अदालती पोर्टल्स में आने वाली तकनीकी खामियों से वादियों के अधिकारों की रक्षा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी न्यायाधिकरण के ई-फाइलिंग सिस्टम में खराबी के कारण अपील दायर करने में वैधानिक मियाद (लिमिटेशन) से देरी हो जाती है, तो किसी पीड़ित पक्ष को बिना किसी कानूनी उपाय के नहीं छोड़ा जा सकता। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें ओटीपी (वन-टाइम पासवर्ड) न आने की तकनीकी खराबी के चलते एक दिन की देरी होने पर दिवाला एवं दिवालियापन संहिता, 2016 (आईबीसी) के तहत दायर अपील खारिज कर दी गई थी। शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि ऐसी स्थितियों में न्यायाधिकरणों को विधिक सिद्धांत ‘एक्टस क्यूरी नेमीनेम ग्रेवाबिट’ (अदालत के किसी कृत्य से किसी का अहित नहीं होना चाहिए) लागू करना चाहिए और ई-फाइलिंग के पहले वास्तविक प्रयास की तारीख को ही अपील पेश करने की मूल तारीख मानना चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला रोल्टा इंडिया लिमिटेड की कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया से जुड़ा है। 15 दिसंबर 2025 को राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी), मुंबई ने अशदान प्रॉपर्टीज प्राइवेट लिमिटेड द्वारा पेश की गई समाधान योजना (रिजॉल्यूशन प्लान) को मंजूरी दे दी थी। इस आदेश से असंतुष्ट होकर रीजनल प्रोविडेंट फंड कमिश्नर-II ने आईबीसी की धारा 61(1) के तहत एनसीएलएटी में अपील दायर करने का निर्णय लिया।
आईबीसी की धारा 61(2) के अनुसार, आदेश के खिलाफ अपील 30 दिनों के भीतर दायर की जानी आवश्यक है। वहीं, इसके परंतुक (प्रोविजो) के तहत पर्याप्त कारण दर्शाने पर 15 दिनों की अतिरिक्त छूट दी जा सकती है। इस मामले में 30 दिनों की मूल वैधानिक अवधि 14 जनवरी 2026 को समाप्त हो गई थी, जबकि मियाद छूट की 15 दिनों की अधिकतम समय-सीमा 29 जनवरी 2026 को खत्म हो रही थी।
निर्धारित मियाद के भीतर अपील दाखिल करने के लिए अपीलकर्ता के वकील ने 28 जनवरी 2026 को ही एनसीएलएटी के पोर्टल पर ई-फाइलिंग का प्रयास किया। हालांकि, पोर्टल में तकनीकी खामियों के कारण अपील फाइल नहीं हो सकी। अपीलकर्ता ने 29 जनवरी 2026 को भी पूरे प्रयास किए, लेकिन एनसीएलएटी की रजिस्ट्री ने बताया कि बैकएंड में तकनीकी खराबी आ गई है जिसे ठीक करने में समय लग रहा है। नतीजतन, अपील अंततः 30 जनवरी 2026 को ही अपलोड हो सकी—जो कि अधिकतम 45 दिनों की वैधानिक छूट सीमा से केवल एक दिन अधिक थी।
एनसीएलएटी के समक्ष कार्यवाही
अपीलकर्ता ने तकनीकी विफलता का ब्योरा देते हुए एक दिन की इस देरी को माफ करने के लिए अर्जी लगाई। 21 मई 2026 को एनसीएलएटी ने इस अर्जी को खारिज करते हुए अपील को समय-सीमा समाप्त होने (टाइम-बार्ड) के आधार पर निरस्त कर दिया।
एनसीएलएटी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों—संजय पांडुरंग कालते बनाम विस्ट्रा आईटीसीएल (इंडिया) लिमिटेड व अन्य तथा वी नागराजन बनाम एसकेएस इस्पात एंड पावर लिमिटेड व अन्य—का हवाला देते हुए कहा कि मियाद की गणना आदेश सुनाए जाने की तारीख से शुरू होती है। साथ ही, नेशनल स्पॉट एक्सचेंज लिमिटेड बनाम अनिल कोहली और टाटा स्टील लिमिटेड बनाम राज कुमार बनर्जी व अन्य के मामलों का संदर्भ देते हुए अपीलीय न्यायाधिकरण ने माना कि धारा 61(2) के तहत तय 30 + 15 दिनों की निर्धारित अवधि से अधिक की किसी भी देरी को माफ करने का उसके पास कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का रुख और टिप्पणियां
एनसीएलएटी के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। मामले की सुनवाई के दौरान रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल की ओर से कैविएट पर वकील पेश हुए। शीर्ष अदालत के समक्ष एनसीएलएटी रजिस्ट्री द्वारा 6 मई 2026 को प्रस्तुत एक रिपोर्ट रिकॉर्ड पर आई। यह रिपोर्ट न्यायाधिकरण के निर्देश पर ही तैयार की गई थी, जिसमें पुष्टि हुई कि अपीलकर्ता ने 28 जनवरी 2026 से ही ई-फाइलिंग के निरंतर प्रयास किए थे, लेकिन ओटीपी न आने की तकनीकी खराबी के चलते 30 जनवरी 2026 से पहले अपील फाइल नहीं हो सकी थी।
अपील खारिज होने के इस अनूठे कारण पर जस्टिस दत्ता ने टिप्पणी की:
“अपीलकर्ता को किसी विपक्षी वकील ने पराजित नहीं किया। बल्कि, ‘वन-टाइम पासवर्ड’ (ओटीपी) के न आने ने यह तय कर दिया कि अपीलकर्ता को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए और इस तरह उसका भविष्य तय कर दिया गया।”
अदालत का कानूनी विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने इस स्थापित सिद्धांत की फिर पुष्टि की कि आईबीसी के तहत निर्धारित समय-सीमाओं का कड़ाई से पालन होना चाहिए और धारा 61(2) न्यायाधिकरण को 45 दिनों से अधिक की देरी माफ करने का कोई विशेषाधिकार नहीं देती। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन फैसलों पर एनसीएलएटी ने भरोसा किया, उनकी परिस्थितियां बिल्कुल अलग थीं। नेशनल स्पॉट एक्सचेंज लिमिटेड में किसी पक्षकार की व्यक्तिगत कठिनाई को वैधानिक मियाद लांघने का आधार नहीं माना गया था, जबकि टाटा स्टील लिमिटेड का मामला एक शेयरधारक द्वारा कानून की गलत समझ के कारण देरी से फाइलिंग का था।
तीन जजों की पीठ के फैसले रीजनल मैनेजर बनाम पवन कुमार दुबे का हवाला देते हुए अदालत ने कहा:
“किसी मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर कानून के अनुप्रयोग से निकलने वाला नियम ही उसका ‘रेशियो डेसीडेंडी’ (निर्णय का आधार) बनता है, न कि ऐसे निष्कर्ष जो समान प्रतीत होने वाले तथ्यों पर आधारित हों। एक अतिरिक्त या भिन्न तथ्य दो मामलों के निष्कर्षों में जमीन-आसमान का अंतर ला सकता है, भले ही दोनों मामलों में समान तथ्यों पर एक जैसे सिद्धांत लागू किए गए हों।”
मामले के मुख्य प्रश्न को रेखांकित करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:
“क्या किसी वादी को पहली ही बार में केवल इसलिए बाहर का रास्ता दिखा दिया जाना चाहिए क्योंकि अपील वैधानिक रूप से स्वीकार्य अवधि के बाद ई-फाइल की गई, विशेष रूप से तब जब ऐसी देरी वादी के नियंत्रण से बाहर वास्तविक कारणों से हुई हो और जब पूरी गलती एनसीएलएटी की रजिस्ट्री के स्तर पर थी? हम ऐसा नहीं मानते!”
अदालत ने रेखांकित किया कि जैसे-जैसे न्यायपालिका तेजी से डिजिटल हो रही है, वादी के नियंत्रण से बाहर की तकनीकी दिक्कतों से होने वाली देरी की बारीकी से जांच करना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। डिजिटल व्यवस्था में मियाद के सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए पीठ ने कहा:
“कानून पूरी तरह स्थापित है कि किसी वादी के खिलाफ मियाद की गणना केवल तभी चलती है जब अदालत या न्यायाधिकरण खुला और कार्यशील हो, यानी वह पीड़ित पक्ष द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले वादपत्रों को स्वीकार करने में सक्षम हो। जब अदालत या न्यायाधिकरण का सिस्टम ही उन कागजातों को स्वीकार करने में विफल रहता है, जिन्हें वास्तविक रूप से और निर्धारित समय के भीतर पेश करने की कोशिश की गई थी, तो वादी को इस भ्रामक आधार पर बिना किसी कानूनी उपचार के नहीं छोड़ा जा सकता कि अदालत के पास देरी माफ करने की शक्ति नहीं है।”
पीठ ने स्पष्ट किया कि अपीलकर्ता की अर्जी वास्तव में केवल देरी माफी की नहीं थी, बल्कि उसका अंतर्निहित आशय यह था कि जितने समय तक ई-फाइलिंग पोर्टल ठप रहा, उस अवधि को मियाद की गणना से बाहर रखा जाए। अदालत ने माना कि इसके लिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश VII नियम 6 के सिद्धांतों को लागू किया जा सकता है। अदालत ने ए.आर. अंतुले बनाम आर.एस. नायक में संविधान पीठ के उस फैसले का भी उल्लेख किया जहां संस्थागत विसंगतियों को सुधारने के लिए ‘एक्टस क्यूरी नेमीनेम ग्रेवाबिट’ का सहारा लिया गया था।
अदालत ने कहा:
“न्याय का तकाजा यही था कि न्यायाधिकरण अपने स्तर पर सिस्टम की विफलता को स्वीकार करे, उसमें सुधार करे और ई-फाइलिंग के पहले वास्तविक प्रयास की तारीख को ही प्रस्तुति की तारीख मानते हुए अपील को मियाद की निर्धारित अवधि के भीतर दर्ज करने का निर्देश दे। ऐसे निर्देश के अभाव में, यह वादी को अदालत के कृत्य (एक्टस क्यूरी) की सजा भुगतने पर मजबूर करने जैसा होगा।”
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
एनसीएलएटी के आदेश को न्याय का हनन मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और 21 मई 2026 के आदेश को निरस्त कर दिया।
शीर्ष अदालत ने मूल अपील (कंपनी अपील (एटी) (इन्स) संख्या 503/2026) और देरी माफी अर्जी (आई.ए. संख्या 1951/2026) को एनसीएलएटी के समक्ष पुनः बहाल कर दिया। न्यायाधिकरण को निर्देश दिया गया कि वह देरी माफी की अर्जी का जल्द से जल्द निपटारा करे और यह देखे कि क्या 30 दिनों के बाद के विलंब के लिए पर्याप्त कारण मौजूद थे। अदालत ने कहा कि यदि यह निर्णय अपीलकर्ता के पक्ष में आता है, तो अपील को विधिवत पंजीकृत कर कानून सम्मत तरीके से निपटाया जाए। दोनों पक्षों को अपना-अपना खर्च स्वयं वहन करने का निर्देश दिया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: रीजनल प्रोविडेंट फंड कमिश्नर-II बनाम श्रीमती ममता बिनानी व अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 2026 (डायरी संख्या 42931/2026 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू
निर्णय की तिथि: 10 सितंबर 2026

