आस्था या अधिकार? सबरीमाला और धार्मिक स्वतंत्रता के बड़े सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में 16 दिनों की मैराथन सुनवाई पूरी

भारत में धार्मिक परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों के बीच की सीमा रेखा तय करने वाली एक ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई अब अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट की नौ-जजों की संविधान पीठ ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धर्म की स्वतंत्रता से जुड़े व्यापक मुद्दों पर 16 दिनों तक चली लंबी सुनवाई को पूरा कर लिया है।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस पीठ को अब यह तय करना है कि क्या व्यक्तिगत समानता का अधिकार, सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं से ऊपर है। इस फैसले का असर केवल केरल के अयप्पा मंदिर पर ही नहीं, बल्कि मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश और पारसी अग्नि मंदिरों (Agiary) से जुड़े नियमों पर भी पड़ेगा।

इस मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसकी सुनवाई के लिए नौ जजों की एक विशाल पीठ का गठन किया गया। CJI सूर्यकांत के साथ इस बेंच में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंदरेश,  जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह,  जस्टिस अरविंद कुमार,  जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह,  जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले,  जस्टिस आर. महादेवन और  जस्टिस जॉयमाल्य बागची शामिल रहे।

अदालत में देश के सबसे बड़े कानूनी दिमागों के बीच तीखी बहस हुई। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखा, जबकि वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी, मुकुल रोहतगी, इंदिरा जयसिंह, सी.एस. वैद्यनाथन, नीरज किशन कौल और गोपाल शंकरनारायणन ने अलग-अलग पक्षों की ओर से दलीलें पेश कीं।

भारत सरकार की ओर से पेश होते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध का समर्थन किया। केंद्र का तर्क है कि ऐसे मुद्दे पूरी तरह से धार्मिक आस्था और संप्रदाय की स्वायत्तता का हिस्सा हैं। सरकार के अनुसार, धार्मिक परंपराओं को अदालत की ‘न्यायिक समीक्षा’ (Judicial Review) के दायरे में नहीं लाया जाना चाहिए। यह दलील 2018 के उस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिकाओं का समर्थन करती है, जिसमें अदालत ने महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी।

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इस मामले ने पिछले कुछ वर्षों में कई मोड़ देखे हैं:

  • सितंबर 2018: पांच जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से महिलाओं के प्रवेश पर लगा प्रतिबंध हटा दिया था और इसे असंवैधानिक करार दिया था।
  • नवंबर 2019: तत्कालीन CJI रंजन गोगोई की पीठ ने मामले को बड़ी बेंच (9 जज) के पास भेज दिया, क्योंकि इसमें अन्य धर्मों में भी महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव के सवाल शामिल थे।
  • मई 2020: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समीक्षा क्षेत्राधिकार का उपयोग करते हुए भी वह कानूनी सवालों को बड़ी बेंच के पास भेज सकता है।
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सुप्रीम कोर्ट ने इस सुनवाई के दौरान सात प्रमुख संवैधानिक प्रश्नों पर ध्यान केंद्रित किया है, जो आने वाले समय में भारत में धर्म की परिभाषा बदल सकते हैं:

  1. अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का दायरा क्या है?
  2. अनुच्छेद 25 (व्यक्तिगत अधिकार) और अनुच्छेद 26 (धार्मिक संप्रदाय के अधिकार) के बीच क्या संबंध है?
  3. क्या धार्मिक संप्रदायों के अधिकार अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन हैं?
  4. ‘संवैधानिक नैतिकता’ (Constitutional Morality) का अर्थ और सीमा क्या है?
  5. धार्मिक प्रथाओं की न्यायिक समीक्षा किस हद तक संभव है?
  6. संविधान के अनुच्छेद 25 (2) (b) में “हिंदुओं के वर्गों” (Sections of Hindus) का क्या अर्थ है?
  7. क्या कोई व्यक्ति, जो उस विशेष धार्मिक संप्रदाय का हिस्सा नहीं है, जनहित याचिका (PIL) के जरिए उसकी प्रथाओं को चुनौती दे सकता है?
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सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह फैसला केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं रहेगा। अदालत एक ऐसी ‘न्यायिक नीति’ विकसित करना चाहती है जो “पूर्ण न्याय” कर सके। इसमें मुस्लिम महिलाओं के मस्जिदों और दरगाहों में प्रवेश का मुद्दा और गैर-पारसी पुरुषों से शादी करने वाली पारसी महिलाओं के पवित्र अग्नि मंदिर में प्रवेश के अधिकार भी शामिल हैं।

पूरा देश अब इस फैसले का इंतजार कर रहा है, जो यह स्पष्ट करेगा कि आधुनिक लोकतंत्र में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सदियों पुरानी आस्था के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा।

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