आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट की घटना पर सुप्रीम कोर्ट ने बंद की कार्यवाही; ग्रीवांस रिड्रेसल कमेटी बनाने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में एक न्यायाधीश और युवा अधिवक्ता के बीच हुई घटना के संबंध में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) द्वारा दायर याचिकाओं का निपटारा कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि हालांकि मामला आपसी सहमति से सुलझ गया है, लेकिन इसने बार और बेंच के रिश्तों को बेहतर बनाने और युवा वकीलों के पेशेवर विकास के लिए एक संस्थागत तंत्र की आवश्यकता को रेखांकित किया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद 6 मई, 2026 को आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में हुई एक घटना के बाद शुरू हुआ था। सोशल मीडिया पर प्रसारित एक वीडियो में हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश और एक युवा वकील के बीच तीखी बहस देखी गई थी। आरोप था कि न्यायाधीश ने वकील की कार्यशैली पर नाराजगी जताते हुए उन्हें 24 घंटे की न्यायिक हिरासत में भेजने का मौखिक आदेश दिया और पुलिस को उन्हें रजिस्ट्रार (न्यायिक) के पास ले जाने का निर्देश दिया।

SCBA और BCI द्वारा इस घटना पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखे जाने के बाद अदालत ने इस मामले पर विचार किया।

रिपोर्ट और आपसी समझौता

सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से इस मामले में रिपोर्ट मांगी थी। 6 मई, 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, विवाद एक कानूनी मिसाल (judicial precedent) को लेकर शुरू हुआ था। स्थिति तब और बिगड़ गई जब न्यायाधीश को लगा कि वकील ने गुस्से में अपनी फाइल पोडियम पर पटकी है, जबकि वकील का कहना था कि फाइल उनके हाथ से गलती से फिसल गई थी।

रिपोर्ट में निम्नलिखित तथ्य स्पष्ट किए गए:

  • सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो “अधूरा और संदर्भ से परे” था।
  • वीडियो वायरल होने से पहले ही दोनों पक्षों के बीच मामला सुलझ चुका था।
  • युवा वकील ने पुष्टि की कि गलतफहमी दूर हो गई है और उन्हें अपना काम करने में “कोई डर या चिंता नहीं है।”
  • हिरासत का कोई भी औपचारिक न्यायिक आदेश रिकॉर्ड में नहीं लिया गया और न ही लागू किया गया।
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इस घटना के बाद, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने भविष्य में सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखने के लिए पांच न्यायाधीशों की एक समिति और एक ग्रीवांस रिड्रेसल कमेटी का गठन किया है।

अदालत का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि फाइल गिरना “किसी जानबूझकर किए गए कृत्य का परिणाम नहीं था” और न्यायाधीश की मौखिक टिप्पणियां किसी न्यायिक आदेश का हिस्सा नहीं बनीं।

पीठ ने कानूनी पेशे को संवारने में बेंच और बार की साझा जिम्मेदारी पर जोर देते हुए कहा:

“बेंच पर एक मजबूत और नैतिक कानूनी पेशे को विकसित करने की समान जिम्मेदारी है, जो योग्यता, ईमानदारी और कर्तव्य की भावना को बढ़ावा दे, ताकि हर युवा वकील को पहले अदालत के एक अधिकारी के रूप में और फिर किसी मामले के प्रतिनिधि के रूप में अपनी भूमिका को पहचानने के लिए निर्देशित किया जा सके।”

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अदालत ने मीडिया और सोशल मीडिया की भूमिका पर भी टिप्पणी की:

“पूरे संदर्भ को प्रस्तुत किए बिना वीडियो क्लिप प्रसारित करने से संस्थानों के साथ-साथ न्याय प्रशासन को भी बेवजह नुकसान पहुंच सकता है।”

अंतिम निर्णय और दिशा-निर्देश

मामले को सुलझा हुआ मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आगे की कार्यवाही की आवश्यकता को खारिज कर दिया, लेकिन निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. ग्रीवांस रिड्रेसल कमेटी: कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वे बार एसोसिएशनों और बार काउंसिलों के प्रतिनिधियों को शामिल करते हुए ग्रीवांस रिड्रेसल कमेटियों का गठन करें। ऐसी समितियां जिला और तालुका स्तर पर भी बनाई जानी चाहिए।
  2. ओरिएंटेशन प्रोग्राम: BCI और राज्य बार काउंसिलों से अपेक्षा की गई है कि वे नए वकीलों के लिए अखिल भारतीय स्तर पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करें।
  3. न्यायिक धैर्य: अदालत ने कहा कि न्यायपालिका को युवा वकीलों के प्रति “धैर्य, करुणा और प्रोत्साहन की भावना” प्रदर्शित करनी चाहिए।
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इन शर्तों के साथ याचिकाओं का निपटारा कर दिया गया।

मामले का विवरण

केस का शीर्षक: बार काउंसिल ऑफ इंडिया बनाम आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट (रिट याचिका (सिविल) संख्या 604/2026 के साथ)

केस संख्या: रिट याचिका (सिविल) संख्या 602/2026

पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची

दिनांक: 11 मई, 2026

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