इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने आपराधिक मामलों में कैविएट दाखिल करने की व्यवस्था नहीं होने से संबंधित जनहित याचिका का निस्तारण करते हुए इस मुद्दे पर प्रशासनिक स्तर पर विचार करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि याचिका प्रथम दृष्टया न्याय तक पहुंच से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है।
जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की डिवीजन बेंच ने 3 नवंबर 2026 को पारित आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को दिए गए प्रतिवेदन पर प्रशासनिक स्तर पर विचार किया जाए।
आपराधिक मामलों में कैविएट की व्यवस्था बनाने की मांग
यह जनहित याचिका हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाली अधिवक्ता अनुप्रिया अग्रवाल ने दाखिल की थी।
याचिका में इलाहाबाद हाईकोर्ट नियमावली, 1952 के अध्याय 22 के नियम 5 में संशोधन या अतिरिक्त प्रावधान करने पर विचार करने का निर्देश देने की मांग की गई थी, ताकि आपराधिक कार्यवाहियों में कैविएट दाखिल करने, उसका पंजीकरण करने, प्रक्रिया पूरी करने और संबंधित पक्षों को सूचना देने की औपचारिक व्यवस्था बनाई जा सके।
याचिकाकर्ता ने मांग की कि यह व्यवस्था आपराधिक पुनरीक्षण, आपराधिक अपील, नियमित जमानत, अग्रिम जमानत तथा दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धाराओं 482 और 483 के तहत दाखिल याचिकाओं पर लागू हो।
इसके अतिरिक्त भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धाराओं 528 और 529 के तहत दाखिल याचिकाओं को भी इसमें शामिल करने का अनुरोध किया गया।
याचिकाकर्ता ने 13 अक्टूबर 2026 को दिए अपने प्रतिवेदन पर एक महीने के भीतर कारणयुक्त निर्णय लेने का निर्देश भी मांगा था।
इस संबंध में पीड़ितों और शिकायतकर्ताओं के वैधानिक अधिकारों, निष्पक्ष प्रक्रिया, आरोपियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आपराधिक न्याय के शीघ्र निस्तारण को ध्यान में रखने का आग्रह किया गया।
पीड़ित पक्ष के वकीलों को मामलों की जानकारी प्राप्त करने में कठिनाई
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सक्षम अग्रवाल ने दलील दी कि इलाहाबाद हाईकोर्ट नियमावली, 1952 में आपराधिक मामलों में कैविएट दाखिल करने का कोई प्रावधान नहीं है।
उन्होंने कहा कि कानून में पीड़ित पक्ष के अधिकारों को मान्यता प्राप्त है, लेकिन कैविएट की व्यवस्था नहीं होने से पीड़ित के अधिवक्ता को संबंधित मुकदमों की जानकारी रखने और उनमें अपना पक्ष रखने में कठिनाई होती है।
राज्य सरकार की ओर से अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता को भी सुना गया।
न्याय तक पहुंच से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा: हाईकोर्ट
दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि याचिका में उठाया गया प्रश्न विचार करने योग्य है।
बेंच ने कहा:
“प्रथम दृष्टया, यह जनहित याचिका न्याय तक पहुंच और उसे सुगम बनाने से संबंधित एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाती है। यह मूलतः प्रक्रिया से जुड़ा विषय है।”
कोर्ट ने उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता का प्रतिवेदन हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को संबोधित है।
इसलिए बेंच ने निर्देश दिया कि हाईकोर्ट प्रशासनिक स्तर पर प्रतिवेदन पर विचार करे।
इसी निर्देश के साथ जनहित याचिका का निस्तारण कर दिया गया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: Anupriya Agarwal v. State of U.P. Thru. Prin. Secy. Law/Legal Remembrancer Lko. and Another
केस नंबर: Public Interest Litigation (PIL) No. 1053 of 2026
पीठ: जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला
आदेश की तारीख: 3 नवंबर 2026
