समरी रेंट प्रोसीडिंग्स में पोषणीयता की आपत्ति को प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय करने के लिए किरायेदार जोर नहीं दे सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ‘समरी रेंट प्रोसीडिंग्स’ (संक्षिप्त किराया कार्यवाही) के दौरान किरायेदार के पास यह अनिवार्य अधिकार नहीं है कि वह केस की पोषणीयता (maintainability) से जुड़ी आपत्तियों को प्रारंभिक मुद्दे (preliminary issue) के रूप में तय करने के लिए दबाव डाले। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी आपत्तियों को अंतिम सुनवाई के लिए टालने का आदेश अंतरवर्ती (interlocutory) प्रकृति का होता है और इसमें संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला प्रतिवादी-मकान मालिक श्री सुदीप कुमार जैन द्वारा ‘उत्तर प्रदेश नगरीय परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021’ (U.P. Act No. 16 of 2021) की धारा 10 के तहत शुरू की गई कार्यवाही से जुड़ा है। रेंट अथॉरिटी, आगरा के समक्ष लंबित केस संख्या 475/2023 के दौरान, किरायेदार-याचिकाकर्ता श्रीमती आशा देवी जेस्वानी ने 19 नवंबर, 2025 को एक आवेदन दायर किया। इस आवेदन में मामले की पोषणीयता पर सवाल उठाते हुए प्रार्थना की गई कि इसे आगे की कार्यवाही से पहले एक प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय किया जाए।

17 अप्रैल, 2026 को रेंट अथॉरिटी, आगरा ने इस अनुरोध को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि मामला फरवरी 2023 से लंबित है और अब अंतिम सुनवाई के चरण में पहुंच चुका है। अथॉरिटी ने निर्देश दिया कि पोषणीयता सहित सभी बिंदुओं पर अंतिम सुनवाई के समय एक साथ विचार किया जाएगा। इस आदेश के खिलाफ की गई अपील को रेंट ट्रिब्यूनल ने 22 अप्रैल, 2026 को यह मानते हुए खारिज कर दिया कि यह आदेश केवल अंतरवर्ती प्रकृति का था।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने याचिका पर सुनवाई करते हुए इस बात पर जोर दिया कि 2021 के अधिनियम के तहत कार्यवाही संक्षिप्त (summary) प्रकृति की होती है। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे कानूनों का विधायी उद्देश्य “त्वरित न्यायनिर्णयन” (expeditious adjudication) सुनिश्चित करना है।

पोषणीयता को प्रारंभिक मुद्दे के रूप में देखने की मांग पर हाईकोर्ट ने निम्नलिखित टिप्पणियां कीं:

  • प्रक्रियात्मक आदेशों की प्रकृति: “पोषणीयता की आपत्ति को प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय करने से इनकार करने वाला आदेश, जबकि उस आपत्ति को अंतिम निपटान के चरण में विचार के लिए खुला रखा गया हो, न तो पक्षों के मूल अधिकारों का निर्धारण करता है और न ही किसी क्षेत्राधिकार संबंधी याचिका का अंतिम फैसला करता है।”
  • अथॉरिटी का विवेकाधिकार: हाईकोर्ट ने कहा कि फोरम इस बात के लिए सक्षम है कि वह ऐसी आपत्तियों पर विचार को अंतिम चरण तक टाल दे, विशेषकर तब जब “मुद्दों को अलग करने से संक्षिप्त कार्यवाही के निपटान में देरी होने की संभावना हो।”
  • अनिवार्य अधिकार का अभाव: हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया: “महज इसलिए कि एक पक्ष पोषणीयता से संबंधित आपत्ति उठाता है, उसे यह अटूट अधिकार नहीं मिल जाता कि वह उस आपत्ति को अलग से प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय करने पर जोर दे।”
  • कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं: हाईकोर्ट ने पाया कि इस प्रक्रिया से किरायेदार पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि आपत्ति को गुण-दोष के आधार पर खारिज नहीं किया गया है, बल्कि केवल टाला गया है। हाईकोर्ट ने कहा, “इस स्तर पर किसी भी तरह का हस्तक्षेप संक्षिप्त किराया कार्यवाही के पीछे के विधायी उद्देश्य को विफल कर देगा।”
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निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि रेंट अथॉरिटी या ट्रिब्यूनल के आदेशों में कोई स्पष्ट अवैधता या क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि नहीं है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि वे याचिका को आगे नहीं बढ़ाना चाहते और रेंट अथॉरिटी के समक्ष ही अपनी आपत्तियां रखेंगे।

हाईकोर्ट ने याचिका को निस्तारित करते हुए याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी कि वे रेंट अथॉरिटी, आगरा के समक्ष अंतिम सुनवाई के समय अपनी सभी कानूनी आपत्तियां उठा सकते हैं, जिन पर कानून के अनुसार विचार किया जाएगा। लागत के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया गया।

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केस विवरण:

  • केस का शीर्षक: श्रीमती आशा देवी जेस्वानी और अन्य बनाम श्री सुदीप कुमार जैन
  • केस संख्या: मैटर्स अंडर आर्टिकल 227 नंबर 6620 ऑफ 2026
  • पीठ: जस्टिस योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव
  • तारीख: 12 मई, 2026

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