अमरावती स्थित आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (सीपीसी) के आदेश 38 नियम 5 के तहत उपलब्ध वैधानिक उपाय अपनाए बिना सीधे संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट की पर्यवेक्षी अधिकारिता का आह्वान नहीं किया जा सकता। अदालत ने एक लंबित वाणिज्यिक वाद में दायर सिविल रिवीजन याचिका खारिज करते हुए कहा कि सीपीसी में उपलब्ध उपाय को दरकिनार कर सीधे हाईकोर्ट आने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी की पीठ ने यह आदेश एम/एस वी.डिजिटल्स एवं अन्य द्वारा दायर याचिका पर पारित किया।
विवाद की पृष्ठभूमि
मामला विशाखापट्टनम की द्वादश अतिरिक्त जिला न्यायाधीश अदालत में लंबित मूल वाद संख्या 57/2026 से जुड़ा है, जिसे एम/एस बाबा फ्लेक्स ने दायर किया था। वाद की कार्यवाही के दौरान वादी ने प्रतिवादियों की संपत्ति कुर्क करने की मांग करते हुए आवेदन दाखिल किया।
इस आवेदन पर ट्रायल कोर्ट ने आदेश 38 नियम 5 सीपीसी के तहत प्रतिवादियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया। अदालत ने उन्हें वाद राशि के संबंध में सुरक्षा राशि उपलब्ध कराने का निर्देश दिया और यह भी कहा कि आदेश का पालन न होने पर याचिका अनुसूची में वर्णित संपत्ति, जो दूसरे प्रतिवादी के नाम पर है, कुर्क की जा सकती है।
प्रतिवादियों ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष आपत्ति दाखिल करने के बजाय सीधे हाईकोर्ट में अनुच्छेद 227 के तहत सिविल रिवीजन याचिका दाखिल कर दी।
याचिकाकर्ताओं की दलील
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता पी.एस.पी. सुरेश कुमार ने तर्क दिया कि आदेश 38 नियम 5 के तहत अदालत की शक्ति का प्रयोग यांत्रिक तरीके से नहीं किया जा सकता और ट्रायल कोर्ट ने बिना उचित आधार के नोटिस जारी कर दिया।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय रमन टेक एंड प्रोसेस इंजीनियरिंग कंपनी बनाम सोलंकी ट्रेडर्स [(2008) 2 एससीसी 302] पर भरोसा जताया, जिसमें कहा गया था कि आदेश 38 नियम 5 के तहत शक्ति “अत्यंत कठोर और असाधारण” प्रकृति की है तथा इसका प्रयोग केवल सीमित परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले में कहा था:
“आदेश 38 नियम 5 सीपीसी के तहत शक्ति अत्यंत कठोर और असाधारण प्रकृति की है। इसका प्रयोग यांत्रिक तरीके से या केवल मांग किए जाने भर से नहीं किया जाना चाहिए। इसका उपयोग सीमित रूप से और नियम के अनुरूप ही होना चाहिए। आदेश 38 नियम 5 का उद्देश्य असुरक्षित ऋण को सुरक्षित ऋण में बदलना नहीं है। यदि कोई वादी इस प्रावधान का उपयोग प्रतिवादी पर दबाव बनाकर वाद का निपटारा कराने के साधन के रूप में करता है, तो ऐसी कोशिशों को हतोत्साहित किया जाना चाहिए।”
वादी पक्ष की ओर से हाईकोर्ट में कोई अधिवक्ता उपस्थित नहीं हुआ।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने माना कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानूनी सिद्धांतों पर कोई विवाद नहीं है, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि वर्तमान मामले में ट्रायल कोर्ट ने अभी केवल कारण बताओ नोटिस जारी किया है, अंतिम कुर्की आदेश पारित नहीं किया।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के पास ट्रायल Court के समक्ष उपस्थित होकर अपनी आपत्तियां दाखिल करने और सुप्रीम कोर्ट के उक्त निर्णय का हवाला देने का पूरा अवसर उपलब्ध है।
अनुच्छेद 227 के प्रयोग पर अदालत ने कहा कि यह अधिकारिता पर्यवेक्षी प्रकृति की है और इसका इस्तेमाल सामान्य या नियमित तरीके से नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने अपने आदेश में कहा:
“सीपीसी के आदेश 38 नियम 5 के तहत उपलब्ध वैधानिक उपाय अपनाए बिना सीधे अनुच्छेद 227 के तहत इस न्यायालय का दरवाजा खटखटाने को प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता।”
पीठ ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 227 की शक्ति का प्रयोग केवल असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए, न कि प्रत्येक मामले में नियमित उपाय के रूप में।
अदालत का फैसला
हाईकोर्ट ने सिविल रिवीजन याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ताओं को ट्रायल कोर्ट के समक्ष कारण बताओ नोटिस पर अपनी आपत्तियां दाखिल करने की स्वतंत्रता दी।
अदालत ने निर्देश दिया कि यदि आपत्तियां दाखिल की जाती हैं तो ट्रायल कोर्ट सभी पक्षों को सुनवाई का अवसर देते हुए कानून के अनुसार शीघ्र निर्णय ले।
मामले में लागत को लेकर कोई आदेश पारित नहीं किया गया। साथ ही, सिविल रिवीजन याचिका से संबंधित लंबित विविध आवेदन भी बंद करने का निर्देश दिया गया।
वाद विवरण
- वाद शीर्षक: एम/एस वी.डिजिटल्स एवं 2 अन्य बनाम एम/एस बाबा फ्लेक्स
- वाद संख्या: सिविल रिवीजन याचिका संख्या 1095/2026
- पीठ: न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी
- निर्णय तिथि: 01 मई 2026

