इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में प्रोफेसरों के बड़ी संख्या में पद खाली होने पर राज्य सरकार और उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) से जवाब मांगा है। कोर्ट ने कहा कि नियमित पदों पर नियुक्तियां नहीं होना राज्य के मेडिकल कॉलेजों में गिरते मानकों का एक कारण है।
जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने राज्य सरकार को यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया कि जनवरी 2026 में अधिसूचना जारी होने के बावजूद विशेषज्ञ डॉक्टरों और मेडिकल शिक्षकों की भर्ती के लिए प्रस्तावित बोर्ड का गठन अब तक क्यों नहीं हुआ।
हाईकोर्ट ने UPPSC सचिव को लंबित भर्तियों की स्थिति पर व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का भी निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 25 नवंबर 2026 को होगी।
प्रोफेसरों के 108 पदों में केवल 26 पर नियुक्ति
राज्य सरकार की ओर से पेश आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में प्रोफेसरों के कुल 517 स्वीकृत पद हैं।
इनमें 25 प्रतिशत पद सीधी भर्ती और 75 प्रतिशत पद पदोन्नति के माध्यम से भरे जाने हैं।
सीधी भर्ती के लिए निर्धारित 108 पदों में से केवल 26 पर प्रोफेसर कार्यरत हैं। इस प्रकार 75 प्रतिशत से अधिक पद खाली हैं।
13 अक्टूबर 2026 के हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में उत्तर प्रदेश के महानिदेशक, चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण ने व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल किया।
राज्य सरकार की ओर से स्थायी अधिवक्ता सौरभ ने कोर्ट को बताया कि प्रोफेसरों के 35 पदों पर भर्ती के लिए लोक सेवा आयोग को अधियाचन भेजा जा चुका है, लेकिन अब तक विज्ञापन जारी नहीं हुआ है।
वहीं, 44 पदों के लिए 18 अगस्त 2026 को विज्ञापन जारी किया गया था और चयन प्रक्रिया जारी है।
कई विभाग संविदा कर्मचारियों और जूनियर शिक्षकों के भरोसे
हलफनामे के साथ प्रस्तुत विवरण का परीक्षण करने पर हाईकोर्ट ने पाया कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों के अधिकांश विभागों का संचालन संविदा कर्मचारियों या असिस्टेंट और एसोसिएट प्रोफेसरों के माध्यम से किया जा रहा है।
कई विभागों में प्रोफेसर के स्वीकृत पद होने के बावजूद विभागाध्यक्ष जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी इन्हीं शिक्षकों को संभालनी पड़ रही हैं।
इस स्थिति पर कोर्ट ने कहा:
“यह भी उत्तर प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों के गिरते मानकों का एक कारण है। इसलिए यह अदालत वैधानिक आवश्यकताओं के अनुसार रिक्त पदों को नहीं भरे जाने के मूल मुद्दे से आंखें नहीं मूंद सकती।”
जनवरी में अधिसूचना जारी, लेकिन भर्ती बोर्ड का गठन नहीं
हाईकोर्ट ने पाया कि 30 जनवरी 2026 को ‘उत्तर प्रदेश विशेषज्ञ चिकित्सक एवं चिकित्सा शिक्षक भर्ती बोर्ड’ के गठन के लिए अधिसूचना जारी की गई थी।
इसके बावजूद बोर्ड का गठन नहीं हुआ और नियुक्तियों की जिम्मेदारी अब भी UPPSC के पास है।
कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि प्रोफेसरों के 44 पदों के लिए विज्ञापन वर्तमान याचिका दाखिल होने के बाद ही जारी किया गया।
राज्य सरकार ने 14 जून 2024 का शासनादेश भी प्रस्तुत किया, जिसके तहत सरकारी मेडिकल कॉलेजों के प्रधानाचार्यों को संस्थानों के संचालन में उत्पन्न आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वॉक-इन इंटरव्यू के जरिए नियुक्तियां करने की अनुमति दी गई थी।
संविदा कर्मचारी की जगह दूसरे संविदा कर्मचारी की नियुक्ति से शुरू हुआ मामला
यह मामला श्रीनिवासन गांधी की याचिका से शुरू हुआ, जिन्हें हटाकर उनकी जगह दूसरे अस्थायी कर्मचारी को नियुक्त करने का प्रयास किया जा रहा था।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा करना स्थापित कानूनी सिद्धांतों के विपरीत है।
इसके बाद कोर्ट ने सरकारी मेडिकल कॉलेजों में नियमित रिक्तियां नहीं भरे जाने के कारणों की जांच शुरू की।
बेंच ने कहा कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य यह पता लगाना है कि नियमित नियुक्तियां नहीं करके ऐसी कृत्रिम परिस्थितियां क्यों पैदा की जा रही हैं, जिनके आधार पर संविदा नियुक्तियों का सहारा लेना पड़ता है।
UPPSC सचिव से तीन मुद्दों पर व्यक्तिगत हलफनामा तलब
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अख्तर अली के अनुरोध पर हाईकोर्ट ने UPPSC को मामले में आवश्यक पक्षकार बनाने की अनुमति दी।
कोर्ट ने संबंधित रिकॉर्ड की प्रति आयोग के पैनल अधिवक्ता अवनीश त्रिपाठी को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
हाईकोर्ट ने अगली सुनवाई तक राज्य सरकार के जिम्मेदार अधिकारी से भर्ती बोर्ड का गठन नहीं होने के कारणों पर हलफनामा मांगा है।
इसके अलावा UPPSC सचिव को व्यक्तिगत हलफनामे में तीन मुद्दों पर जानकारी देनी होगी:
- विज्ञापित 44 पदों की भर्ती की वर्तमान स्थिति और चयन प्रक्रिया पूरी करने की समयसीमा।
- राज्य सरकार से अधियाचन मिलने के बावजूद शेष पदों के विज्ञापन जारी नहीं करने का कारण, जबकि इसमें कोई कानूनी बाधा नहीं है।
- नियुक्तियों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए विशेषज्ञों के पैनल के गठन संबंधी दिशानिर्देश।
हाईकोर्ट ने चेतावनी दी:
“यदि अगली निर्धारित तारीख तक आवश्यक हलफनामे दाखिल नहीं किए गए, तो अदालत संबंधित अधिकारियों के खिलाफ उचित आदेश पारित करने के लिए बाध्य होगी।”
मामले की अगली सुनवाई 25 नवंबर 2026 को दोपहर 2 बजे निर्धारित की गई है।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: Srinivasan Gandhi v. State of U.P. and 3 Others
केस नंबर: Writ – A No. 13035 of 2026
पीठ: जस्टिस सिद्धार्थ नंदन
आदेश की तारीख: 3 नवंबर 2026
