यूपी में विवाह पंजीकरण से पहले उम्र की जांच अनिवार्य, इलाहाबाद हाईकोर्ट के कड़े निर्देश

उत्तर प्रदेश में किसी भी विवाह के पंजीकरण से पहले अब वर और वधू दोनों की उम्र का दस्तावेजी सत्यापन अनिवार्य रूप से करना होगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि विवाह की तिथि पर दोनों में से कोई भी पक्ष कानूनी रूप से नाबालिग था, तो विवाह पंजीकरण अधिकारी उस विवाह को पंजीकृत नहीं कर सकते। ऐसे आवेदनों को सामान्य प्रक्रिया की तरह निपटाने के बजाय तुरंत बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी और जिले के सक्षम प्राधिकारी को कानूनी कार्रवाई के लिए सौंपा जाना चाहिए।

जस्टिस तेज प्रताप तिवारी की पीठ ने यह आदेश 2 सितंबर को दिया। अदालत भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), पॉक्सो (POCSO) एक्ट और एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज एक आपराधिक मामले में दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान गाजियाबाद में एक नाबालिग लड़की के विवाह का सरकारी पंजीकरण किए जाने का तथ्य सामने आने पर हाईकोर्ट ने यह हस्तक्षेप किया।

गाजियाबाद में नाबालिग के विवाह पंजीकरण पर हाईकोर्ट सख्त

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मामले की सुनवाई के दौरान आरोपी के वकील ने दलील दी कि यह विवाह दोनों पक्षों की रजामंदी से हुआ था और लड़की बालिग है। अपनी बात के समर्थन में बचाव पक्ष ने आधिकारिक विवाह प्रमाण पत्र भी पेश किया। दूसरी ओर, राज्य सरकार और अभियोजन ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट लड़की को नाबालिग करार दे चुका है। अभियोजन का आरोप था कि लड़की की वास्तविक उम्र छिपाकर यह प्रमाण पत्र हासिल किया गया था।

इस पर हाईकोर्ट ने संबंधित विवाह पंजीकरण अधिकारी को तलब कर पूछा कि एक नाबालिग का विवाह कैसे पंजीकृत कर दिया गया। अधिकारी ने अदालत के समक्ष बयान दिया कि उन्होंने हाल ही में पूर्व अधिकारी से कार्यभार संभाला है, इसलिए उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि यह पंजीकरण किन परिस्थितियों में हुआ।

लापरवाही को लिपिकीय चूक मानने से कोर्ट का इनकार

हाईकोर्ट ने अधिकारी के इस स्पष्टीकरण पर गहरी नाराजगी जताई और इसे बेहद गंभीर विषय बताया। अदालत ने कहा कि विभागीय दिशा-निर्देशों में वर और वधू दोनों की जन्मतिथि का मिलान करने का स्पष्ट प्रावधान है। इस मामले में रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि पंजीकरण से पहले उम्र का कोई सत्यापन किया गया था।

जस्टिस तिवारी ने कहा कि किसी नाबालिग का विवाह पंजीकृत होने के कारणों को स्पष्ट न कर पाना प्रथम दृष्टया पर्यवेक्षण, सत्यापन और वैधानिक जवाबदेही की गंभीर विफलता को उजागर करता है। कोर्ट ने रेखांकित किया कि जन्मतिथि की जांच किए बिना किसी नाबालिग की शादी को पंजीकृत करना महज एक ‘लिपिकीय चूक’ नहीं माना जा सकता। यह पद से जुड़े दायित्वों के निर्वहन में बड़ी विफलता है, जिसकी निगरानी जांच होनी चाहिए और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।

नीतिगत और सामाजिक सरोकारों पर असर

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अदालत ने चिंता जताते हुए कहा कि नाबालिगों के विवाह पंजीकरण के मामले छिटपुट या कभी-कभार होने वाली घटनाएं नहीं हैं, बल्कि ऐसे कई उदाहरण न्यायपालिका के संज्ञान में आए हैं।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवाह पंजीकरण का उद्देश्य केवल नागरिकों को प्रमाण पत्र जारी करना भर नहीं है। सरकार के लिए यह आधिकारिक दस्तावेज जनसांख्यिकीय और सामाजिक रुझानों को समझने तथा जनकल्याणकारी नीतियां तैयार करने के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। कोर्ट ने कहा कि जो प्रशासनिक तंत्र बाल विवाह की पहचान करने में ही विफल रहे, वह सरकार को इस सामाजिक बुराई के वास्तविक स्वरूप का आकलन करने और इसके उन्मूलन के प्रभावी उपाय तैयार करने के लिए कोई ठोस आधार उपलब्ध नहीं करा सकता।

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हाईकोर्ट ने प्रदेश भर के संबंधित अधिकारियों को इन निर्देशों का कड़ाई से पालन करने का आदेश दिया है। इस मामले की अगली सुनवाई 5 अक्टूबर को निर्धारित की गई है।

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