सुप्रीम कोर्ट ने यह अहम सवाल बड़ी बेंच के पास भेज दिया है कि क्या कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट, 2015 के तहत कमर्शियल कोर्ट के रूप में अधिसूचित सिविल जज (सीनियर डिवीजन) ट्रेडमार्क उल्लंघन से जुड़े मुकदमों की सुनवाई कर सकते हैं, जबकि ट्रेड मार्क्स एक्ट, 1999 की धारा 134 ऐसे मुकदमों को जिला अदालत से नीचे की अदालत में दायर करने पर रोक लगाती है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा कि पूर्व के फैसलों में दिखाई देने वाले टकराव के कारण इस मुद्दे पर बड़ी बेंच से स्पष्ट निर्णय आवश्यक है। कोर्ट ने जमशेदपुर के सिविल जज (सीनियर डिवीजन)-I के समक्ष लंबित कमर्शियल सूट नंबर 11/2023 की कार्यवाही पर भी रोक लगा दी है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने क्या था सवाल
अपील में मुख्य प्रश्न ट्रेड मार्क्स एक्ट की धारा 134 और कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट के बीच अधिकार-क्षेत्र को लेकर था।
धारा 134 के तहत ट्रेडमार्क उल्लंघन से जुड़े निर्दिष्ट मुकदमे ऐसी किसी अदालत में दायर नहीं किए जा सकते जो जिला अदालत से नीचे हो। विवाद इसलिए पैदा हुआ क्योंकि झारखंड में सिविल जज (सीनियर डिवीजन) को कमर्शियल कोर्ट के रूप में अधिसूचित किया गया है।
ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को यह देखना था कि क्या इस अधिसूचना के आधार पर ट्रेडमार्क उल्लंघन का मुकदमा सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के समक्ष दायर किया जा सकता है।
अपीलकर्ताओं ने कहा, धारा 134 की अनिवार्यता कमजोर नहीं की जा सकती
अपीलकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि धारा 134 का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ट्रेड मार्क्स एक्ट के तहत उल्लंघन और उससे जुड़े विवादों की सुनवाई जिला अदालत करे।
उनका कहना था कि केवल इस आधार पर कि सिविल जज (सीनियर डिवीजन) को कमर्शियल कोर्ट घोषित कर दिया गया है, ऐसे मामलों को उसके समक्ष भेजना ट्रेड मार्क्स एक्ट में दी गई व्यवस्था को कमजोर करेगा।
यह भी कहा गया कि इससे अपील की व्यवस्था प्रभावित होती है। सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के आदेश के खिलाफ अपील जिला अदालत में जाएगी, जबकि हाईकोर्ट के सामने मामला मुख्य रूप से पुनरीक्षण या संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत ही आ सकेगा, जहां साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन उसी तरह संभव नहीं होगा।
अपीलकर्ताओं का समर्थन कर रहे हस्तक्षेपकर्ता ने कहा कि धारा 134(1) में प्रयुक्त “having jurisdiction to try the suit” का संबंध क्षेत्रीय अधिकार-क्षेत्र से है और इससे यह आवश्यकता समाप्त नहीं होती कि मुकदमा जिला अदालत के समक्ष ही दायर हो।
यह भी तर्क दिया गया कि ट्रेड मार्क्स एक्ट इस विषय में विशेष कानून है, जबकि कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट कई तरह के व्यावसायिक विवादों को अपने दायरे में लेता है।
प्रतिवादियों ने कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट के प्रभाव का हवाला दिया
प्रतिवादियों ने कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट की धारा 2(1)(c)(xvii) का सहारा लिया, जिसमें पंजीकृत और अपंजीकृत ट्रेडमार्क समेत बौद्धिक संपदा अधिकारों से जुड़े विवादों को कमर्शियल डिस्प्यूट की श्रेणी में रखा गया है।
उनकी ओर से कहा गया कि कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट बाद में बना विशेष कानून है, जिसका उद्देश्य व्यावसायिक विवादों का तेजी से निपटारा करना है।
प्रतिवादियों ने धारा 21 का भी हवाला दिया, जो असंगत स्थिति में कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट को अन्य कानूनों पर प्रभावी बनाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने पुराने फैसलों की समीक्षा की
बेंच ने Kandla Export Corporation v. OCI Corporation मामले का उल्लेख किया, जिसमें आर्बिट्रेशन एंड कन्सिलिएशन एक्ट, 1996 और कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट के बीच संबंध पर विचार किया गया था।
उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आर्बिट्रेशन एक्ट को अपने विषय में एक संपूर्ण और विशेष कानून माना था और कहा था कि आर्बिट्रेशन से संबंधित अपीलों के मामले में उसी कानून की व्यवस्था लागू होगी।
बेंच ने गुजरात हाईकोर्ट के Fun N. Fud v. GLK Associates फैसले का भी जिक्र किया। यह फैसला जस्टिस पारदीवाला ने गुजरात हाईकोर्ट में रहते हुए लिखा था। उसमें कहा गया था कि आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 9 के तहत आवेदन जिला अदालत में ही सुनवाई योग्य होगा, भले ही सिविल जज (सीनियर डिवीजन) को कमर्शियल कोर्ट के रूप में अधिसूचित किया गया हो।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने Jaycee Housing Private Limited v. Registrar (General), Orissa High Court फैसले पर भी विचार किया। उस मामले में कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट के तहत जारी अधिसूचना और आर्बिट्रेशन मामलों के अधिकार-क्षेत्र का सवाल उठा था।
पूर्व के फैसलों में दिखा टकराव, बड़ी बेंच करेगी विचार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि Jaycee Housing मामले में यह माना गया था कि अधिकार-क्षेत्र के सवाल पर आर्बिट्रेशन एक्ट की धाराएं 9, 14 और 34 कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट के सामने पीछे हटेंगी।
दूसरी ओर, Kandla Export Corporation मामले में आर्बिट्रेशन एक्ट को कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट की तुलना में विशेष कानून माना गया था।
ट्रेडमार्क विवादों के संदर्भ में बेंच ने कहा कि कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट व्यापक स्तर पर कमर्शियल विवादों से संबंधित है, जबकि ट्रेडमार्क समेत बौद्धिक संपदा अधिकार उस व्यापक श्रेणी का एक हिस्सा हैं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट की धारा 21 केवल उसी स्थिति में अन्य कानून पर प्रभावी होती है, जब दोनों के बीच असंगति हो।
बेंच के अनुसार, ट्रेड मार्क्स एक्ट की धारा 134 अपने आप में कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट से असंगत नहीं है, क्योंकि जिला अदालतों को भी कमर्शियल कोर्ट के रूप में अधिसूचित किया जा सकता है। समस्या तब पैदा होती है जब सिविल जजों को कमर्शियल कोर्ट बना दिया जाता है।
बेंच ने कहा:
“समस्या केवल तब उत्पन्न होती है जब अधिसूचना के जरिए सिविल जजों को कमर्शियल कोर्ट बनाया जाता है। हमारे अनुसार, दोनों फैसलों में दिखाई देने वाले टकराव पर बड़ी बेंच को विचार करने की आवश्यकता है।”
झारखंड की व्यवस्था में कोर्ट ने दिखाई विसंगति
सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड में लागू आर्थिक अधिकार-क्षेत्र की व्यवस्था की ओर भी ध्यान दिलाया।
कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट के तहत निर्दिष्ट मूल्य कम से कम ₹3 लाख है। झारखंड में कमर्शियल कोर्ट के रूप में अधिसूचित सिविल जज (सीनियर डिवीजन) को ₹3 लाख से ₹1 करोड़ तक के मुकदमों पर अधिकार दिया गया है।
कोर्ट ने कहा कि इससे ऐसी स्थिति बन सकती है जहां ₹3 लाख से कम मूल्य वाला ट्रेडमार्क मुकदमा धारा 134 के कारण जिला अदालत में दायर होगा, जबकि उससे अधिक मूल्य वाला मुकदमा सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के समक्ष जाएगा।
बेंच ने केरल की व्यवस्था का भी उल्लेख किया, जहां बाद की अधिसूचना के जरिए जिला अदालतों और अपर जिला अदालतों को जिला जज स्तर पर कमर्शियल कोर्ट के रूप में नामित किया गया था। यह व्यवस्था आर्बिट्रेशन एक्ट, कॉपीराइट एक्ट, ट्रेड मार्क्स एक्ट, पेटेंट्स एक्ट और अन्य ऐसे कानूनों से जुड़े मामलों के लिए की गई थी, जिनमें पहली सुनवाई प्रधान दीवानी अदालत को करनी होती है।
मामला बड़ी बेंच को, जमशेदपुर का मुकदमा स्थगित
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे को बड़ी बेंच के पास भेजना जरूरी है ताकि पूर्व के फैसलों में मौजूद टकराव दूर किया जा सके और पूरे देश में एक समान कानूनी स्थिति तय हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिकार-क्षेत्र अलग-अलग राज्यों में जारी अधिसूचनाओं पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
बेंच ने कहा:
“हमारे विनम्र मत में कानून की विधायी स्वीकृति को हाईकोर्ट द्वारा जारी अधिसूचनाओं से कमजोर नहीं किया जा सकता।”
मामले को उचित आदेश के लिए भारत के चीफ जस्टिस के समक्ष रखने का निर्देश दिया गया है।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सिविल जज (सीनियर डिवीजन)-I, जमशेदपुर के समक्ष लंबित कमर्शियल सूट नंबर 11/2023 की कार्यवाही पर रोक लगा दी।
केस डिटेल्स
Case Title: I.S.D.S. Private Limited & Anr. v. M/s Khemka Food Products Pvt. Ltd. & Anr.
Case No.: Civil Appeal No. … of 2026 (@ Special Leave Petition (C) No.6793 of 2026)
Bench: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
Date: 21 सितंबर 2026

