ट्रायल कोर्ट और उड़ीसा हाईकोर्ट द्वारा दी गई दोषसिद्धि को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले शामिल थे, ने कहा कि किसी अभियुक्त को परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर तब तक दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि अपराध से जुड़ी प्रत्येक कड़ी अलग-अलग साबित न हो और वे मिलकर ऐसी अटूट श्रृंखला न बनाएं जो अभियुक्त की बेगुनाही की हर संभावना को खारिज करती हो। घने अंधेरे में हुए हमले से जुड़े इस मामले में प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही पहले ही खारिज की जा चुकी थी। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि केवल हमले की आवाज या खुद हमलावरों द्वारा जलाई गई टॉर्च की रोशनी के सहारे गवाहों द्वारा आरोपियों की पहचान करना संभव नहीं था, और अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए सभी जीवित अपीलकर्ताओं को बरी कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 14 मई 2001 को घटी एक घटना से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, शाम करीब 4:00 बजे आरोपी नरेंद्र उर्फ नरहरि बेहरा शिकायतकर्ता (पीडब्ल्यू-3) के घर पहुंचा, उसने गाली-गलौज की और ध्रुब प्रधान को जान से मारने की धमकी दी। उसी शाम लगभग 7:00 बजे, हथियारों से लैस आरोपियों का एक समूह ध्रुब प्रधान की तलाश में शिकायतकर्ता के घर पहुंचा, दोबारा धमकी दी और फिर अभयपुर की ओर निकल गया।
उसी समय मृतक मोटरसाइकिल से जा रहा था, तभी आगी छक के पास उसे आरोपियों ने घेर लिया। जब उसने भागने की कोशिश की, तो आरोपियों ने उसे पकड़ लिया और पास के एक धान के खेत में ले गए। वहां उस पर लैटराइट पत्थर, ठेंगा (लाठी), लोहे की रॉड और भुजाली से हमला किया गया, जिससे उसकी मौत हो गई। बाद में उसकी मोटरसाइकिल को पास के तालाब में फेंक दिया गया। इस घटना की एफआईआर (एफआईआर संख्या 128/2001) पीडब्ल्यू-3 ने 15 मई 2001 को देर रात 2:00 बजे दर्ज कराई।
जांच पूरी होने के बाद 18 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई। एक आरोपी की मौत हो जाने के कारण उसके खिलाफ मामला समाप्त हो गया, जबकि तीन फरार आरोपियों की पत्रावली अलग कर दी गई। शेष 14 आरोपियों के खिलाफ जाजपुर के तदर्थ अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (ट्रायल कोर्ट) के समक्ष भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 148, 506/149 और 302/149 के तहत मुकदमा चला।
28 जनवरी 2004 को ट्रायल कोर्ट ने छह आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद और तीन-तीन हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई, जबकि आठ अन्य को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया।
इसके खिलाफ कटक स्थित उड़ीसा हाईकोर्ट में अपील की गई। हाईकोर्ट ने चश्मदीद गवाहों की गवाही को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि घोर अंधेरी रात में महज हमले की आवाज सुनकर हमलावरों की पहचान नहीं की जा सकती। इसके बावजूद, हाईकोर्ट ने यह मानते हुए दोषसिद्धि बरकरार रखी कि अभियोजन ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के जरिए अपना मामला साबित कर दिया है। इसके बाद सभी छह दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अपील लंबित रहने के दौरान दो अपीलकर्ताओं—उपेंद्र सेठी और मधु प्रधान—का निधन हो गया, जिससे उनके संबंध में अपील समाप्त हो गई और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चार अपीलकर्ताओं का मामला विचारार्थ रहा।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजदीपा बेहूरा और वरिष्ठ अधिवक्ता जे.के. दास ने दलील दी कि जब हाईकोर्ट ने अंधेरे और दूरी के आधार पर कथित चश्मदीद गवाहों (पीडब्ल्यू 3, 4, 10, 11, 17 और 26) की गवाही को अमान्य ठहरा दिया था, तो उसी कमजोर साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि बनाए रखना पूरी तरह अनुचित था। उन्होंने कहा कि ये सभी गवाह आपस में रिश्तेदार और संबंधित थे, तथा पीडब्ल्यू-17 का बयान अन्य गवाहों के बयानों से मेल नहीं खाता था।
बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि किसी अन्य व्यक्ति द्वारा अपराध किए जाने की प्रबल संभावना थी। पीडब्ल्यू-3 और जांच अधिकारी (पीडब्ल्यू-24) ने स्वीकार किया था कि मृतक का लंबा आपराधिक इतिहास था और उस पर हत्या व बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों सहित 13 आपराधिक मामले दर्ज थे, जिससे गांव के कई लोग उससे रंजिश रखते थे। गवाहों ने माना था कि उस रात 200 से 250 लोग मृतक की तलाश कर रहे थे। अपीलकर्ता हलाधर राउत के संबंध में वकीलों ने कहा कि गवाहों के अनुसार उसके संबंध मृतक के परिवार से मधुर थे, जिससे रंजिश या मकसद साबित नहीं होता। इसके अलावा, हथियारों या वस्तुओं की बरामदगी केवल घटनास्थल से हुई थी, किसी आरोपी की निशानदेही पर नहीं, और सैकड़ों लोगों की मौजूदगी के बावजूद किसी स्वतंत्र गवाह से पूछताछ नहीं की गई।
इसके विपरीत, ओडिशा राज्य की ओर से अधिवक्ता विष्णु कांत ने दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि दोनों अदालतों के निष्कर्ष परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की अटूट कड़ी पर आधारित हैं। उन्होंने कहा कि घटना की शुरुआत शाम 4:00 बजे की धमकी से हुई, जिसके बाद शाम 7:00 बजे हथियारों के साथ संगठित रूप से तलाश की गई और फिर आगी छक पर मृतक को रोककर मार डाला गया। राज्य ने तर्क दिया कि आईपीसी की धारा 149 के तहत गैर-कानूनी जमावड़े का सामान्य उद्देश्य सिद्ध होने के बाद प्रत्येक आरोपी के अलग कृत्य को साबित करना आवश्यक नहीं है। उन्होंने कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट बर्बर हमले से हुई हत्या की पुष्टि करती है और आरोपी यह बताने में विफल रहे कि मृतक को जबरन ले जाने के बाद क्या हुआ था।
कोर्ट का विश्लेषण और प्रमुख निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि यद्यपि मेडिकल साक्ष्यों से यह स्पष्ट है कि मौत हत्या थी, लेकिन अभियोजन यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि इस अपराध को वास्तव में अपीलकर्ताओं ने ही अंजाम दिया था।
गवाहों के बयानों की पड़ताल करते हुए पीठ ने पाया कि उनके बयानों में भारी विरोधाभास था। पीडब्ल्यू-3 ने अपनी एफआईआर में खुद के चश्मदीद होने का दावा नहीं किया था और केवल पीडब्ल्यू-17 व पीडब्ल्यू-26 को देखने वाला बताया था, जबकि पीडब्ल्यू-4 ने दावा किया कि वह, पीडब्ल्यू-3 और चार भाभियां सब एक साथ घटना देख रहे थे। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि पीडब्ल्यू-3 का आचरण अस्वाभाविक था; वह यह नहीं बता सका कि किसके हाथ में कौन सा हथियार था और घटना के बाद वह घर लौट गया तथा दो घंटे तक किसी परिजन या ग्रामीण को इसकी सूचना तक नहीं दी।
रात के अंधेरे में पहचान के मुद्दे पर पीठ ने स्टेट ऑफ यूपी बनाम अशोक कुमार मामले का संदर्भ दिया, जिसमें चांदनी रात में भी दूरी से पहचान को अविश्वसनीय माना गया था। पीठ ने उस निर्णय को उद्धृत किया:
“पहली बात तो यह कि हमें यह विश्वास करना कठिन लगता है कि अशोक कुमार द्वारा ललकारने और गोली चलाने के बाद गवाह टॉर्च जलाने और खुद पर गोली चलने का जोखिम उठाने का साहस करेंगे। दूसरे, भले ही टॉर्च जलाई गई हो, लेकिन लंबी दूरी को देखते हुए गवाहों के लिए पूरी निश्चितता के साथ प्रतिवादियों की पहचान करना संभव नहीं होगा।”
इसके अलावा, अदालत ने तमिलसेल्वन बनाम राज्य के फैसले का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि जब हमलावर टॉर्च लिए होते हैं, तो उसकी रोशनी गवाहों की आंखों को चौंधिया देती है:
“वास्तव में हमलावरों की टॉर्च के कारण अभियोजन पक्ष के गवाह टॉर्च की रोशनी से आंशिक रूप से चौंधिया गए होंगे और किसी की पहचान करने में सक्षम नहीं रहे होंगे।”
चश्मदीदों की गवाही खारिज होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बाकी बचे परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कानूनी कसौटी पर जांच की। पीठ ने शरद बिरधीचंद सारडा बनाम महाराष्ट्र राज्य के ऐतिहासिक फैसले में प्रतिपादित पंचसूत्र का उल्लेख किया, जिसके अनुसार परिस्थितियां पूरी तरह स्थापित होनी चाहिए और उनका एकमात्र निष्कर्ष आरोपी का दोष ही होना चाहिए।
कमल बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) का हवाला देते हुए पीठ ने रेखांकित किया:
“यह माना गया है कि संबंधित परिस्थितियां ‘साबित होनी ही चाहिए’ न कि ‘साबित हो सकती हैं’। यह माना गया है कि ‘साबित किया जा सकता है’ और ‘साबित होना ही चाहिए’ के बीच न केवल व्याकरणिक बल्कि कानूनी अंतर भी है।”
अदालत ने आगे स्पष्ट किया:
“यह कानून का एक स्थापित सिद्धांत है कि संदेह कितना भी गहरा क्यों न हो, वह उचित संदेह से परे सबूत का स्थान नहीं ले सकता।”
पीठ ने अब्दुल नासर बनाम केरल राज्य के सिद्धांतों को लागू किया, जिसमें कहा गया था:
“आपराधिक परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की प्रत्येक कड़ी की बारीकी से जांच की जानी चाहिए ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या प्रत्येक परिस्थिति व्यक्तिगत रूप से साबित हुई है और क्या समग्र रूप से वे एक ऐसी अटूट कड़ी बनाती हैं जो केवल अभियुक्त के दोष की परिकल्पना से सुसंगत हो और उसकी बेगुनाही से पूरी तरह असंगत हो।”
हाईकोर्ट द्वारा गिनाई गई आठ परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि पूर्व में दी गई धमकी और एकत्र होने की बात विरोधाभासी गवाहियों पर टिकी है, जबकि घने अंधेरे में आवाज और हमले की ध्वनि से पहचान का दावा कानूनी रूप से साबित नहीं होता।
इसके अलावा, अदालत ने अभियोजन के 53 किलोग्राम वजनी लैटराइट पत्थर से वार करने के दावे को भी आधारहीन पाया। इस बात का कोई सबूत नहीं था कि इतना भारी पत्थर कौन और कैसे लाया, न ही पुलिस इस कथित पत्थर को बरामद कर सकी। मेडिकल ऑफिसर (पीडब्ल्यू-18) ने भी गवाही दी थी कि जांच अधिकारी ने राय लेने के लिए ऐसा कोई पत्थर या हथियार उनके पास भेजा ही नहीं था।
अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष ऐसी पूर्ण और सुसंगत परिस्थितियों की श्रृंखला स्थापित करने में विफल रहा जो अभियुक्तों के दोष के अलावा अन्य सभी संभावनाओं को बाहर करती हो। साक्ष्यों में कई गंभीर कमियां थीं, जिनसे संदेह पैदा होता है। फौजदारी कानून के इस बुनियादी सिद्धांत को दोहराते हुए कि जहां दो उचित दृष्टिकोण संभव हों, वहां आरोपी के पक्ष वाला दृष्टिकोण ही मान्य होना चाहिए, सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों को संदेह का लाभ दिया।
अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए उड़ीसा हाईकोर्ट के 6 मई 2009 के फैसले तथा ट्रायल कोर्ट के 28 जनवरी 2004 के दोषसिद्धि और सजा के आदेश को निरस्त कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: कार्तिक उर्फ कीर्तन उर्फ कीर्तन चरण जेना और अन्य बनाम ओडिशा राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1047-1048/2010 साथ में क्रिमिनल अपील संख्या 2223/2010
पीठ: जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले
निर्णय की तिथि: 18 सितंबर, 2026

