दिल्ली हाई कोर्ट ने बैंक खातों को फ्रीज करने की प्रक्रिया पर एक बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति का बैंक अकाउंट उसके ‘आर्थिक अस्तित्व’ (Economic Existence) के लिए अनिवार्य है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना किसी औपचारिक आरोप, FIR या न्यायिक आदेश के किसी भी नागरिक के फंड को रोकना उसके जीवन के अधिकार का उल्लंघन है।
जस्टिस पुरुषैंद्र कुमार कौरव ने 4 मई को दिए अपने आदेश में एक निजी बैंक को याचिकाकर्ता के खाते को तुरंत ‘डीफ्रीज’ करने का निर्देश दिया। मामला नवंबर 2024 का है, जब गुजरात साइबर क्राइम पुलिस की एक शिकायत के बाद याचिकाकर्ता का बैंक खाता ब्लॉक कर दिया गया था।
अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि याचिकाकर्ता को किसी भी विशिष्ट अपराध से जोड़ने वाला कोई ठोस सबूत मौजूद नहीं था। जस्टिस कौरव ने इस कार्रवाई को “पूरी तरह से मनमाना” करार देते हुए कहा कि कानूनी आधार के बिना किसी की जमा पूंजी को रोकना न्यायसंगत नहीं है।
फैसले में हाई कोर्ट ने आधुनिक जीवन में वित्तीय पहुंच के महत्व पर जोर दिया। अदालत ने टिप्पणी की, “बैंक खाता सिर्फ पैसे रखने की जगह नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के आर्थिक वजूद का सार है।” बेंच ने आगे कहा कि बिना किसी ठोस कारण के वित्तीय संपत्तियों को फ्रीज करना सीधे तौर पर ‘जीवन के अधिकार’ में बाधा डालने जैसा है।
याचिकाकर्ता की स्थिति को समझाने के लिए जस्टिस कौरव ने रोमन दार्शनिक सिसरो (Cicero) के एक कथन का उल्लेख किया: “अमुक व्यक्ति निर्दोष है; लेकिन भले ही वह दोषमुक्त हो, वह संदेह से मुक्त नहीं है।” अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता की स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी—बिना किसी FIR या अदालती आदेश के केवल संदेह के आधार पर उनका पैसा फंसा हुआ था।
हालांकि अदालत ने याचिकाकर्ता को तत्काल राहत देते हुए खाता बहाल करने का आदेश दिया है, लेकिन साथ ही यह शर्त भी रखी है कि भविष्य में किसी भी जांच या पूछताछ के लिए याचिकाकर्ता को संबंधित एजेंसियों के साथ पूर्ण सहयोग करना होगा।
यह फैसला उन सुरक्षा उपायों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल पेश करता है, जो सरकारी एजेंसियों को किसी व्यक्ति की वित्तीय स्थिरता में हस्तक्षेप करने से पहले अपनाने चाहिए। अदालत ने यह साफ कर दिया है कि किसी नागरिक के ‘आर्थिक अस्तित्व’ को छीनने के लिए केवल संदेह काफी नहीं है।

