“माननीय” शब्द का संबोधन संवैधानिक पदधारकों के लिए सुरक्षित, सिविल सेवकों के लिए नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने टिप्पणी की है कि संप्रभु कार्यों का निर्वहन करने वाले संवैधानिक पदाधिकारियों के नाम के साथ “माननीय” (Hon’ble) शब्द का उपयोग अनिवार्य है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि हालांकि सिविल सेवक इस उपाधि के हकदार नहीं हैं, लेकिन मंत्रियों, न्यायाधीशों और सांसदों के लिए यह प्रोटोकॉल का हिस्सा है और “व्यक्तिगत नाराजगी” के कारण इसे छोड़ा नहीं जा सकता।

यह कानूनी मुद्दा एक पूर्व केंद्रीय मंत्री और वर्तमान सांसद, श्री अनुराग ठाकुर के नाम के साथ उचित सम्मानजनक संबोधन के उपयोग न किए जाने से संबंधित है। एक हिंदी लिखित शिकायत, जिसके आधार पर चेक एफआईआर दर्ज की गई थी, उसमें इस प्रोटोकॉल की अनदेखी की गई थी। हाईकोर्ट ने संवैधानिक पदधारकों के लिए निर्धारित प्रोटोकॉल और शिकायतों एवं आधिकारिक दस्तावेजों में गरिमा बनाए रखने की जिम्मेदारी का विश्लेषण किया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला हर्षित शर्मा और अन्य द्वारा दायर क्रिमिनल मिसलेनियस रिट पिटीशन संख्या 4982/2026 की सुनवाई के दौरान सामने आया। कार्यवाही के दौरान, कानूनी दस्तावेजों में पूर्व केंद्रीय मंत्री के नाम और सम्मानजनक संबोधन के संबंध में विसंगति पाई गई थी। इसके परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने पहले रजिस्ट्रार (कम्प्लायंस) को आदेश संप्रेषित करने का निर्देश दिया था, जिसके बाद वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, मथुरा द्वारा प्रारंभिक जांच शुरू की गई थी।

जवाब में, उत्तर प्रदेश सरकार के अपर मुख्य सचिव (गृह) ने अनुपालन शपथ पत्र दाखिल किया। शपथ पत्र में कहा गया कि जिस हिंदी टाइप की गई शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज की गई थी, वह प्रथम सूचनाकर्ता खजान सिंह द्वारा प्रस्तुत की गई थी। राज्य के अनुसार, खजान सिंह ने कहा कि वह “सांसदों या पूर्व केंद्रीय मंत्रियों के लिए सम्मानजनक संबोधन के उपयोग से संबंधित प्रोटोकॉल से अनभिज्ञ थे।”

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने “माननीय” (Hon’ble) शब्द की कानूनी और प्रोटोकॉल आधारित स्थिति स्पष्ट की।

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हाईकोर्ट ने कहा:

“यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि ‘माननीय’ (Hon’ble) सम्मानजनक संबोधन उन संवैधानिक पदाधिकारियों के नाम के साथ जोड़ा जाना चाहिए जो सरकार के तीनों अंगों में से किसी के भी संप्रभु कार्यों का निर्वहन करते हैं।”

खंडपीठ ने विशेष रूप से संवैधानिक पदधारकों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा:

“‘माननीय’ एक ऐसा सम्मानजनक संबोधन है जिसका उपयोग करने का अधिकार किसी भी अधिकारी को नहीं है, चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो, यदि वह एक सिविल सेवक है और संप्रभु संवैधानिक पद का धारक नहीं है।”

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हाईकोर्ट ने उन श्रेणियों का भी उल्लेख किया जो इस सम्मान के हकदार हैं, जिनमें केंद्र और राज्य सरकारों के मंत्री, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीश, लोकसभा और राज्यसभा के अध्यक्ष/सभापति, और संसद एवं राज्य विधानसभाओं के सदस्य शामिल हैं।

हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि व्यक्तिगत भावनाएं इन प्रोटोकॉल से ऊपर नहीं हैं:

“व्यक्तिगत नाराजगी या किसी परिवार के साथ जान-पहचान, जो सम्मानजनक संबोधन का हकदार है, किसी भी संचार के लेखक को सरकार के संप्रभु पदाधिकारी को बिना संबोधन के संदर्भित करने की अनुमति नहीं दे सकती।”

निर्णय

अनुपालन शपथ पत्र में दिए गए स्पष्टीकरणों के बाद, हाईकोर्ट ने नोट किया कि मामले के इस विशिष्ट हिस्से को अब “बंद (Closed)” माना जाता है।

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रिट याचिका के मुख्य मामले के संबंध में, हाईकोर्ट ने प्रतिवादी संख्या 3 की ओर से दाखिल जवाबी हलफनामे को रिकॉर्ड पर लिया। याचिकाकर्ताओं के वकील को प्रत्युत्तर शपथ पत्र (rejoinder affidavit) दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई 11 मई, 2026 को होगी।

केस विवरण

केस शीर्षक: हर्षित शर्मा और 2 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य

केस संख्या: क्रिमिनल मिसलेनियस रिट पिटीशन संख्या – 4982/2026

पीठ: जस्टिस जे.जे. मुनीर, जस्टिस तरुण सक्सेना

दिनांक: 30 अप्रैल, 2026

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