मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक दीवानी विवाद में चंडीगढ़ की महिला के खिलाफ शुरू की गई एकतरफा कार्यवाही रद्द करते हुए कहा है कि वकील की लापरवाही या पेशेवर जिम्मेदारियों के निर्वहन में विफलता के कारण किसी पक्षकार को नुकसान नहीं उठाना चाहिए।
न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट ने 30 अक्टूबर के आदेश में महिला के पूर्व वकील के आचरण पर गंभीर चिंता जताई। महिला लगातार अपने मुकदमे की जानकारी मांग रही थी, लेकिन उसका वकील उसे अदालती कार्यवाही के बारे में गलत जानकारी देता रहा।
हाईकोर्ट ने कहा कि वकील का ऐसा आचरण अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 35 और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के तहत पेशेवर कदाचार का गंभीर मामला है। कोर्ट ने ऐसे वकीलों के खिलाफ उचित कार्रवाई पर विचार करने की आवश्यकता भी जताई।
व्हाट्सऐप चैट से सामने आई वकील की लापरवाही
चंडीगढ़ निवासी महिला ने इंदौर में चल रहे एक दीवानी मुकदमे में पैरवी के लिए वकील नियुक्त किया था। वह व्हाट्सऐप संदेशों के जरिए नियमित रूप से मुकदमे की प्रगति की जानकारी लेती रही, लेकिन वकील उसे वास्तविक स्थिति बताने के बजाय गलत जानकारी देता रहा।
इसी बीच, पेशी पर अनुपस्थिति के कारण ट्रायल कोर्ट ने 23 सितंबर 2025 को महिला के खिलाफ एकतरफा कार्यवाही शुरू कर दी। इसके बाद 16 फरवरी और 1 सितंबर 2026 को भी आदेश पारित किए गए।
मुकदमे की वास्तविक स्थिति का पता चलने पर महिला ने अपना वकील बदल दिया और ट्रायल कोर्ट के आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
नए वकील राघवेंद्र सिंह रघुवंशी के माध्यम से महिला ने दलील दी कि वह लगातार अपने पूर्व वकील से संपर्क कर रही थी, लेकिन उसे यह विश्वास दिलाया गया कि मुकदमे की कार्यवाही सही तरीके से चल रही है।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के रफीक बनाम मुंशीलाल और मलकियत सिंह बनाम जोगिंदर सिंह मामलों के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि वकील की लापरवाही, निष्क्रियता या कदाचार के कारण मुवक्किल को प्रतिकूल परिणाम नहीं भुगतने चाहिए।
वकील के आचरण पर हाईकोर्ट ने उठाए सवाल
व्हाट्सऐप बातचीत की जांच करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि महिला नियमित रूप से अपने मुकदमे की जानकारी ले रही थी। इसके बावजूद वकील ने उसे ट्रायल कोर्ट में हुई कार्यवाही के बारे में गलत सूचनाएं दीं।
हाईकोर्ट ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि वकील ने पहली ही पेशी पर यथास्थिति बनाए रखने के आदेश पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी।
न्यायमूर्ति भट्ट ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए इस आचरण को असामान्य बताया और वकील की भूमिका पर संदेह व्यक्त किया।
कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई कि पक्षकारों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील पूरी ईमानदारी और निष्ठा से अपनी जिम्मेदारियां नहीं निभा रहे हैं।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुकदमे की पैरवी के दौरान वकील की लापरवाही या जानबूझकर की गई चूक के लिए मुवक्किल को दंडित नहीं किया जा सकता।
बार काउंसिल से उचित कार्रवाई पर विचार करने को कहा
हाईकोर्ट ने वकीलों की पेशेवर जवाबदेही पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह के मामलों में बार काउंसिल को उचित निर्णय लेना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि जिन वकीलों के आचरण से उनके मुवक्किलों के अधिकार प्रभावित होते हैं, उनके खिलाफ उचित कार्रवाई की आवश्यकता हो सकती है।
हाईकोर्ट ने महिला की परिस्थितियों पर भी ध्यान दिया। वह मुकदमे की सुनवाई वाली जगह से काफी दूर चंडीगढ़ में रहती थी और अपने हितों की रक्षा के लिए वकील पर निर्भर थी।
अदालत ने पाया कि महिला लगातार मुकदमे की जानकारी ले रही थी और अपनी ओर से मामले पर नजर रख रही थी। ऐसे में पूर्व वकील के आचरण के कारण उसे नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता।
इन परिस्थितियों में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महिला के खिलाफ शुरू की गई एकतरफा कार्यवाही रद्द कर दी।
