सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि यदि किसी उम्मीदवार ने नियमित रिक्ति के लिए आवेदन किया है और वह नियमित चयन प्रक्रिया में सफल रहा है, तो उसे केवल संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) के आधार पर नियुक्ति देना मनमाना और असंवैधानिक है। जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेशों को रद्द करते हुए भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (IIIT), इलाहाबाद को निर्देश दिया कि अपीलकर्ता को नियमित असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में नियुक्त किया जाए।
मामले की पृष्ठभूमि
जनवरी 2013 में, IIIT-इलाहाबाद (प्रतिवादी संख्या 2) ने प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर के नियमित पदों के लिए विज्ञापन (FS-01/2013) जारी किया था। अपीलकर्ता लोकेंद्र कुमार तिवारी, जिनके पास सूचना सुरक्षा (Information Security) में पीएचडी और साइबर कानून एवं सूचना सुरक्षा में एमएस की डिग्री थी, उन्होंने असिस्टेंट प्रोफेसर के पद के लिए आवेदन किया।
18 मार्च 2013 को आयोजित साक्षात्कार के बाद, चयन समिति ने तेरह उम्मीदवारों को नियमित नियुक्ति के लिए अनुशंसित किया। हालांकि, अपीलकर्ता और एक अन्य उम्मीदवार डॉ. रंजना व्यास को केवल 12 महीनों के लिए संविदा के आधार पर नियुक्त करने की सिफारिश की गई। अपीलकर्ता ने इसे स्वीकार कर लिया और संस्थान में कार्यभार संभाल लिया।
2014 में, संस्थान ने उस चयन चक्र की सभी नियुक्तियों को कुछ कमियों का हवाला देते हुए रद्द कर दिया। इसके बाद कानूनी कार्यवाही का दौर शुरू हुआ। 2017 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मामले पर फिर से विचार किया गया, जिसमें संस्थान ने अन्य सभी उम्मीदवारों को तो नियमित कर दिया, लेकिन अपीलकर्ता को फिर से संविदा का प्रस्ताव दिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट के सिंगल जज और फिर डिवीजन बेंच द्वारा इस भेदभाव के खिलाफ अपीलकर्ता की चुनौती को खारिज कर दिया गया था, जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि विज्ञापन विशेष रूप से स्वीकृत नियमित पदों के लिए था और भर्ती नियमों के अनुसार नियमित और संविदा नियुक्तियों के लिए अलग-अलग समितियां निर्धारित थीं। यह तर्क दिया गया कि चयन समिति ने इस प्रक्रिया की अनदेखी की और पूरी तरह योग्य होने के बावजूद अपीलकर्ता को संविदा नियुक्ति के लिए चुनकर उसके साथ भेदभाव किया। अपीलकर्ता ने यह भी कहा कि संविदा प्रस्ताव को स्वीकार करना “आर्थिक मजबूरी” का परिणाम था और इसे अवैधता के खिलाफ बाधा (Estoppel) नहीं माना जा सकता।
IIIT-इलाहाबाद (प्रतिवादी संख्या 2) ने तर्क दिया कि चयन समिति के पास योग्यता के आधार पर नियमित या संविदा नियुक्ति की सिफारिश करने का विवेकाधिकार था। संस्थान का कहना था कि अपीलकर्ता ने बिना किसी लिखित विरोध के संविदा नियुक्ति स्वीकार की थी और लगभग एक वर्ष तक कार्य किया। प्रतिवादी ने यह भी तर्क दिया कि यह निर्णय तर्कसंगत था और न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर था।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुख्य मुद्दा यह नहीं था कि क्या संविदा कर्मचारी नियमितीकरण का हकदार है, बल्कि यह था कि क्या नियमित रिक्ति के विरुद्ध संविदा नियुक्ति देने की प्रक्रिया वैध थी।
कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण तथ्यों को रेखांकित किया:
- विज्ञापन में संविदा के आधार पर किसी भी नियुक्ति का “कोई उल्लेख नहीं था।”
- अपीलकर्ता नियमित नियुक्ति के लिए योग्य पाया गया था और उसी के अनुसार उसे शॉर्टलिस्ट किया गया था।
- चयन प्रक्रिया सभी उम्मीदवारों के लिए “एक समान” थी।
पीठ ने पाया कि अपीलकर्ता के साथ इस भेदभावपूर्ण व्यवहार के लिए रिकॉर्ड में कोई कारण दर्ज नहीं था।
“एक अलग व्यवहार को उचित ठहराने के लिए, कम से कम रिकॉर्ड में कारण होने चाहिए। रिकॉर्ड में उस पद से इनकार करने का कोई कारण नहीं दिखता जिसके लिए अपीलकर्ता को शॉर्टलिस्ट किया गया था और साक्षात्कार लिया गया था।”
पीठ ने संवैधानिक निष्पक्षता पर जोर देते हुए कहा:
“हम पाते हैं कि नियमित नियुक्ति से इनकार करना पूरी तरह से अवैध और असंवैधानिक है… हमें अपीलकर्ता को नियमित नियुक्ति न देने का कोई भी उचित और वास्तविक कारण नहीं मिला है।”
कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपील को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के फैसलों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने माना कि अपीलकर्ता IIIT-इलाहाबाद में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में नियमित नियुक्ति का हकदार है।
कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- प्रतिवादी संख्या 2 चार सप्ताह के भीतर अपीलकर्ता को नियमित नियुक्ति आदेश जारी करे।
- अपीलकर्ता को मूल चयन की तिथि (6 अप्रैल 2013) से सेवा की निरंतरता (Continuity of Service) प्रदान की जाएगी।
- अपीलकर्ता की वरिष्ठता (Seniority) 2013 की चयन प्रक्रिया के माध्यम से नियुक्त उम्मीदवारों में अंतिम स्थान पर निर्धारित की जाएगी।
- कोर्ट ने इस राहत को संशोधित करते हुए पिछले समय के लिए किसी भी बकाया वेतन या वित्तीय लाभ को देने से इनकार कर दिया।
मामले का विवरण:
- मामले का शीर्षक: लोकेंद्र कुमार तिवारी बनाम भारत संघ और अन्य
- केस संख्या: सिविल अपील संख्या 5307/2024 (2026 INSC 487)
- पीठ: जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी
- दिनांक: 13 मई, 2026

