इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोरोना महामारी के दौरान दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन मरकज में शामिल होने और संक्रमण फैलाने की आशंका को लेकर दर्ज मामले में दो व्यक्तियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही पूरी तरह रद्द कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पूरा मामला केवल अनुमानों और आशंकाओं पर आधारित था, जबकि बाद में दोनों व्यक्तियों की जांच रिपोर्ट निगेटिव आई थी।
जस्टिस डॉ. गौतम चौधरी ने 18 सितंबर को फैसला सुनाते हुए जौनपुर के अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसीजेएम) के समक्ष लंबित मुकदमे को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि इस कार्यवाही को आगे बढ़ने दिया गया, तो यह अदालत और कानून की प्रक्रिया का सीधा दुरुपयोग होगा। कोर्ट ने माना कि दोनों लोगों को दुर्भावना और अनुचित मंशा के तहत झूठे व बेबुनियाद आरोपों में फंसाया गया था।
महज अनुमान और आशंका पर आधारित थी पुलिस कार्रवाई
यह पूरा मामला जौनपुर के शाहगंज थाने में 2 अप्रैल 2020 को दर्ज प्राथमिक सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) से जुड़ा है। पुलिस ने महामारी रोग अधिनियम, 1897 और आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की विभिन्न धाराओं के तहत यह केस दर्ज किया था।
पुलिस का आरोप था कि उसे सूचना मिली थी कि ये दोनों व्यक्ति दिल्ली स्थित निजामुद्दीन मरकज में धार्मिक जलसे में शामिल होने गए थे। वहां से लौटने के बाद वे प्रशासन को बिना कोई जानकारी दिए अपने परिजनों के साथ घर पर रह रहे थे। पुलिस ने इस आशंका के तहत कि वे कोरोना संक्रमित हो सकते हैं और अन्य लोगों में संक्रमण फैला सकते हैं, दोनों की चिकित्सकीय जांच कराई और उन्हें क्वारंटीन सेंटर भेज दिया। हालांकि, लैब जांच में दोनों की कोविड रिपोर्ट निगेटिव आई।
निगेटिव रिपोर्ट के बावजूद दाखिल की गई चार्जशीट
याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में पक्ष रखते हुए कहा कि उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर पूरी तरह मनगढ़ंत और आधारहीन थी। उन्होंने अदालत को बताया कि जांच एजेंसी ने स्वास्थ्य परीक्षण करने वाले डॉक्टर और पुलिसकर्मियों के बयान तो दर्ज किए, लेकिन जमीनी तथ्यों को नजरअंदाज करते हुए बेहद सतही तरीके से चार्जशीट दाखिल कर दी, जबकि उनकी रिपोर्ट पहले ही निगेटिव आ चुकी थी।
हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि राज्य सरकार ने भी इन तथ्यों का कोई विरोध नहीं किया। जस्टिस चौधरी ने कहा कि पूरी अभियोजन कार्रवाई केवल इस निराधार आशंका पर शुरू की गई थी कि वे संक्रमित हो सकते हैं और बीमारी फैला सकते हैं। जांच में रिपोर्ट निगेटिव आने के बाद यह आशंका पूरी तरह निराधार साबित हो चुकी थी, इसके बावजूद मुकदमा चलाया गया जो कानूनी दृष्टि से अनुचित है।
तबलीगी जमात से जुड़े मामलों में दिल्ली हाईकोर्ट का पिछला फैसला
निजामुद्दीन मरकज से जुड़े मामलों में यह फैसला एक अहम कानूनी नजीर है। इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने भी अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन तबलीगी जमात से जुड़े 70 भारतीय नागरिकों के खिलाफ दर्ज 16 एफआईआर और उनसे संबंधित चार्जशीट को रद्द कर दिया था। उन पर 13 से 15 मार्च 2020 के बीच मरकज में अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम आयोजित कर संक्रमण फैलाने का जोखिम पैदा करने और 24 से 30 मार्च 2020 तक विदेशी नागरिकों को मस्जिदों व घरों में ठहराने का आरोप लगा था। ये मामले 31 मार्च से 2 अप्रैल 2020 के बीच चांदनी महल, सराय रोहिल्ला और कृष्णा नगर थानों में दर्ज किए गए थे।
उस दौरान दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने शुरुआत में सात भारतीय नागरिकों के खिलाफ महामारी रोग अधिनियम की धारा 3, आपदा प्रबंधन अधिनियम और आईपीसी की कई धाराओं के तहत केस दर्ज किया था। इसके बाद जांच एजेंसी ने 955 विदेशी नागरिकों के खिलाफ विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा 14(बी) सहित अन्य धाराओं में 48 चार्जशीट और 11 सप्लीमेंट्री चार्जशीट पेश की थीं। इनमें से 908 विदेशी नागरिकों ने मजिस्ट्रेट कोर्ट में प्ली बार्गेनिंग प्रक्रिया के जरिए अपने मामले का निस्तारण कराया था।

