इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक नाबालिग छात्रा को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपी शिक्षक के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि कथित उत्पीड़न की आखिरी घटना और आत्महत्या के बीच तीन महीने का अंतराल आवश्यक “लाइव नेक्सस” (सीधा संबंध) को तोड़ता है। जस्टिस संदीप जैन ने कहा कि मृत्यु के समय उकसाने का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण न होने की स्थिति में, आईपीसी की धारा 306 के तहत आरोप बरकरार नहीं रखा जा सकता।
कानूनी मुद्दा
अदालत के समक्ष मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या किसी शिक्षक द्वारा किए गए कथित निरंतर उत्पीड़न को कानूनी रूप से “आत्महत्या के लिए उकसाना” माना जा सकता है, जबकि पीड़ित ने उत्पीड़न की अंतिम घटना के लगभग चार महीने बाद यह कदम उठाया हो। हाईकोर्ट ने धारा 482 सीआरपीसी के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए कार्यवाही को इस आधार पर रद्द कर दिया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के आचरण और पीड़ित की मृत्यु के बीच ‘मेंस रिया’ (आपराधिक मंशा) या निकट संबंध स्थापित करने में विफल रहा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मोदी नगर के टीआरएम स्कूल के भौतिक विज्ञान के शिक्षक राहुल कुशवाहा से जुड़ा था। शिकायतकर्ता श्रीमती गीता बैसला ने आरोप लगाया था कि कुशवाहा ने उनकी नाबालिग बेटी कुमारी ज्योति में “वासनापूर्ण रुचि” विकसित कर ली थी। आरोप था कि वह छात्रा पर निजी ट्यूशन के लिए दबाव डालता था, अभद्र इशारे करता था और परीक्षा में फेल करने की धमकी देता था।
शिकायत के अनुसार, 25 मार्च 2011 को आरोपी ने परीक्षा हॉल में छात्रा के साथ दुर्व्यवहार किया और 2 अप्रैल 2011 को उसकी लज्जा भंग करने का प्रयास किया। इन घटनाओं के बाद पीड़िता अपने घर पर रही और अंततः 29 जुलाई 2011 को उसने आत्महत्या कर ली। पुलिस की शुरुआती जांच में सबूतों के अभाव में “फाइनल रिपोर्ट” लगाई गई थी, क्योंकि शव का पोस्टमार्टम किए बिना ही अंतिम संस्कार कर दिया गया था। हालांकि, मजिस्ट्रेट ने इन रिपोर्टों को खारिज करते हुए आरोपी को आईपीसी की धारा 306, 354 और 506 के तहत मुकदमे के लिए तलब किया था, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
पक्षों के तर्क
आवेदक की ओर से: आवेदक के वकील ने तर्क दिया कि आरोप झूठे थे और पुलिस को दो बार की जांच में इनमें कोई सच्चाई नहीं मिली। उन्होंने जोर दिया कि इसमें कोई “लाइव नेक्सस” नहीं था क्योंकि उत्पीड़न की अंतिम घटना अप्रैल में हुई थी, जबकि आत्महत्या जुलाई के अंत में हुई। उन्होंने यह भी कहा कि परिवार ने पुलिस को सूचित किए बिना या पोस्टमार्टम कराए बिना “गुपचुप तरीके से शव का अंतिम संस्कार” कर दिया, जिससे मौत के कारण के रूप में जहर की पुष्टि करना असंभव हो गया।
राज्य की ओर से: राज्य के वकील (एजीए) ने दलील दी कि शिकायतकर्ता और गवाहों के बयानों से प्रथम दृष्टया पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है जो दर्शाती है कि निरंतर उत्पीड़न ने छात्रा को आत्महत्या के लिए मजबूर किया। यह तर्क दिया गया कि समन जारी करने के चरण में अदालत को सबूतों की गहराई से जांच नहीं करनी चाहिए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस संदीप जैन ने आईपीसी की धारा 306 के लिए आवश्यक पूर्व शर्तों का विश्लेषण किया और सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश बनाम महाराष्ट्र राज्य तथा अभिनव मोहन डेलकर बनाम महाराष्ट्र राज्य के फैसलों का संदर्भ लिया।
1. निकटता की आवश्यकता: कोर्ट ने नोट किया कि कथित उत्पीड़न की अंतिम घटना 2 अप्रैल 2011 को हुई थी।
“यह स्पष्ट है कि आरोपी द्वारा किए गए कथित उत्पीड़न, अभद्र व्यवहार या लज्जा भंग करने के प्रयास और आत्महत्या की घटना के बीच कोई निकटता नहीं थी। यह स्थापित कानून है कि यदि उत्पीड़न के कृत्यों और आत्महत्या के बीच कोई निकटता या संबंध नहीं है, तो धारा 306 आईपीसी के तहत उकसाने का कोई अपराध नहीं बनता है।”
2. आपराधिक मंशा (Mens Rea) का अभाव: कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष को यह साबित करना चाहिए कि आरोपी ने पीड़ित को आत्महत्या के लिए मजबूर करने का इरादा रखा था।
“उत्पीड़न कितना भी कठोर या गंभीर क्यों न हो, जब तक कि दूसरे व्यक्ति को आत्महत्या के लिए मजबूर करने की सचेत और जानबूझकर की गई मंशा (मेंस रिया) न हो, धारा 306 के तहत उकसाने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।”
3. साक्ष्यों की कमियां: कोर्ट ने शिकायतकर्ता के आचरण में कई खामियां पाईं, जिनमें एफआईआर दर्ज करने में “घातक देरी” (नवंबर 2011 में दर्ज) और चिकित्सा साक्ष्यों का अभाव शामिल था।
“यह बहुत आश्चर्यजनक है कि यदि पीड़ित ने जहर खाया था तो कम से कम उसे इलाज के लिए अस्पताल ले जाया जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा कोई प्रयास नहीं किया गया… पीड़ित की मृत्यु का कारण भी साबित नहीं हुआ है।”
4. स्वतंत्र गवाहों की कमी: कोर्ट ने बताया कि कथित घटनाएं स्कूल में होने के बावजूद किसी भी छात्र, मित्र या स्कूल के प्रिंसिपल को गवाह के रूप में पेश नहीं किया गया।
निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में अभियोजन जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। परिणामस्वरुप, आवेदन स्वीकार कर लिया गया और शिकायत केस संख्या 49/2012 की कार्यवाही रद्द कर दी गई।
मामले का विवरण
केस शीर्षक: राहुल कुशवाहा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
केस संख्या: आवेदन धारा 482 संख्या 21503 वर्ष 2015
पीठ: जस्टिस संदीप जैन
दिनांक: 12 मई, 2026

