सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा है कि शीर्ष अदालत पर्यावरण से जुड़े मामलों में मानव-केंद्रित नजरिए के बजाय अब प्रकृति और पारिस्थितिकी-केंद्रित (इकोसेंट्रिक) दृष्टिकोण अपनाने पर बल दे रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पर्यावरणीय कानून को अब प्रकृति को केवल संपत्ति, वस्तु या उपभोग के संसाधन के रूप में देखने की मानसिकता से बाहर निकलना होगा।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) द्वारा विज्ञान भवन में ‘द फ्यूचर ऑफ एन्वायरमेंट एंड क्लाइमेट डायनेमिक्स’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित करते हुए जस्टिस नागरत्ना ने यह बात कही। इस सम्मेलन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि पर्यावरण न्यायशास्त्र के विकास में सुप्रीम कोर्ट का योगदान अभूतपूर्व और बेहद महत्वपूर्ण रहा है। उन्होंने रेखांकित किया कि भारतीय परंपराओं में मनुष्य को प्रकृति से ऊपर नहीं, बल्कि प्रकृति के भीतर ही माना गया है। मानव-केंद्रित व्यवस्था में इंसान को ब्रह्मांड के केंद्र में रखा जाता है, जबकि पारिस्थितिकी-केंद्रित दृष्टिकोण में संपूर्ण पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र को नैतिक प्राथमिकता दी जाती है। उन्होंने कहा कि केवल मनुष्य होने के नाते इंसानी हितों को प्रकृति के अन्य घटकों पर स्वतः प्राथमिकता नहीं मिल सकती। इंसानों का अन्य जीवित प्राणियों और प्रकृति के प्रति ऐसा कर्तव्य बनता है, जो उसकी उपयोगिता से पूरी तरह स्वतंत्र है।
विकास और सामाजिक समानता के बीच संतुलन जरूरी
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि पर्यावरण से जुड़े मामलों में न्यायिक निर्णय भविष्य की दूरदर्शिता पर आधारित होते हैं। अदालतों को वर्तमान व्यवस्था का नियमन करते समय भविष्य के परिणामों के प्रति भी सजग रहना पड़ता है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट सहित दुनिया भर की कई अदालतें पर्यावरण संरक्षण को मूल सामाजिक समानता के साथ जोड़कर पर्यावरणीय न्याय को ठोस स्वरूप दे रही हैं।
उन्होंने ध्यान दिलाया कि पर्यावरण क्षरण का असर हर वर्ग और क्षेत्र पर एक समान नहीं पड़ता। कुछ समुदायों को नुकसान की सबसे भारी मार झेलनी पड़ती है, जबकि विकास के फायदे किसी अन्य हिस्से को मिलते हैं। ऐसी स्थिति में अदालतों और नीति-निर्माताओं के सामने विकास और संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और वर्तमान जरूरतों बनाम भावी पीढ़ियों के अधिकारों के बीच संतुलन साधने की गंभीर चुनौती होती है। विज्ञान, तकनीक, अर्थशास्त्र, नैतिकता और राजनीति जैसे क्षेत्रों से जुड़े होने के कारण पर्यावरण संबंधी कानूनी मानकों को नए वैज्ञानिक तथ्यों के अनुसार निरंतर ढलना पड़ता है।
सीमाओं से परे पर्यावरणीय संकट और पंच संकल्प
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि नदियां, जंगल, समुद्र और हवा किसी देश की राजनीतिक सीमाओं में नहीं बंधे हैं। जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता की क्षति और प्रदूषण जैसे संकट वैश्विक और साझा हैं। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) के जरिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संस्थागत सक्रियता बढ़ी है, जिससे स्पष्ट है कि राष्ट्रीय स्तर के प्रयास और अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियां अब एक-दूसरे से पूरी तरह जुड़ चुके हैं।
भारतीय दर्शन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पर्यावरण नेतृत्व पांच मूल तत्वों—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—से प्रेरणा लेता है। पृथ्वी हमें धैर्य और सहनशीलता सिखाती है, वायु गतिशीलता और स्वतंत्रता, अग्नि तत्परता और साहस, आकाश समानता और व्यापक सोच, तथा जल स्वच्छता और अनुकूलन की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि प्रकृति कोई निर्जीव वस्तु या बाहरी सत्ता नहीं है, बल्कि वह हमारी शिक्षक, पोषक और आत्मीय है। इस रिश्ते का टूटना ही मौजूदा पर्यावरणीय संकट की सबसे बड़ी वजह है।
इसके साथ ही उन्होंने सतत विकास से जुड़े कानून के ‘पंच सिद्धांतों’ का जिक्र किया, जिनमें प्रदूषक द्वारा हर्जाना भरने का नियम, पूर्ण दायित्व (एब्सोल्यूट लायबिलिटी), एहतियाती सिद्धांत, पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन और अंतर-पीढ़ीगत समानता शामिल हैं। उन्होंने कहा कि अदालतों का दायित्व केवल हुए नुकसान की भरपाई तक सीमित नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक अनिश्चितताओं के बीच उभरते वास्तविक जोखिमों का त्वरित समाधान करना भी है।
संस्थानों और कानूनों को मजबूत करने पर जोर
एनजीटी के अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को महज समस्याओं की पहचान करने तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसके लिए मजबूत कानूनों, प्रभावी संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों का निर्माण करना आवश्यक है। उन्होंने आगाह किया कि सीमित संसाधनों वाले वंचित तबकों पर जलवायु संकट का सबसे गहरा असर पड़ता है, इसलिए सभी कदम समावेशी और न्यायसंगत होने चाहिए।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियों का मुकाबला कोई एक संस्थान या क्षेत्र अकेले नहीं कर सकता। इसके लिए कानून, शासन, विज्ञान, अर्थशास्त्र और नागरिक समाज के साझा प्रयासों की दरकार है। उन्होंने कहा कि नए विचारों को मजबूत कानूनों, जवाबदेह शासन और प्रभावी कार्यान्वयन में बदलना ही मुख्य लक्ष्य होना चाहिए।
सम्मेलन में केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य तथा ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल ने भी अपने विचार रखे। इस दो दिवसीय वैश्विक मंच पर 17 देशों के न्यायिक प्रतिनिधियों के अलावा भारत के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों, हाईकोर्टों व जिला अदालतों के न्यायाधीशों, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों के सदस्यों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया।

