हवाई किराए में अनियंत्रित बढ़ोतरी पर केंद्र की सुस्ती से सुप्रीम कोर्ट नाराज; हलफनामा दाखिल न करने पर मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने निजी एयरलाइंस द्वारा हवाई किराए और अन्य शुल्कों में की जा रही “अनियंत्रित बढ़ोतरी” को नियंत्रित करने के लिए नियामक दिशानिर्देशों की मांग करने वाली याचिका पर केंद्र सरकार के ढुलमुल रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने केंद्र द्वारा समय मांगे जाने की अर्जी को खारिज करते हुए अगले शुक्रवार, 8 मई तक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस हलफनामे में देरी के ठोस कारण भी बताने होंगे।

यह पूरा मामला सामाजिक कार्यकर्ता एस लक्ष्मीनारायणन द्वारा दायर एक याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने नागरिक उड्डयन क्षेत्र में पारदर्शिता और यात्री सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत और स्वतंत्र नियामक (रेगुलेटर) की मांग की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि निगरानी के अभाव में निजी एयरलाइंस, विशेषकर त्योहारों और आपातकालीन स्थितियों के दौरान, मनमाना किराया वसूल कर यात्रियों का शोषण कर रही हैं।

गुरुवार को सुनवाई शुरू होते ही याचिकाकर्ता के वकील ने बेंच को बताया कि नवंबर 2023 में नोटिस जारी होने के बावजूद केंद्र ने अभी तक कोई जवाब दाखिल नहीं किया है। जब केंद्र के वकील ने पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) की स्थिति का हवाला दिया और कहा कि सरकार नियम बनाने पर विचार कर रही है, तो बेंच ने इस पर असहमति जताई।

बेंच ने सवाल किया, “यह क्या है? आपको हलफनामा दाखिल करने से क्या रोक रहा है?” कोर्ट ने याद दिलाया कि पहले भी तीन बार समय दिया जा चुका है। जस्टिस ने टिप्पणी की, “आप हलफनामा दाखिल करें और सब कुछ रिकॉर्ड पर रखें। केंद्र का यह कैसा रुख है?”

कोर्ट ने केंद्र को आदेश दिया कि वह अगले शुक्रवार तक हलफनामा दे और साथ ही यह भी बताए कि अब तक जवाब क्यों नहीं दिया गया और बार-बार समय क्यों मांगा जा रहा है। मामले की अगली सुनवाई 11 मई को होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया था। 19 जनवरी की सुनवाई के दौरान, हाईकोर्ट ने त्योहारों के दौरान हवाई किराए में होने वाली भारी वृद्धि को “शोषण” करार दिया था। याचिका में एयरलाइंस की कई नीतियों को चुनौती दी गई है:

  • अतिरिक्त शुल्क: याचिका में दावा किया गया है कि एयरलाइंस ने बिना किसी ठोस कारण के मुफ्त चेक-इन सामान की सीमा 25 किलो से घटाकर 15 किलो कर दी है, जिससे यात्रियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
  • सिंगल-पीस पॉलिसी: चेक-इन के लिए केवल एक बैग की अनुमति और सामान न ले जाने वाले यात्रियों को कोई छूट न देने की नीति को भी मनमाना बताया गया है।
  • डायनेमिक प्राइसिंग: याचिकाकर्ता का तर्क है कि अनियंत्रित किराया एल्गोरिदम नागरिकों के समानता और आवाजाही की स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
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याचिका में कहा गया है कि हवाई किराए और कैंसिलेशन नीतियों को विनियमित करने में सरकार की विफलता उसके संवैधानिक कर्तव्य की अनदेखी है। याचिकाकर्ता के अनुसार, कई बार आपातकालीन स्थितियों या मौसम की खराबी के दौरान हवाई यात्रा कोई विलासिता (luxury) नहीं बल्कि मजबूरी बन जाती है। ऐसे में मनमाना किराया वसूलना मानवीय गरिमा के विरुद्ध है।

इससे पहले 23 फरवरी को केंद्र ने कोर्ट को बताया था कि नागरिक उड्डयन मंत्रालय इन मुद्दों पर सक्रिय रूप से विचार कर रहा है। हालांकि, कोर्ट के ताजा आदेश से स्पष्ट है कि अब वह इस मामले में केवल आश्वासनों के बजाय ठोस कार्रवाई और जवाब चाहता है।

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