दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मान्यता प्राप्त निजी स्कूल भी कदाचार के आरोपों में अपने प्रोबेशनर (परिवीक्षाधीन) शिक्षकों को बिना औपचारिक अनुशासनात्मक जांच और राज्य प्राधिकारियों की पूर्व अनुमति के नौकरी से नहीं निकाल सकते। जस्टिस संजीव नरूला की पीठ ने 3 अगस्त के अपने फैसले में एनजीएफ जूनियर स्कूल की याचिका खारिज करते हुए एक प्राथमिक शिक्षिका को फिर से बहाल करने का आदेश दिया। कोर्ट ने 2018 में शिक्षा उप निदेशक द्वारा जारी बहाली के आदेश को बरकरार रखा।
बिना जांच और आरोप-पत्र के सेवा समाप्ति पर सवाल
स्कूल प्रबंधन ने 1 नवंबर 2014 को शिक्षिका को एक वर्ष के प्रोबेशन पर नियुक्त किया था। अप्रैल 2016 में, काम में लापरवाही, असंतोषजनक प्रदर्शन और बच्चों को थप्पड़ मारने जैसे आरोपों के आधार पर उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि स्कूल ने जिस दिन आरोपों का मेमोरेंडम जारी किया, उसी दिन बर्खास्तगी का नोटिस भी थमा दिया। इस प्रक्रिया में शिक्षिका को न तो कोई चार्जशीट सौंपी गई, न साक्ष्य दर्ज किए गए और न ही उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका दिया गया।
जस्टिस संजीव नरूला ने कहा कि जब बर्खास्तगी की वजह कदाचार हो, तो नियोक्ता कर्मचारी को प्रोबेशनर बताकर जांच की प्रक्रिया से नहीं बच सकता। कोर्ट ने टिप्पणी की कि आरोपों की सच्चाई पर फैसला दिए बिना भी यह साफ है कि स्कूल ने कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना ही अपने आरोपों को साबित मान लिया।
कानूनी प्रावधान और सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
एनजीएफ जूनियर स्कूल ने तर्क दिया था कि शिक्षिका का सेवा पुष्टि (कन्फर्मेशन) आदेश जारी नहीं हुआ था, इसलिए वे प्रोबेशन पर थीं और अनुबंध के अनुसार उन्हें बिना जांच हटाया जा सकता था। स्कूल ने यह भी कहा कि दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम, 1973 की धारा 8(2) का प्रावधान (जिसमें गैर-सरकारी स्कूलों के कर्मचारियों को हटाने के लिए शिक्षा निदेशक की पूर्व अनुमति अनिवार्य है) उन पर लागू नहीं होता था। स्कूल की ओर से एडवोकेट अनुज अग्रवाल, भूमिका कुंद्रा, तान्या रोज, शुभम बहल, कृतिका मट्टा और निखिल पवार ने पक्ष रखा।
दूसरी ओर, शिक्षिका की तरफ से पेश एडवोकेट पी आर राजहंस, विवेक सिंह, तरुण कुमार, अभिषेक और प्रतिभा ने दलील दी कि प्रोबेशन अवधि को कभी वैध तरीके से नहीं बढ़ाया गया था और न ही शिक्षिका को इसकी कोई सूचना दी गई थी। उन्होंने कहा कि थप्पड़ मारने जैसे आरोपों के आधार पर की गई सेवा समाप्ति वास्तव में एक दंडात्मक कार्रवाई थी।
हाईकोर्ट ने माना कि धारा 8(2) अल्पसंख्यक संस्थानों को छोड़कर सभी मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों पर लागू होती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘राज कुमार बनाम शिक्षा निदेशक’ मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पिछली तारीखों से भी लागू होता है। इसलिए अप्रैल 2016 में हुई बर्खास्तगी में भी निदेशक की पूर्व अनुमति अनिवार्य थी। अदालत ने कहा कि निजी नियुक्ति पत्र के नियम कानून और अधिनियम द्वारा प्रदान की गई सुरक्षा को रद्द नहीं कर सकते।
चार सप्ताह में बहाली और वेतन भुगतान के निर्देश
हाईकोर्ट ने एनजीएफ जूनियर स्कूल को चार सप्ताह के भीतर शिक्षिका को फिर से काम पर रखने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही, 8 अप्रैल 2016 से सेवा की निरंतरता, वेतन निर्धारण और वेतन वृद्धि के लाभ देने का आदेश दिया है।
शिक्षिका को इस अवधि के 50 प्रतिशत पिछले वेतन (बैक वेज) का भुगतान किया जाएगा। आदेश के तहत शिक्षिका को बर्खास्तगी के बाद से किसी अन्य रोजगार या आय का ब्योरा देना होगा, जिसे बकाया वेतन में समायोजित किया जा सकता है।

