दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को पूर्व इलाहाबाद हाईकोर्ट जज जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास पर कथित रूप से बेहिसाबी नकदी मिलने के मामले में FIR दर्ज करने और CBI जांच की मांग वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया।
जस्टिस अमित बंसल ने याचिकाकर्ता और अधिवक्ता घनश्याम उपाध्याय को याचिका वापस लेने की अनुमति दी। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के पास वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध है और इस मामले में याचिका दाखिल करने के उनके अधिकार पर भी सवाल उठाया।
याचिका में मार्च 2025 में दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास से कथित नकदी बरामदगी की जांच के लिए FIR दर्ज करने और विशेष जांच दल गठित करने की मांग की गई थी।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस कार्यवाही को “wild witch hunt” बताते हुए स्पष्ट किया कि वह याचिका पर विचार करने के पक्ष में नहीं है।
स्वतंत्र जांच की मांग की गई थी
उपाध्याय ने दलील दी कि न तो मजिस्ट्रेट और न ही विशेष अदालत इस मामले में उस तरह से कार्रवाई करने में सक्षम है, जिससे उनके अनुसार न्याय सुनिश्चित हो सके।
सरकार, CBI और दिल्ली पुलिस की ओर से पेश स्थायी अधिवक्ता प्रेमतोष कुमार मिश्रा ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि उपाध्याय के पास ऐसी राहत मांगने का अधिकार नहीं है और उनके लिए वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध है।
मिश्रा ने यह भी बताया कि उपाध्याय इससे पहले इसी तरह की राहत के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख कर चुके थे, लेकिन उनकी याचिका खारिज कर दी गई थी और उन्हें हाईकोर्ट जाने की कोई स्वतंत्रता नहीं दी गई थी।
इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने उपाध्याय को याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी।
सरकारी आवास में आग लगने के बाद सामने आया था मामला
यह विवाद उस समय शुरू हुआ जब जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर आग लग गई थी। उस समय वह दिल्ली हाईकोर्ट के जज थे।
इसके बाद कुछ वीडियो सामने आए, जिनमें कथित रूप से जलते हुए नोटों के बंडल दिखाई दे रहे थे।
घटना के समय जस्टिस वर्मा और उनकी पत्नी मध्य प्रदेश की यात्रा पर थे, जबकि उनकी बेटी और बुजुर्ग मां आवास पर मौजूद थीं।
जस्टिस वर्मा ने कहा था कि न तो उन्होंने और न ही उनके परिवार के किसी सदस्य ने संबंधित स्थान पर कोई पैसा रखा था।
इन-हाउस जांच समिति की गई थी गठित
तत्कालीन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस संजीव खन्ना ने आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय इन-हाउस समिति गठित की थी।
समिति ने मई 2025 में अपनी रिपोर्ट सौंपी और जस्टिस वर्मा के स्पष्टीकरण को असंतोषजनक पाया।
इसके बाद जस्टिस खन्ना ने जस्टिस वर्मा से इस्तीफा देने या महाभियोग की कार्यवाही का सामना करने को कहा। जस्टिस वर्मा द्वारा पद छोड़ने से इनकार किए जाने के बाद जांच रिपोर्ट और उनका जवाब राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री को भेजा गया और उनके खिलाफ संवैधानिक पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू करने की सिफारिश की गई।
इसके बाद जस्टिस वर्मा को उनके मूल इलाहाबाद हाईकोर्ट वापस भेज दिया गया और आगे की कार्रवाई लंबित रहने तक उनसे न्यायिक कार्य वापस ले लिया गया।
संसद में भी शुरू हुई थी जांच प्रक्रिया
लोकसभा ने 2025 में जस्टिस वर्मा को हटाने से संबंधित प्रस्ताव स्वीकार किया और जांच के लिए एक समिति गठित की।
राज्यसभा ने इसी तरह के समानांतर प्रस्ताव को प्रक्रियागत खामियों का हवाला देते हुए स्वीकार नहीं किया।
संसदीय जांच जारी रहने के दौरान जस्टिस वर्मा ने अप्रैल में इस्तीफा दे दिया।
अगस्त में तीन सदस्यीय जांच समिति ने उनके सरकारी आवास पर कथित बेहिसाबी नकदी से संबंधित उनके स्पष्टीकरण को “टालमटोल वाला” और “भ्रामक” बताया।

