इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने स्पष्ट किया है कि ऐसा रियल एस्टेट प्रोजेक्ट, जिसमें डेवलपर के पास केवल लीजहोल्ड अधिकार हैं और उसके पास यूनिट बेचने का अधिकार नहीं है, वह रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट, 2016 के दायरे में नहीं आता है। कोर्ट ने कहा कि एक्ट के तहत किसी व्यक्ति को ‘प्रमोटर’ (Promoter) मानने और किसी विकास कार्य को ‘रियल एस्टेट प्रोजेक्ट’ के रूप में वर्गीकृत करने के लिए ‘बिक्री’ (Sale) का तत्व एक अनिवार्य शर्त है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला तब शुरू हुआ जब मेसर्स मां भगवती कमर्शियल रियलिटी एन रिसॉर्ट्स एलएलपी (प्रतिवादी) ने 2 फरवरी, 2025 को अपने प्रोजेक्ट ‘साम्राज्य’ के लिए यूपी रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (RERA) के पास पंजीकरण के लिए आवेदन किया। यह प्रोजेक्ट एक सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट ‘उदासीन संगत ऋषि आश्रम’ की भूमि पर विकसित किया जा रहा था, जिसने प्रतिवादी को 29 साल और 11 महीने की अवधि के लिए जमीन लीज पर दी थी।
यूपी रेरा ने 4 मार्च, 2025 को पंजीकरण आवेदन को खारिज कर दिया था। अथॉरिटी ने ट्रस्ट द्वारा सब-लीजिंग अधिकार देने की शक्ति पर सवाल उठाए थे और लीज की सीमित अवधि का उल्लेख किया था। इसके खिलाफ प्रतिवादी ने रियल एस्टेट अपीलीय न्यायाधिकरण (REAT), लखनऊ में अपील की, जिसने 25 सितंबर, 2025 को अपील स्वीकार करते हुए रेरा को पंजीकरण देने का निर्देश दिया। इसके बाद यूपी रेरा ने न्यायाधिकरण के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (यूपी रेरा) का तर्क था कि प्रतिवादी एक्ट की धारा 2(zk) के तहत ‘प्रमोटर’ की परिभाषा में नहीं आता क्योंकि वह यूनिट बेच नहीं सकता और केवल सब-लीज के माध्यम से लीजहोल्ड अधिकार दे सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि एक्ट की धारा 17 के तहत प्रमोटर को आवंटियों के पक्ष में पंजीकृत कन्वेंस डीड (Conveyance Deed) निष्पादित करनी होती है, जो इस मामले में संभव नहीं था क्योंकि प्रतिवादी स्वयं केवल एक पट्टेदार (Lessee) था।
प्रतिवादी ने शुरुआत में पंजीकरण की मांग की थी, लेकिन बाद में एक संक्षिप्त जवाबी हलफनामा दायर कर अथॉरिटी के इस रुख से सहमति जताई कि वे एक्ट के दायरे से बाहर हैं। उन्होंने दलील दी कि चूंकि उनके पास बेचने का अधिकार नहीं है और वे केवल सब-लीज दे सकते हैं, इसलिए वे धारा 2(zk) के तहत ‘प्रमोटर’ नहीं हैं और उन्हें पंजीकरण की आवश्यकता से मुक्त किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस सैयद कमर हसन रिज़वी ने 2016 के एक्ट की धारा 2(zk) के तहत ‘प्रमोटर’ और धारा 2(zn) के तहत ‘रियल एस्टेट प्रोजेक्ट’ की परिभाषाओं का विश्लेषण किया। हाईकोर्ट ने अवलोकन किया:
“रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट, 2016 के अर्थ के भीतर किसी व्यक्ति के प्रमोटर होने के लिए बिक्री का उद्देश्य एक अनिवार्य शर्त (Sine-qua-non) है, लेकिन प्रतिवादी के पास, स्वीकार्य रूप से, संपत्ति बेचने का अधिकार नहीं है।”
कोर्ट ने आगे कहा कि वैधानिक प्रावधानों को मिलाकर पढ़ने पर एक्ट लागू होने के लिए दो अनिवार्य शर्तें सामने आती हैं:
- विकास या निर्माण गतिविधि होनी चाहिए।
- ऐसी गतिविधि आवंटियों को बिक्री के उद्देश्य से की जानी चाहिए।
कोर्ट ने डिस्ट्रिक्ट माइनिंग ऑफिसर बनाम टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (2001) और मेसर्स न्यूटेक प्रमोटर्स एंड डेवलपर्स बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2021) के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए इस बात पर जोर दिया कि कानूनों की व्याख्या विधायिका के शाब्दिक और वास्तविक इरादे के अनुसार की जानी चाहिए।
बेंच ने टिप्पणी की:
“एक पट्टेदार, जो संभावित आवंटियों को इकाइयां नहीं बेचता है, ‘प्रमोटर’ के दायरे में नहीं आता है। इसके अलावा, धारा 2(zn) के अनुसार, एक ‘रियल एस्टेट प्रोजेक्ट’ अनिवार्य रूप से बिक्री के उद्देश्य से किए गए विकास की परिकल्पना करता है।”
कोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि प्रतिवादी के पास प्लॉट, अपार्टमेंट या बिल्डिंग बेचने का कानूनी अधिकार नहीं है, इसलिए प्रोजेक्ट पर एक्ट की धारा 5 के तहत अनिवार्य पंजीकरण के प्रावधान लागू नहीं होते हैं।
कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी “न तो पंजीकरण कराने के लिए बाध्य है और न ही उसे पंजीकरण प्राप्त करने के लिए मजबूर किया जा सकता है।” नतीजतन, हाईकोर्ट ने अपील का निपटारा करते हुए कहा कि यूपी रेरा पंजीकरण संख्या या लॉगिन आईडी प्रदान करने के लिए बाध्य नहीं है। इसके अलावा, कोर्ट ने अथॉरिटी को प्रतिवादी के प्रोजेक्ट के खिलाफ जारी निषेधात्मक और प्रतिबंधात्मक क्लॉज (फॉर्म-डी) वापस लेने का निर्देश दिया।
मामले का विवरण:
- मामले का शीर्षक: यूपी रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी बनाम मेसर्स मां भगवती कमर्शियल एलएलपी रियलिटी एन रिसॉर्ट्स
- केस संख्या: रेरा अपील संख्या 169 वर्ष 2025
- बेंच: जस्टिस सैयद कमर हसन रिज़वी
- दिनांक: 8 मई, 2026

