पिता होने या पुराने समझौते से नहीं मिल सकता बच्ची का संरक्षण: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक पिता की बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि केवल जैविक पिता होना या माता-पिता के बीच हुआ कोई पुराना समझौता बच्चे के संरक्षण (कस्टडी) का अधिकार नहीं दे सकता। अदालत ने बच्ची को उसकी मां के संरक्षण से हटाने से इनकार कर दिया, हालांकि बच्ची की कम उम्र को देखते हुए पिता को हर 15 दिन (पाक्षिक) में उससे मिलने की अनुमति दी गई है।

न्यायमूर्ति मनीष बत्रा की एकल पीठ ने याचिका का निपटारा करते हुए टिप्पणी की कि मात्र इस आधार पर कि याचिकाकर्ता बच्ची का पिता है या दोनों पक्षों के बीच 1 जनवरी, 2023 को कोई समझौता हुआ था, इस कार्यवाही में बच्ची का संरक्षण पिता को नहीं सौंपा जा सकता; विशेष रूप से तब जब वैवाहिक विवाद और संरक्षण का मुद्दा अब भी अदालत में विचाराधीन और विवादित हो। अदालत ने रेखांकित किया कि बच्ची बेहद कम उम्र की है और दोनों पक्षों के बीच मुख्य विवाद कस्टडी का है, जिसके लिए बच्ची के समग्र कल्याण और उसके सर्वोत्तम हितों का उचित मूल्यांकन होना आवश्यक है।

विवाद की पृष्ठभूमि और टूटा समझौता

मामले के तथ्यों के अनुसार, दंपति का विवाह जनवरी 2022 में हुआ था और उसी वर्ष उनकी बेटी का जन्म हुआ। हालांकि, आपसी मतभेदों के चलते दोनों जल्द ही अलग रहने लगे।

जनवरी 2023 में दोनों पक्षों ने एक समझौता किया। इस समझौते के तहत तय हुआ था कि नाबालिग बच्ची पिता के संरक्षण में रहेगी और पिता अपनी पत्नी को तलाक के एवज में 10 लाख रुपये का एकमुश्त गुजारा भत्ता देगा। इसके बाद दोनों ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत आपसी सहमति से तलाक के लिए याचिका दायर की।

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बाद में पत्नी ने अपनी सहमति वापस ले ली और कहा कि तलाक के लिए कोई आपसी सहमति नहीं बनी थी। उसने पहली किस्त के रूप में मिला 5 लाख रुपये का चेक भी लौटा दिया। परिणामस्वरूप, फैमिली कोर्ट ने नवंबर 2023 में आपसी सहमति से तलाक की इस याचिका को खारिज कर दिया।

अवैध हिरासत का आरोप और अदालत में दलीलें

तलाक की अर्जी खारिज होने के बाद पिता ने हाईकोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की। पिता ने आरोप लगाया कि उसकी अलग रह रही पत्नी ने पूर्व समझौते का पालन करने से इनकार कर दिया और बेटी को अपने साथ ले गई। उसने यह भी दावा किया कि पत्नी विदेश चली गई है और बच्ची को नानी की देखरेख में छोड़ दिया है।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील राधिका ने दलील दी कि बच्ची को अवैध हिरासत में रखा गया है और उसे उचित भोजन, कपड़े तथा अन्य बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। उन्होंने अदालत को बताया कि पिता प्रतिमाह 50,000 रुपये कमाता है और वह बच्ची की परवरिश तथा उसके चिकित्सा खर्च उठाने में पूरी तरह सक्षम है।

मां का पक्ष और बच्ची की वर्तमान स्थिति

दूसरी ओर, मां के वकील सौरव भाटिया ने याचिका का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि पांच वर्ष से कम उम्र की यह बच्ची अपनी जैविक मां की वैध देखरेख में है और किसी भी सक्षम अदालत ने पिता को संरक्षण नहीं सौंपा है।

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वकील ने अदालत को अवगत कराया कि बच्ची लगातार अपनी मां और ननिहाल पक्ष के साथ रह रही है, स्कूल जा रही है तथा उसे उचित पोषण, शिक्षा और चिकित्सा देखभाल मिल रही है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि फैमिली कोर्ट पहले ही बच्ची की कस्टडी मां के पास दर्ज कर चुका है और पति को अंतरिम भरण-पोषण तथा अदालती खर्च वहन करने का निर्देश दे चुका है।

हाईकोर्ट का निष्कर्ष

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न्यायमूर्ति बत्रा ने पाया कि मां के आचरण और नानी द्वारा बच्ची की देखभाल न कर पाने से जुड़े आरोप तथ्यों के विवादित पहलू हैं।

अदालत ने कहा कि इस प्रकार के विवादित तथ्यों का निर्धारण हेबियस कॉर्पस याचिका के सीमित क्षेत्राधिकार में नहीं किया जा सकता। कस्टडी का फैसला बच्चे के कल्याण को ध्यान में रखकर ही उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत किया जाना चाहिए।

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