जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा है कि केंद्र सरकार के औद्योगिक न्यायाधिकरण-सह-श्रम अदालतों (सीजीआईटी-सह-एलसी) में पीठासीन अधिकारी के रूप में नियुक्त पुनर्नियोजित (री-एम्प्लॉयड) अधिकारी, नियमित सरकारी कर्मचारियों से एक अलग वर्ग बनाते हैं। इसलिए वे अन्य प्रशासनिक ट्रिब्यूनलों के समान छठे केंद्रीय वेतन आयोग के तहत वेतनमान का दावा नहीं कर सकते। संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विशेषज्ञ वेतन समिति की सिफारिशों के आधार पर सीजीआईटी के पीठासीन अधिकारियों को राज्य की जिला न्यायपालिका के समकक्ष रखना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन नहीं करता, क्योंकि वेतन निर्धारण का विषय पूरी तरह से कार्यपालिका का अधिकार क्षेत्र है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह रिट याचिका आर.के. यादव और एक अन्य द्वारा दायर की गई थी, जिन्हें क्रमशः नई दिल्ली और हैदराबाद स्थित सीजीआईटी-सह-एलसी में पीठासीन अधिकारी नियुक्त किया गया था। याचिकाकर्ता संख्या 1, जो पहले दिल्ली न्यायिक सेवा में न्यायिक अधिकारी थे, 21 अप्रैल 2009 को प्रतिनियुक्ति पर नई दिल्ली स्थित सीजीआईटी-I में शामिल हुए थे। 30 जून 2009 को अपनी सेवानिवृत्ति के बाद, उन्हें 1 जुलाई 2009 से पुनर्नियोजन के आधार पर नियुक्त किया गया था। याचिकाकर्ता संख्या 2 को भी इसी तरह हैदराबाद के सीजीआईटी में पीठासीन अधिकारी नियुक्त किया गया था।
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख कर मांग की थी कि केंद्र सरकार के प्रशासनिक ट्रिब्यूनल (कैट), आयकर अपीलीय ट्रिब्यूनल (आईटीएटी), ऋण वसूली ट्रिब्यूनल (डीआरटी) और रेलवे दावा ट्रिब्यूनल जैसे अन्य केंद्रीय ट्रिब्यूनलों की तर्ज पर सीजीआईटी के लिए भी छठे वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने का निर्देश दिया जाए। इसके अलावा, उन्होंने श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के 16 जनवरी 2012 के उस आदेश को भी चुनौती दी, जिसके तहत जस्टिस ई. पदमनाभन समिति की सिफारिशों के अनुसार उनके वेतनमान को जिला न्यायपालिका के बराबर तय किया गया था।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि सीजीआईटी-सह-एलसी संविधान के अनुच्छेद 247 और 323-बी के तहत स्थापित केंद्रीय ट्रिब्यूनल हैं और अन्य केंद्रीय ट्रिब्यूनलों के समान दर्जा रखते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने उन्हें अनुच्छेद 233 के तहत राज्य जिला न्यायपालिका के साथ जोड़कर असमानों के साथ समान व्यवहार किया है और उन्हें छठे वेतन आयोग के तहत अनुशंसित उच्च वेतनमान से वंचित किया है।
पक्षों की दलीलें
केंद्र सरकार और अन्य उत्तरदाताओं ने याचिका का विरोध करते हुए निम्नलिखित मुख्य बिंदु रखे:
- वैधानिक ढांचा: सीजीआईटी-सह-एलसी का गठन औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में किया जाता है। मुंबई और कोलकाता के राष्ट्रीय औद्योगिक ट्रिब्यूनलों को छोड़कर—जहां सेवारत या सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जजों की नियुक्ति होती है—अन्य सीजीआईटी में सेवारत या सेवानिवृत्त जिला जज या योग्य न्यायिक अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं।
- जिला न्यायपालिका से ऐतिहासिक जुड़ाव: सीजीआईटी के पीठासीन अधिकारियों का वेतनमान पहले प्रथम राष्ट्रीय न्यायिक वेतन आयोग (शेट्टी कमीशन) की सिफारिशों के आधार पर 28 सितंबर 2005 के पत्र द्वारा संशोधित कर राज्य न्यायपालिका के जिला जजों के बराबर किया गया था। इसके बाद, न्याय विभाग की सलाह पर जस्टिस ई. पदमनाभन समिति की रिपोर्ट के अनुसार 16 जनवरी 2012 को पुनः वेतन संशोधन किया गया।
- पुनर्नियोजित पेंशनभोगियों से जुड़े नियम: केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता पुनर्नियोजित पेंशनभोगी हैं, जिन पर केंद्रीय नागरिक सेवा (पुनर्नियोजित पेंशनभोगियों का वेतन निर्धारण) आदेश, 1986 लागू होता है। इन नियमों के तहत पुनर्नियोजित अधिकारी केवल पुनर्नियोजित पद के निर्धारित वेतनमान में ही वेतन प्राप्त कर सकते हैं और उन्हें सेवानिवृत्ति से पूर्व के पद का वेतनमान संरक्षण (पे प्रोटेक्शन) पाने का अधिकार नहीं है।
- संबंधित विभागों से परामर्श: वित्त मंत्रालय (व्यय विभाग) और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) दोनों ने छठे वेतन आयोग के वेतनमान की मांग करने वाले याचिकाकर्ताओं के अभ्यावेदन पर विचार किया था और इस वर्ग के अधिकारियों के वेतन ढांचे की समीक्षा करने से इनकार कर दिया था।
कोर्ट का विश्लेषण
पीठ की ओर से निर्णय लिखते हुए जस्टिस एन.वी. अंजारिया ने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 और उसके बाद के प्रशासनिक नियमों (2015 के नियम, 2017 के वित्त अधिनियम नियम, 2020 के नियम और ट्रिब्यूनल सुधार अधिनियम, 2021 के तहत बने 2021 के नियम) का उल्लेख किया।
सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि वेतनमान का निर्धारण मूल रूप से कार्यपालिका का कार्य है, जो विशेषज्ञ निकायों की सलाह पर निर्भर करता है। पूर्व के निर्णयों का हवाला देते हुए कोर्ट ने रेखांकित किया कि वेतन निर्धारण के मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा बहुत सीमित है:
- कार्यपालिका का अधिकार क्षेत्र: स्टेट ऑफ यूपी व अन्य बनाम जे.पी. चौरसिया व अन्य (1989) मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की कि अदालतें हलफनामों के आधार पर वेतनमान के अंतर की तुलना करने के लिए उपयुक्त नहीं हैं और दुर्भावना साबित न होने तक यह मामला विशेषज्ञ निकायों पर छोड़ दिया जाना चाहिए।
- सीमित हस्तक्षेप: यूनियन ऑफ इंडिया बनाम दिनेश के.के. (2008) मामले का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने दोहराया कि वेतन ढांचे में न्यायिक समीक्षा केवल तभी संभव है जब कोई स्पष्ट विसंगति मौजूद हो।
- अलग भर्ती नियम: यूनियन ऑफ इंडिया बनाम इंडियन नेवी सिविलियन डिज़ाइन ऑफिसर्स एसोसिएशन व अन्य (2023) मामले का जिक्र करते हुए कोर्ट ने माना कि जिन पदों के भर्ती नियम अलग-अलग हों, उन्हें मनमाने ढंग से एक समान नहीं माना जा सकता।
- कार्यपालिका का विशेष अधिकार: यूनियन ऑफ इंडिया बनाम टी.वी.एल.एन. मल्लिकार्जुन राव (2015) मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने पुनर्गठित किया: “पदों का वर्गीकरण और वेतन ढांचे का निर्धारण पूरी तरह से कार्यपालिका के exclusive अधिकार क्षेत्र में आता है। ट्रिब्यूनल या कोर्ट किसी सेवा विशेष में निश्चित वेतन ढांचा या ग्रेड तय करने के कार्यपालिका के निर्णय पर अपील अधिकारी की तरह विचार नहीं कर सकते।”
संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत चुनौती पर विचार करते हुए कोर्ट ने चरणजीत लाल चौधरी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1950) मामले का उल्लेख किया और कहा कि समानता का अधिकार तर्कसंगत वर्गीकरण को नहीं रोकता। कोर्ट ने कहा:
“अनुच्छेद 14 वर्ग-आधारित कानूनों का निषेध करता है, लेकिन विधान के उद्देश्यों के लिए तर्कसंगत वर्गीकरण को नहीं रोकता। प्रस्तुत मामले में वेतनमान लागू करने के उद्देश्य से किया गया वर्गीकरण एक तर्कसंगत और स्पष्ट अंतर पर आधारित है, जो एक समूह में शामिल व्यक्तियों को बाहर रखे गए व्यक्तियों से अलग करता है।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुनर्नियोजित सेवानिवृत्त अधिकारी नियमित सेवारत कर्मचारियों के बराबर नहीं हो सकते:
“याचिकाकर्ताओं जैसे पुनर्नियोजित अधिकारियों का वर्ग सरकार के नियमित कर्मचारियों की तुलना में स्पष्ट रूप से अलग है। पुनर्नियोजित वर्ग को वेतनमान लागू करने के उद्देश्य से तार्किक और तर्कसंगत रूप से अलग वर्गीकृत किया जा सकता है, जो अन्य वर्गों के बराबर नहीं भी हो सकता है। पुनर्नियोजन के बाद, ये अधिकारी सरकार के नियमित कर्मचारियों के वर्ग के साथ एक समान (समरूप) नहीं रह जाते।”
जिला न्यायपालिका के साथ तुलना के संबंध में कोर्ट ने माना कि औद्योगिक ट्रिब्यूनल और श्रम अदालतें राज्यों के भीतर कार्य करती हैं, इसलिए विशेषज्ञ निकायों (जैसे शेट्टी कमीशन और पदमनाभन समिति) की सिफारिशों के आधार पर उनके वेतनमान को जिला न्यायपालिका से जोड़ना तर्कसंगत है और इसमें कोई मनमानापन नहीं है। पीठ ने माना कि “पदों के वर्गीकरण और वेतनमान निर्धारण के मामलों में न्यायिक समीक्षा की शक्ति अत्यंत सीमित है, क्योंकि पदों और वेतनों का समतुल्यीकरण एक जटिल विषय है जिसे विशेषज्ञ निकाय पर छोड़ना ही श्रेयस्कर है।”
कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि पुनर्नियोजित अधिकारी एक अलग वर्ग बनाते हैं और उनके पास छठे केंद्रीय वेतन आयोग के तहत नियमित प्रशासनिक ट्रिब्यूनलों के समान वेतन मांगने का कोई लागू करने योग्य मौलिक अधिकार नहीं है:
“सेवानिवृत्ति के बाद पुनः नियुक्त होने वाले अधिकारी एक अलग वर्ग से संबंध रखते हैं। छठे वेतन आयोग के वेतनमान का दावा करने के उनके अधिकार का न तो मौलिक अधिकारों के आधार पर और न ही किसी अन्य आधार पर कोई औचित्य है। उन्हें नियमित रूप से कार्यरत कर्मचारियों से अलग समूह में रखना और जिला न्यायपालिका के समकक्ष मानना संविधान के अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 16 के प्रावधानों का उल्लंघन नहीं करता है।”
दावों में कोई मेरिट न पाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने रिट याचिका को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: आर.के. यादव व अन्य बनाम भारत संघ व अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका (सिविल) संख्या 193/2012
पीठ: जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी, जस्टिस एन.वी. अंजारिया
निर्णय की तिथि: 12 अगस्त, 2026

