केरल हाईकोर्ट ने वर्ष 2009 में 14 वर्षीय स्कूली छात्रा के अपहरण और करीब 45 दिनों तक लगातार दुष्कर्म के गंभीर मामले में सिंचाई विभाग के पूर्व कर्मचारी की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। जस्टिस राजा विजयराघवन वी और जस्टिस के. वी. जयकुमार की खंडपीठ ने दोषी की अपील खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि इस तरह के जघन्य अपराध में सजा को लेकर किसी भी प्रकार की नरमी नहीं बरती जा सकती।
10वीं की परीक्षा में अच्छे अंकों का झांसा देकर किया था अगवा
मामले के विवरण के मुताबिक, घटना के समय 36 वर्षीय दोषी सिंचाई विभाग में कार्यरत था। उसने साढ़े 14 साल की नाबालिग छात्रा को यह झांसा दिया कि यदि वह चर्च में आयोजित एक विशेष प्रार्थना सभा में हिस्सा लेगी, तो उसे ईश्वर का आशीर्वाद मिलेगा और वह अपनी 10वीं की बोर्ड परीक्षा में उत्कृष्ट अंक प्राप्त कर सकेगी।
इस बहाने से वह छात्रा को अपने साथ ले गया और करीब 45 दिनों तक उसे केरल तथा तमिलनाडु के अलग-अलग स्थानों पर घुमाता रहा। इस पूरे दौरान उसने पीड़िता को शारीरिक चोट पहुंचाने की धमकी दी, बल प्रयोग किया और उसकी मर्जी के खिलाफ लगातार उसके साथ दुष्कर्म किया।
हाईकोर्ट ने पीड़िता के बयान को माना पूरी तरह खरा और विश्वसनीय
सजा के खिलाफ दाखिल अपील में दोषी ने दावा किया था कि उसे झूठे मामले में फंसाया गया है और पीड़िता अपनी मर्जी से उसके साथ गई थी। दूसरी ओर, अभियोजन पक्ष ने दलील पेश की कि छात्रा को झूठे वादों के जाल में फंसाकर अगवा किया गया और फिर डर दिखाकर उसके साथ गंभीर ज्यादती की गई।
दोषी के दावों को पूरी तरह निराधार बताते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगे आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल रहा है। पीठ ने पीड़िता के बयान को अत्यंत उच्च दर्जे (स्टर्लिंग क्वालिटी) का, स्वाभाविक, सच्चा और पूरी तरह विश्वसनीय करार दिया। अदालत ने रेखांकित किया कि पीड़िता की गवाही की पुष्टि चिकित्सीय साक्ष्यों (मेडिकल एविडेंस) से भी पूरी तरह होती है।
सत्र अदालत के निर्णय की पुष्टि करते हुए पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों की बारीकी से जांच करने के बाद ही सही निष्कर्ष निकाला था। अदालत ने दोषी की याचिका को पूरी तरह आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया।

