आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (HSA) की धारा 6 के तहत बेटियों को समान कोपार्शनरी (सह-दायक) अधिकार प्रदान करने के लिए विभाजन के मुकदमों में दूसरी प्रारंभिक डिक्री पारित की जा सकती है। जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस बालाजी मेदामल्ली की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि भले ही किसी मामले में प्रारंभिक डिक्री को सुप्रीम कोर्ट से अंतिम मंजूरी मिल चुकी हो, लेकिन जब तक अंतिम डिक्री (Final Decree) पारित नहीं हो जाती, तब तक कानून में बदलाव या परिवार में किसी सदस्य की मृत्यु जैसी परिस्थितियों के आधार पर उसमें संशोधन की गुंजाइश बनी रहती है।
कानूनी मुद्दा
अदालत के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या दशकों पुरानी प्रारंभिक डिक्री, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने एसएलपी (SLP) और क्यूरेटिव याचिकाएं खारिज कर बरकरार रखा था, उसे संशोधित किया जा सकता है? यह सवाल हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में 2005 के संशोधन और सुप्रीम कोर्ट के विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020) मामले में दिए गए फैसले के संदर्भ में उठाया गया था।
हाईकोर्ट ने इस पर सकारात्मक रुख अपनाते हुए कहा कि विभाजन की प्रक्रिया अंतिम डिक्री पारित होने तक जारी रहती है। अदालत ने 2003 की प्रारंभिक डिक्री में संशोधन की अनुमति दी, जिसके परिणामस्वरूप बेटी का हिस्सा 1/6 से बढ़कर 1/4 (पिता के आधे हिस्से का आधा) हो गया। यह वृद्धि कोपार्शनरी अधिकारों और मामले के लंबित रहने के दौरान मां की मृत्यु के कारण उत्तराधिकार के संयोजन से हुई।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद दिवंगत वेले मरेप्पा के परिवार से जुड़ा है, जिनकी 1942 में मृत्यु हो गई थी। उनकी विधवा वेले नगम्मा (वादी 1) और बेटी मंडलम वीरम्मा (वादी 2) ने 1988 में मरेप्पा के बेटे बसप्पा के वारिसों के खिलाफ विभाजन का मुकदमा दायर किया था।
2003 में, हाईकोर्ट ने अपील (A.S. No. 118 of 1990) में एक प्रारंभिक डिक्री पारित की, जिसमें विधवा, बेटी और बेटे को मरेप्पा के हिस्से में से 1/3 हिस्सा दिया गया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 2012 तक इस डिक्री की पुष्टि कर दी थी, लेकिन वास्तविक विभाजन (Final Decree) की प्रक्रिया अभी भी लंबित थी। इसी बीच विधवा नगम्मा की मृत्यु हो गई, जिसके बाद बेटी के कानूनी वारिसों ने धारा 6 के तहत समान अधिकार और मां के हिस्से में उत्तराधिकार का दावा करते हुए डिक्री में संशोधन की मांग की।
पक्षों के तर्क
आवेदक: आवेदकों (बेटी के वारिसों और खरीदारों) ने तर्क दिया कि धारा 6 में 2005 के संशोधन ने बेटी को “जन्म से” बेटे के समान कोपार्शनर का दर्जा दिया है। उन्होंने विनीता शर्मा मामले में सुप्रीम कोर्ट के निष्कर्ष का हवाला दिया:
“प्रारंभिक डिक्री पारित होने के बावजूद, अंतिम डिक्री की लंबित कार्यवाही या अपील में बेटियों को बेटे के समान कोपार्शनरी हिस्सा दिया जाना चाहिए।”
उनका कहना था कि कानून में आए इस बदलाव और मां की मृत्यु के तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत को हिस्सों की पुनर्गणना करनी चाहिए।
प्रतिवादी: प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि 2003 की डिक्री को अंतिम रूप मिल चुका है और अब इसे चुनौती नहीं दी जा सकती। उन्होंने यह भी कहा कि चूंकि मरेप्पा की मृत्यु 1942 में हुई थी, इसलिए 1956 का अधिनियम और उसके बाद के संशोधन इस मामले में लागू नहीं होंगे। उन्होंने अर्शनूर सिंह बनाम हरपाल कौर मामले का सहारा लेते हुए तर्क दिया कि उत्तराधिकार पहले ही तय हो चुका था और उसे अब नहीं बदला जा सकता।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने नागरिक प्रक्रिया संहिता (CPC) और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के प्रावधानों का विस्तृत विश्लेषण किया:
1. एक से अधिक प्रारंभिक डिक्री पर: बेंच ने स्पष्ट किया कि सीपीसी की धारा 97 किसी प्रारंभिक डिक्री में संशोधन करने से नहीं रोकती, यदि परिस्थितियां बदल गई हों। फूलचंद बनाम गोपाल लाल मामले का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा:
“नागरिक प्रक्रिया संहिता में ऐसा कुछ भी नहीं है जो एक से अधिक प्रारंभिक डिक्री पारित करने से रोकता हो, यदि परिस्थितियां इसे उचित ठहराती हों। विशेष रूप से विभाजन के मुकदमों में ऐसा करना आवश्यक हो सकता है जब प्रारंभिक डिक्री के बाद कुछ पक्षों की मृत्यु हो जाती है और अन्य पक्षों के हिस्से बढ़ जाते हैं।”
2. 2005 के संशोधन की लागूता: अदालत ने प्रतिवादियों के “पिता की मृत्यु की तारीख” वाले तर्क को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोपार्शनर के रूप में बेटी का अधिकार जन्म से है और इसके लिए पिता का 2005 में जीवित होना अनिवार्य नहीं है। कोर्ट ने कहा:
“पिता की मृत्यु की तारीख प्रासंगिक नहीं है… संशोधित धारा 6 के प्रावधानों को पूरी तरह प्रभावी बनाया जाना चाहिए, भले ही पिता की मृत्यु 1942 में हुई हो।”
3. हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्ति (धारा 151 CPC): अदालत ने स्पष्ट किया कि जहां धारा 152 केवल लिपिकीय त्रुटियों के लिए है, वहीं धारा 151 (Inherent Powers) कानून या तथ्यों में बदलाव के कारण डिक्री को संशोधित करने का उचित प्रावधान है।
4. विधवा के हिस्से का उत्तराधिकार: हाईकोर्ट ने पाया कि विधवा की मृत्यु पर उसका 1/6 हिस्सा हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15(1)(a) के तहत बेटी और बेटे के वारिसों के बीच बराबर बंटा।
फैसला
हाईकोर्ट ने आवेदनों को स्वीकार करते हुए निम्नलिखित आदेश दिए:
- डिक्री में संशोधन: 2003 की प्रारंभिक डिक्री को संशोधित किया गया। अब कोपार्शनरी संपत्ति में बेटे (बसप्पा) को 1/2 हिस्सा और बेटी (मंडलम वीरम्मा) को 1/2 हिस्सा (पिता के कुल हिस्से में से) आवंटित किया गया है।
- दूसरी प्रारंभिक डिक्री: अदालत ने इन सही हिस्सों को दर्शाने के लिए दूसरी/संशोधित प्रारंभिक डिक्री तैयार करने का निर्देश दिया।
- समय सीमा: ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया कि इस संशोधित डिक्री के आधार पर छह महीने के भीतर अंतिम डिक्री की कार्यवाही पूरी की जाए।
- खरीदारों के अधिकार: अदालत ने स्पष्ट किया कि संपत्ति खरीदने वाले लोग बढ़े हुए हिस्से के हकदार नहीं होंगे, बल्कि उन्हें उनके मूल विक्रय विलेख (Sale Deed) के आधार पर ही अंतिम डिक्री के दौरान राहत दी जाएगी।
मामले का विवरण:
- मामले का शीर्षक: वाई. रुकिन्नम्मा और अन्य बनाम श्रीमती सागीरे नागेंद्रम्मा और अन्य (मंडलम इंदिरा और अन्य बनाम श्रीमती सागीरे नागेंद्रम्मा और अन्य के साथ)
- केस नंबर: आई.ए. नंबर 1, 2, 3 और 4, वर्ष 2026 (अपील संख्या 118, वर्ष 1990 में)
- बेंच: जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस बालाजी मेदामल्ली
- दिनांक: 5 मई, 2026

