सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों के त्वरित निपटारे की मांग करने वाली 2016 की जनहित याचिका पर तत्काल सुनवाई करने पर सहमति दे दी है। शीर्ष अदालत को सौंपी गई एक ताजा रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है कि देश के करीब 40 प्रतिशत निर्वाचित जनप्रतिनिधि आपराधिक मुकदमों का सामना कर रहे हैं।
शुक्रवार को चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष इस मामले में न्यायमित्र (एमीकस क्यूरी) के रूप में वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने तत्काल हस्तक्षेप का अनुरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि जनप्रतिनिधियों के खिलाफ मामलों के तेजी से निपटारे के लिए कुछ फौरी निर्देश जारी किए जाने बेहद जरूरी हैं। इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सहमति जताते हुए कहा कि मामले को जल्द सूचीबद्ध किया जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पूर्व के आदेशों के तहत इस पर तीन जजों की पीठ सुनवाई कर सकती है।
संसद और विधानसभाओं में आपराधिक मुकदमों के आंकड़े चिंताजनक
न्यायमित्र विजय हंसारिया द्वारा राजनीति के अपराधीकरण पर दाखिल ताजा रिपोर्ट और हलफनामे के अनुसार, देश भर में सांसदों और विधायकों (सांसदों व विधायकों) के खिलाफ 4,000 से अधिक आपराधिक मामले अदालत में लंबित हैं।
रिपोर्ट के आंकड़ों से पता चलता है कि संसद के दोनों सदनों में बड़ी संख्या में दागी चेहरे मौजूद हैं। लोकसभा के 543 सदस्यों में से 251 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं, जबकि राज्यसभा के 233 सदस्यों में से 75 सांसदों पर आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं।
इसके अलावा, रिपोर्ट में यह तथ्य भी रेखांकित किया गया है कि देश के कुल 28 राज्यों में से 14 राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अपने चुनावी हलफनामों में खुद पर आपराधिक मामलों की घोषणा की है, जिनमें कई गंभीर अपराधों से जुड़े हैं।
राज्यों के नेतृत्व में मुकदमों के मामले में तेलंगाना के मुख्यमंत्री अनुमुला रेवंत रेड्डी 89 मामलों के साथ शीर्ष पर हैं। वहीं, पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी 29 मुकदमों के साथ दूसरे और कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार 19 मामलों के साथ तीसरे स्थान पर हैं।
अदालती निगरानी के बाद भी नहीं घटा मुकदमों का बोझ
हंसारिया ने पीठ को अवगत कराया कि सुप्रीम कोर्ट और राज्यों के हाईकोर्टों द्वारा लगातार निगरानी किए जाने के बावजूद 2018 से अब तक जनप्रतिनिधियों के खिलाफ लंबित मामलों की कुल संख्या लगभग जस की तस बनी हुई है और इसमें कोई उल्लेखनीय गिरावट नहीं देखी गई है।
इससे पहले 9 नवंबर 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने सांसदों और विधायकों के खिलाफ 5,000 से अधिक मामलों के तेजी से निस्तारण के उद्देश्य से व्यापक निर्देश जारी किए थे। उस समय शीर्ष अदालत ने सभी हाईकोर्टों को इन मुकदमों की प्रगति पर नजर रखने के लिए एक विशेष पीठ गठित करने का आदेश दिया था।
साथ ही, सांसदों, विधायकों और विधान परिषद सदस्यों (MLC) के मुकदमों की सुनवाई के लिए गठित विशेष अदालतों को निर्देश दिया गया था कि वे इन मामलों को सर्वोच्च प्राथमिकता दें और दुर्लभ व अपरिहार्य कारणों के बिना सुनवाई को न टालें।
जस्टिस वी. मोहना के हटने के बाद आया नया अनुरोध
मामले की जल्द सुनवाई की यह मांग पीठ में हुए एक हालिया फेरबदल के बाद आई है। बीते 18 अगस्त को इस पीठ की सदस्य जस्टिस वी. मोहना ने खुद को इस मामले की सुनवाई से अलग कर लिया था। उन्होंने स्पष्ट किया था कि पीठ का हिस्सा बनने से पहले वह एक वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में इस मामले में पैरवी कर चुकी हैं।

