधरी और तान्या शर्मा ने दलील दी कि यह केवल एक लिपिकीय चूक है। उन्होंने कहा कि मौजूदा कानूनी स्थिति के मुताबिक, जब छात्र के पास प्रामाणिक सरकारी दस्तावेज मौजूद हों, तो शैक्षणिक रिकॉर्ड में वास्तविक सुधार को अत्यधिक तकनीकी आधारों पर नहीं रोका जा सकता।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह दर्ज किया कि एनआईओएस ने खुद माना है कि याचिकाकर्ता का मामला 14 मई 2026 की अधिसूचना के दायरे में आता है, जिसमें बिना किसी समय सीमा की पाबंदी के जन्मतिथि सुधारने की अनुमति दी गई है। अदालत ने कहा कि संस्थान को मौजूदा नियमों के तहत याचिकाकर्ता के आवेदन पर विचार करना होगा। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने छात्र की मांग स्वीकार करते हुए संस्थान को रिकॉर्ड सुधारने का आदेश जारी कर दिया।

