सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि भारतीय रेलवे विद्युत अधिनियम, 2003 के तहत ‘डीम्ड डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी’ (मान्यता प्राप्त वितरण अनुज्ञप्तिधारी) की श्रेणी में नहीं आता है। कोर्ट ने कहा कि रेलवे ओपन एक्सेस के माध्यम से खरीदी जाने वाली बिजली पर क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज (CSS) और एडिशनल सरचार्ज (AS) का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने रेलवे द्वारा दायर अपीलों को खारिज करते हुए कहा कि राष्ट्रीय ट्रांसपोर्टर एक ‘उपभोक्ता’ (consumer) है, क्योंकि वह बिजली का उपयोग अपनी परिचालन आवश्यकताओं के लिए करता है न कि किसी तीसरे पक्ष को बेचने के लिए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद तब शुरू हुआ जब भारतीय रेलवे ने महाराष्ट्र में अपने ट्रैक्शन सब-स्टेशनों के लिए गुजरात ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड (GUVNL) से ओपन एक्सेस के जरिए 100 मेगावाट बिजली खरीदने की कोशिश की। महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी ट्रांसमिशन कंपनी लिमिटेड (MSETCL) ने कनेक्टिविटी देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद रेलवे ने केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (CERC) का दरवाजा खटखटाया। साल 2015 में, CERC ने रेलवे को विद्युत अधिनियम की धारा 14 के तहत ‘डीम्ड डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी’ (DDL) घोषित कर दिया था। हालांकि, कई राज्यों के बिजली नियामक आयोगों (SERCs) और वितरण कंपनियों (DISCOMs) ने इस फैसले को चुनौती दी। 12 फरवरी, 2024 को विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण (APTEL) ने CERC के आदेश को रद्द कर दिया, जिसे रेलवे ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ता (भारतीय रेलवे): रेलवे ने तर्क दिया कि रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 11 उसे रेलवे के कामकाज के लिए ‘वितरण प्रतिष्ठान’ संचालित करने का पूर्ण वैधानिक अधिकार देती है। रेलवे का कहना था कि यह प्रावधान विद्युत अधिनियम पर प्रभावी है। इसके अतिरिक्त, रेलवे ने दलील दी कि केंद्र सरकार का विभाग होने के नाते, वह विद्युत अधिनियम की धारा 2(5) के तहत ‘उपयुक्त सरकार’ (Appropriate Government) है और उसे स्वतः ही DDL का दर्जा मिलना चाहिए। उनका तर्क था कि अपने आंतरिक नेटवर्क के माध्यम से इंजनों और स्टेशनों तक बिजली पहुँचाना ‘वितरण’ की श्रेणी में आता है।
प्रतिवादी (DISCOMs): बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) ने दलील दी कि विद्युत अधिनियम की धारा 2(19) के तहत ‘वितरण प्रणाली’ वह है जो किसी ‘उपभोक्ता’ के कनेक्शन पॉइंट तक पहुँचती है। चूंकि रेलवे बिजली का उपयोग स्वयं के परिचालन (ट्रैक्शन और सिग्नलिंग) के लिए करता है, इसलिए वह एक अंतिम उपभोक्ता है। कंपनियों ने जोर दिया कि वितरण लाइसेंसधारी होने के लिए बिजली की ‘आपूर्ति’ (यानी उपभोक्ताओं को बिक्री) एक अनिवार्य शर्त है। सेस स्टरलाइट मामले का हवाला देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि यदि कोई लाइसेंसधारी भी अपने निजी उपयोग के लिए बिजली की खपत करता है, तो वह CSS देने के लिए बाध्य है।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने इस कानूनी ढांचे का विश्लेषण करते हुए निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं पर गौर किया:
1. वितरण प्रणाली की परिभाषा: कोर्ट ने कहा कि एक वितरण प्रणाली का अंत उपभोक्ता के कनेक्शन बिंदु पर होना चाहिए। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“एक वितरण प्रतिष्ठान जो केवल एकीकृत रेलवे प्रणाली के भीतर… अपनी खपत और उपयोग के लिए बिजली पहुंचाता है, और उपभोक्ताओं को प्रतिफल के बदले बिजली की आपूर्ति या बिक्री नहीं करता है, उसे विद्युत अधिनियम के तहत वितरण प्रणाली के दायरे में नहीं माना जा सकता है।”
2. ‘उपयुक्त सरकार’ के रूप में दर्जा: हालांकि कोर्ट इस बात से सहमत था कि केंद्र सरकार के नियंत्रण के कारण रेलवे ‘उपयुक्त सरकार’ के दायरे में आता है, लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह दर्जा स्वतः ही DDL के विशेषाधिकार नहीं देता जब तक कि वह वितरण का वास्तविक कार्य न कर रहा हो। कोर्ट ने कहा:
“नाममात्र का गुण, चाहे वह कितनी भी मजबूती से स्थापित क्यों न हो, उन ठोस कार्यों का स्थान नहीं ले सकता जिनकी कानून मांग करता है।”
3. सरचार्ज के लिए उत्तरदायित्व (कार्यात्मक परीक्षण): सेस स्टरलाइट लिमिटेड बनाम OERC मामले के कार्यात्मक परीक्षण को लागू करते हुए, कोर्ट ने माना कि रेलवे एक उपभोक्ता है क्योंकि वह अपनी निजी खपत के लिए बिजली प्राप्त करता है। कोर्ट ने कहा:
“अपीलकर्ता (रेलवे) इस तर्क को उल्टा करके यह नहीं कह सकता कि एक मान्यता प्राप्त वितरण लाइसेंसधारी होने के नाते, वह उपभोक्ता पर लागू होने वाले किसी भी भुगतान दायित्व से मुक्त है।”
4. प्रस्तावित कानून का प्रभाव: पीठ ने ड्राफ्ट इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) बिल, 2025 का भी संज्ञान लिया, जिसमें रेलवे के लिए CSS को धीरे-धीरे खत्म करने का प्रस्ताव है। कोर्ट ने इसे इस बात का सबूत माना कि वर्तमान कानून में ऐसे शुल्क लागू हैं।
“तथ्य यह है कि अपीलकर्ता को क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज के भुगतान से छूट देने के लिए इस तरह के विधायी कदम प्रस्तावित किए गए हैं, जो मौजूदा कानून के तहत ऐसी छूट की अनुपस्थिति के बारे में स्पष्ट विधायी मंशा को दर्शाता है।”
कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे की अपीलों को खारिज कर दिया और APTEL के फैसले को बरकरार रखा। कोर्ट ने प्रतिवादी वितरण कंपनियों (DISCOMs) को निर्देश दिया कि वे रेलवे द्वारा बकाया CSS और AS की राशि की गणना करें। कोर्ट ने 6 मई, 2024 के अपने अंतरिम आदेश को भी वापस ले लिया, जिसने इन भुगतानों पर रोक लगा दी थी। कोर्ट ने कहा है कि रेलवे को संबंधित वितरण कंपनियों और नियामक आयोगों के समक्ष इन गणनाओं पर जवाब देने का उचित अवसर दिया जाए।
केस विवरण:
- केस टाइटल: इंडियन रेलवे बनाम वेस्ट बंगाल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड और अन्य
- केस नंबर: सिविल अपील नंबर 4652/2024
- पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा
- दिनांक: 08 मई, 2026

