आवश्यक सेवाओं में तैनात कर्मचारी भी माने जाएंगे ‘कोविड ड्यूटी’ पर, इलाहाबाद हाईकोर्ट का मुआवजा देने का बड़ा आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि महामारी के दौरान बिजली, जल आपूर्ति और टेलीफोन जैसे आवश्यक सेवा विभागों में कार्यरत कर्मचारी ‘कोविड ड्यूटी’ पर माने जाएंगे। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वह बिजली विभाग के उस कर्मचारी की पत्नी को अनुग्रह राशि (Ex-gratia) जारी करे, जिसकी कोरोना संक्रमण के कारण मृत्यु हो गई थी।

जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने राज्य सरकार के उस तर्क को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि ‘कोविड ड्यूटी’ का अर्थ केवल उन लोगों से है जो सीधे अस्पतालों में मरीजों के इलाज में लगे थे। अदालत ने सरकार की इस व्याख्या को ‘अत्यंत संकीर्ण’ (Very Narrow) करार दिया।

हाईकोर्ट ने अपने 17 अप्रैल के आदेश में कहा, “हम राज्य सरकार द्वारा पारित उस आदेश को स्वीकार करने में असमर्थ हैं जिसमें कोविड ड्यूटी की बहुत ही सीमित व्याख्या की गई है और इसे केवल उन्हीं लोगों तक सीमित रखा गया है जिन्हें विशेष रूप से अस्पतालों में लोगों के इलाज के लिए तैनात किया गया था।”

यह आदेश उस याचिका पर आया है जिसमें सरकार के 28 जुलाई, 2023 के फैसले को चुनौती दी गई थी। सरकार ने तब यह कहते हुए मुआवजा देने से इनकार कर दिया था कि मृतक कर्मचारी विशेष रूप से कोविड कार्यों में नहीं लगा था।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि लॉकडाउन और क्वारंटीन के कठिन समय में बिजली विभाग ने एक ‘लाइफलाइन’ की तरह काम किया। अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में ऑक्सीजन मशीनें, वेंटिलेटर और अन्य जीवन रक्षक उपकरण बिना बिजली के नहीं चल सकते थे।

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कोर्ट ने इन दलीलों से सहमति जताते हुए कहा कि इन सेवाओं की निरंतर आपूर्ति ने ही सरकार को महामारी को रोकने, मरीजों का इलाज करने और नागरिकों को उनके घरों में सुरक्षित रखने में मदद की। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि उस दौरान पानी या बिजली की आपूर्ति ठप हो जाती, तो आम जनता का जीवन अत्यंत कष्टकारी हो जाता।

अदालत ने अपने फैसले में एक पुराने मामले (को-ऑर्डिनेट बेंच के निर्णय) का हवाला दिया, जिसमें पुलिस विभाग के एक हेड कांस्टेबल की मृत्यु पर उसके परिजनों को मुआवजा दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि बिजली, जल आपूर्ति और टेलीफोन विभाग के कर्मचारी भी उसी प्रकार आवश्यक सेवा की श्रेणी में आते हैं।

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हाईकोर्ट ने पाया कि सरकार के पास मुआवजे के दावे को खारिज करने का कोई ठोस आधार नहीं था। इसके साथ ही अदालत ने 2023 के सरकारी आदेश को रद्द कर दिया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य अधिकारियों को सख्त निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता को 30 दिनों के भीतर अनुग्रह राशि का भुगतान किया जाए।

बेंच ने अपने आदेश के अंत में कहा, “रिट याचिका स्वीकार की जाती है। राज्य सरकार को निर्देश दिया जाता है कि वह 30 दिनों की अवधि के भीतर याचिकाकर्ता को अनुग्रह राशि जारी करे।”

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