“हॉस्टल सिर्फ रहने-खाने का अड्डा न बन जाएं”: अटेंडेंस पर दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले की समीक्षा करेगा सुप्रीम कोर्ट

क्या कॉलेजों में अनिवार्य उपस्थिति (अटेंडेंस) का नियम खत्म होना चाहिए? इस अहम कानूनी सवाल पर अब सुप्रीम कोर्ट का रुख सामने आया है। बुधवार को उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जता दी है, जिसमें कहा गया था कि कम अटेंडेंस के आधार पर किसी भी छात्र को परीक्षा में बैठने से नहीं रोका जा सकता।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने फिलहाल हाई कोर्ट के इस आदेश पर रोक लगाने से तो इनकार कर दिया है, लेकिन कॉलेज संस्कृति को लेकर गंभीर चिंता जरूर व्यक्त की है।

कॉलेज की गरिमा पर अदालत की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि दिल्ली हाई कोर्ट के रुख को बिना किसी समीक्षा के स्वीकार कर लिया जाता है, तो देश की प्रतिष्ठित नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज (NLUs) और अन्य संस्थानों के हॉस्टल शिक्षा के केंद्र रहने के बजाय “सिर्फ रहने और खाने की सुविधा” (boarding and lodging facilities) मात्र बनकर रह जाएंगे।

अदालत ने इस मामले में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और अन्य संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। जब तक अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक हाई कोर्ट के 3 नवंबर के फैसले की स्थिति (status quo) बनी रहेगी।

एक छात्र की मौत से शुरू हुई कानूनी लड़ाई

इस पूरे मामले की जड़ें एक बेहद दुखद घटना से जुड़ी हैं। दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला 2016 में लॉ छात्र सुशांत रोहिल्ला की आत्महत्या के बाद शुरू हुई एक ‘स्वत: संज्ञान’ (suo motu) याचिका पर आधारित था।

तीसरे वर्ष के छात्र सुशांत ने अपने सुसाइड नोट में खुद को ‘फेलियर’ बताया था। कथित तौर पर अटेंडेंस कम होने की वजह से कॉलेज ने उन्हें सेमेस्टर परीक्षा में बैठने से रोक दिया था, जिससे वे काफी तनाव में थे। इस मामले में हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा था कि उपस्थिति के नियम इतने कठोर नहीं हो सकते जो छात्रों को मानसिक प्रताड़ना दें या उन्हें मौत की ओर धकेल दें।

क्या हैं हाई कोर्ट के निर्देश?

दिल्ली हाई कोर्ट ने भारतीय कानूनी शिक्षा प्रणाली में बड़े सुधारों की वकालत की थी, जिन्हें अब सुप्रीम कोर्ट के दायरे में रखा गया है:

  • नियमों का पुनर्मूल्यांकन: बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को 3-वर्षीय और 5-वर्षीय LLB कोर्स के लिए अटेंडेंस के नियमों पर दोबारा विचार करने को कहा गया है।
  • व्यावहारिक गतिविधियों को क्रेडिट: कोर्ट का सुझाव था कि मूट कोर्ट, सेमिनार, डिबेट और अदालती सुनवाई में शामिल होने वाले छात्रों को इसके बदले अटेंडेंस में छूट या क्रेडिट मिलना चाहिए।
  • संस्थानों की सीमा: कोई भी कॉलेज या यूनिवर्सिटी BCI द्वारा तय किए गए न्यूनतम प्रतिशत से अधिक अटेंडेंस की मांग नहीं कर सकती।
  • मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा: सभी संस्थानों को यूजीसी (UGC) के 2023 के नियमों के तहत ‘छात्र शिकायत निवारण समिति’ (GRC) का गठन करना अनिवार्य होगा।
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सुप्रीम कोर्ट अब इस बात का निर्धारण करेगा कि शैक्षणिक अनुशासन बनाए रखने के लिए अनिवार्य उपस्थिति कितनी जरूरी है और छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को देखते हुए इसमें कितनी लचीलेपन की गुंजाइश है।

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