जब तक डिक्री में परिणाम तय न हो, तब तक सेल कंसीडरेशन जमा करने में देरी पर स्पेसिफिक परफॉरमेंस डिक्री का स्वतः निरस्तीकरण नहीं होगा: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि शेष बिक्री राशि जमा करने में देरी होने मात्र से ही ‘विशिष्ट अनुपालन’ (Specific Performance) की डिक्री का स्वतः निरस्तीकरण (Automatic Rescission) नहीं होता है। अदालत ने कहा कि स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट, 1963 की धारा 28 के तहत, जब तक सेल डीड निष्पादित नहीं हो जाती, तब तक ट्रायल कोर्ट का डिक्री पर अधिकार बना रहता है और उसके पास भुगतान के लिए समय बढ़ाने की विवेकाधीन शक्ति होती है।

जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट और निष्पादन अदालत (Execution Court) के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिन्होंने केवल देरी से राशि जमा करने के आधार पर निष्पादन आवेदन (Execution Application) को खारिज कर दिया था।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता, आनंद नारायण शुक्ला ने 2011 में प्रतिवादी से ₹16,00,000 प्रति एकड़ की दर से 3.75 एकड़ जमीन खरीदने का समझौता किया था। विशिष्ट अनुपालन के मुकदमे के बाद, ट्रायल कोर्ट ने 3 मार्च 2017 को अपीलकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया और उसे एक महीने के भीतर शेष राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया।

अपीलकर्ता ने 1 अप्रैल 2017 को प्रतिवादी को भुगतान स्वीकार करने और डीड निष्पादित करने के लिए नोटिस भेजा, लेकिन प्रतिवादी ने डिक्री के खिलाफ अपील कर दी। हालांकि डिक्री पर कोई रोक (Stay) नहीं थी, फिर भी शुरुआती एक महीने की अवधि में शेष राशि जमा नहीं की गई। जुलाई 2017 में निष्पादन आवेदन दायर किया गया। 2017 से 2020 के बीच नोटिस और भुगतान के संबंध में कई आदेश पारित किए गए। अंततः, कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान, निष्पादन अदालत ने 26 नवंबर 2020 को अपीलकर्ता की गंभीरता (Bona fides) को परखने के लिए उसे “आज ही” ₹57,50,000 जमा करने का निर्देश दिया, जिसका अपीलकर्ता ने पालन किया।

हालांकि, 12 जुलाई 2023 को निष्पादन अदालत ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि चूंकि डिक्री सशर्त थी और 2017 की डिक्री के एक महीने के भीतर राशि जमा नहीं की गई थी, इसलिए इसे लागू नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने 2025 में इस विचार की पुष्टि की थी।

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पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से: वरिष्ठ वकील सौरभ मिश्रा ने तर्क दिया कि अपीलकर्ता ने नोटिस जारी करके और अंततः कोर्ट के 2020 के आदेश के तहत पूरी राशि जमा करके अपनी तत्परता दिखाई थी। उन्होंने दलील दी कि स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट की धारा 28 अदालतों को समय बढ़ाने का अधिकार देती है और प्रतिवादी ने निरस्तीकरण का आवेदन तभी दायर किया जब राशि पहले ही जमा की जा चुकी थी।

प्रतिवादी की ओर से: वकील अजय मारवाह ने दलील दी कि 2017 से बार-बार अवसर मिलने के बावजूद तीन साल तक राशि जमा नहीं की गई। उन्होंने तर्क दिया कि अपील दायर करने मात्र से डिक्री के क्रियान्वयन पर रोक नहीं लगती और अपीलकर्ता, जिसने अग्रिम के रूप में केवल “मामूली राशि” दी थी, समय विस्तार के न्यायसंगत राहत का हकदार नहीं है।

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अदालत का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण कानूनी पहलुओं पर विचार किया:

1. विलय का सिद्धांत (Doctrine of Merger): अदालत ने स्पष्ट किया कि विलय का सिद्धांत तभी लागू होता है जब उच्च मंच गुण-दोष (Merits) के आधार पर आदेश पारित करता है। चूंकि प्रतिवादी की पहली अपील गैर-पैरवी (Default) के कारण खारिज कर दी गई थी, इसलिए ट्रायल कोर्ट की डिक्री का अपीलीय आदेश में “विलय” नहीं हुआ था।

2. धारा 28 की प्रकृति: कोर्ट ने जोर दिया कि विशिष्ट अनुपालन की डिक्री एक “प्रारंभिक डिक्री” (Preliminary Decree) की प्रकृति की होती है। सरदार मोहर सिंह बनाम मंगीलाल मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:

“धारा 28 स्वयं डिक्री के निरस्तीकरण का आदेश देने की शक्ति देती है, जो यह दर्शाता है कि जब तक बिक्री विलेख (Sale Deed) निष्पादित नहीं हो जाता… ट्रायल कोर्ट के पास डिक्री से निपटने की शक्ति और अधिकार क्षेत्र बना रहता है।”

3. विवेकाधीन शक्ति और न्यायसंगतता: अदालत ने कहा कि धारा 28 में “आदेश द्वारा निरस्त कर सकती है” (May, by order, rescind) वाक्यांश का उपयोग किया गया है, जो इंगित करता है कि निरस्तीकरण स्वतः नहीं होता है। पीठ ने टिप्पणी की:

“अदालत को समय बढ़ाने का विवेक दिया गया है… परीक्षण यह है कि क्या डिक्री धारक के आचरण से यह तार्किक रूप से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अनुबंध के अपने हिस्से को पूरा करने का उसका कोई इरादा नहीं था।”

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पीठ ने निचली अदालतों के “लकीर के फकीर वाले दृष्टिकोण” (Pedantic approach) की आलोचना की और कहा कि निष्पादन अदालत ने स्वयं भ्रमित करने वाले निर्देश दिए थे।

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि न तो निष्पादन अदालत और न ही हाईकोर्ट ने मामले को सही परिप्रेक्ष्य में देखा। अदालत ने फैसला सुनाया कि समय विस्तार की राहत देते समय, अदालत डिक्री धारक को देरी के लिए प्रतिवादी को अतिरिक्त मुआवजा देने का निर्देश देकर संतुलन बना सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों आदेशों को रद्द कर दिया और निष्पादन आवेदन को नए सिरे से विचार करने के लिए बहाल कर दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि इन आवेदनों को मूल मुकदमे में ही इंटरलोकेटरी आवेदन के रूप में माना जाए।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: आनंद नारायण शुक्ला बनाम जगत धारी
केस संख्या: सिविल अपील संख्या 7355/2026
पीठ: जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन
दिनांक: 8 मई, 2026

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