दिल्ली हाईकोर्ट ने भ्रूण गोद लेने पर प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार से उस याचिका पर जवाब मांगा है जिसमें बांझ दंपतियों को पूर्व-निर्मित जमे हुए भ्रूण (फ्रोजन एम्ब्रायो) को गोद लेने से रोकने वाले प्रावधानों को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह प्रतिबंध समान रूप से स्थित बांझ दंपतियों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करता है।

मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने यह नोटिस डॉ. अनिरुद्ध नारायण मालपानी द्वारा दायर याचिका पर जारी किया। याचिका में सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (विनियमन) अधिनियम के सेक्शन 25(2), 27(5), 28(2), 29 और नियम 13(1)(a) को चुनौती दी गई है।

डॉ. मालपानी ने याचिका में तर्क दिया कि भ्रूण गोद लेना, जिसमें एक व्यक्ति या दंपति द्वारा आईवीएफ के ज़रिए बनाए गए अतिरिक्त भ्रूण को किसी अन्य बांझ महिला या दंपति को गर्भधारण के लिए स्वेच्छा से दान किया जाता है, एक मानवीय और सहमति पर आधारित प्रक्रिया है। लेकिन मौजूदा कानून इसे पूरी तरह प्रतिबंधित करता है।

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याचिका में कहा गया है कि भ्रूण गोद लेना और शिशु गोद लेना दोनों का उद्देश्य एक ही है—परिवार की स्थापना में सहायता करना। ऐसे में भ्रूण गोद लेने को प्रतिबंधित करना लेकिन बालक गोद लेने की अनुमति देना, केवल विकास की अवस्था के आधार पर एक असंगत और अनुचित वर्गीकरण है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है।

इसके अतिरिक्त, याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि संतान प्राप्ति का निर्णय भी निजता, गरिमा और स्वायत्तता के तहत व्यक्ति के जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) का अभिन्न हिस्सा है। ऐसे में भ्रूण गोद लेने की अनुमति न देना व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

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हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर अगली सुनवाई अप्रैल में तय की है।

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