आध्यात्मिक उपचार के नाम पर नाबालिग से दुष्कर्म: दिल्ली हाईकोर्ट ने ‘तांत्रिक’ की जमानत याचिका खारिज की

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक कथित तांत्रिक और मौलवी की जमानत याचिका को खारिज कर दिया है, जिस पर 2019 में एक 17 वर्षीय लड़की के साथ यौन शोषण का आरोप है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि आरोपी ने परिवार की “अंधश्रद्धा” का फायदा उठाया और आध्यात्मिक उपचार के बहाने लड़की की नाजुक स्थिति का दुरुपयोग किया।

यह मामला साल 2019 का है जब एक बीमार लड़की का परिवार उसे आरोपी के पास ले गया था। परिवार को विश्वास था कि लड़की पर किसी “जिन्न” या बुरी आत्मा का साया है। उपचार के नाम पर आरोपी ने लड़की के घर जाकर उसे अकेले में देखने की जिद की।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी ने पीड़िता को डराया कि जिन्न को उसके शरीर से निकालने के लिए कुछ अश्लील हरकतें करनी होंगी, जिसके बाद उसने किशोरी का यौन शोषण किया। इस घटना के बाद आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 और पॉक्सो (POCSO) एक्ट की धारा 4 के तहत मामला दर्ज किया गया था।

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जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने मामले की सुनवाई करते हुए आरोपों की गंभीरता पर ध्यान दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से पहली नजर में यही पता चलता है कि आरोपी ने अपनी स्थिति का दुरुपयोग उस बच्ची के शोषण के लिए किया, जो पहले से ही शारीरिक और मानसिक रूप से अस्वस्थ थी।

अपने आदेश में हाईकोर्ट ने कहा, “पीड़िता एक बीमार बच्ची थी और उसे व उसके परिवार को यह विश्वास दिलाया गया था कि आरोपी आध्यात्मिक उपचार से उसे ठीक कर सकता है। मदद करने के बजाय, आरोपी ने उस भरोसे का गला घोंटा और उपचार की आड़ में पीड़िता का शोषण किया।” कोर्ट ने आगे कहा कि आरोपी ने परिवार की मजबूरी और उनके अंधविश्वास का लाभ उठाकर इस अपराध को अंजाम दिया।

जमानत याचिका पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामला अब ट्रायल के अंतिम चरण में है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए जस्टिस शर्मा ने कहा कि आमतौर पर जब ट्रायल शुरू हो जाए और गवाहों के बयान दर्ज होने लगें, तो बलात्कार जैसे गंभीर मामलों में जमानत नहीं दी जानी चाहिए।

आरोपी की ओर से दलील दी गई थी कि गवाहों के बयान भरोसेमंद नहीं हैं, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे ट्रायल का विषय बताया। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “आरोपों की प्रकृति और गंभीरता, रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों और ट्रायल की वर्तमान स्थिति को देखते हुए, कोर्ट को आरोपी को जमानत देने का कोई ठोस आधार नजर नहीं आता।”

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हालांकि हाईकोर्ट ने जमानत देने से इनकार कर दिया, लेकिन यह भी संज्ञान में लिया कि आरोपी पिछले छह वर्षों से हिरासत में है। अभियुक्त के अधिकारों और अपराध की गंभीरता के बीच संतुलन बनाते हुए, हाईकोर्ट ने निचली अदालत को निर्देश दिया कि इस मामले के ट्रायल को जल्द से जल्द पूरा किया जाए।

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