मेडिकल साक्ष्य में विरोधाभास और चश्मदीदों के मुकरने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के आरोपी को किया बरी

सुप्रीम कोर्ट ने हत्या और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दोषी करार दिए गए तलारी नरेश की उम्रकैद की सजा को रद्द करते हुए उसे बरी कर दिया है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपना मामला “संदेह से परे” साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। अदालत ने साक्ष्यों को “कमजोर और विरोधाभासी” करार देते हुए मेडिकल रिपोर्ट में गंभीर खामियों और स्वतंत्र गवाहों की कमी को आधार बनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

अभियोजन पक्ष के अनुसार, 12 मई 2013 की सुबह तेलंगाना के ओगीपुर गांव में आरोपी ने शिव शंकर नाम के व्यक्ति की ‘शाबाद’ पत्थर से मारकर हत्या कर दी थी। घटना के पीछे की वजह यह बताई गई थी कि मृतक, आरोपी की छोटी बहन के साथ भाग गया था। हालांकि वे अगले ही दिन लौट आए थे, लेकिन गांव की पंचायत ने कथित तौर पर मृतक को गांव से बाहर रहने का आदेश दिया था। अभियोजन का आरोप था कि घटना के दिन जब मृतक अपने दोस्त के साथ आरोपी के घर के पास से गुजर रहा था, तब आरोपी ने उस पर हमला कर दिया।

इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को आईपीसी की धारा 302, 323 और एससी/एसटी एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे फरवरी 2025 में तेलंगाना हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा था।

अभियोजन के तर्क और गवाहों की स्थिति

अभियोजन का पूरा मामला मुख्य रूप से मृतक की मां पद्मम्मा (PW-1) और उसके दोस्त नरेंद्र (PW-3) की गवाही पर टिका था। पद्मम्मा ने दावा किया था कि नरेंद्र ने उन्हें हमले की सूचना दी, जिसके बाद वे घटनास्थल पर पहुंचीं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बीच-बचाव के दौरान उनके साथ जातिसूचक गाली-गलौज की गई और उन्हें चोटें भी आईं।

हालांकि, बचाव पक्ष ने दलील दी कि नरेंद्र (PW-3) अदालत में मुकर गया और उसने कहा कि वह कभी पद्मम्मा के घर सूचना देने नहीं गया था। इसके अलावा, कथित पंचायत के बारे में गवाही देने वाले अन्य गवाह (PW-4 और PW-5) भी होस्टाइल (पक्षद्रोही) हो गए और उन्होंने गांव में ऐसी किसी भी पंचायत के आयोजन से इनकार कर दिया, जिससे हत्या का उद्देश्य (Motive) ही संदिग्ध हो गया।

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सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने साक्ष्यों का बारीकी से विश्लेषण करते हुए पाया कि मेडिकल साक्ष्य पूरी तरह अविश्वसनीय हैं। अदालत ने गौर किया कि इंक्वेस्ट रिपोर्ट (Ex. P-7) और पोस्टमार्टम रिपोर्ट (Ex. P-8) में तारीखों को लेकर भारी अंतर था। इंक्वेस्ट रिपोर्ट के अनुसार पोस्टमार्टम 13 मई 2013 को संपन्न हुआ, जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में इसे 14 मई 2014 बताया गया। मेडिकल ऑफिसर (PW-7) इन विसंगतियों का कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं दे सके।

मेडिकल रिपोर्ट की साक्ष्य के तौर पर अहमियत पर गुलाम हसन बेग बनाम मोहम्मद मकबूल माग्रे (2022) का हवाला देते हुए पीठ ने कहा:

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“…डॉक्टर की पोस्टमार्टम रिपोर्ट शव के परीक्षण पर आधारित उसका पिछला बयान मात्र है। यह स्वतंत्र रूप से पुख्ता साक्ष्य नहीं है। अदालत में डॉक्टर द्वारा दिया गया बयान ही मुख्य साक्ष्य माना जाता है।”

मृतक की मां (PW-1) की गवाही पर अदालत ने भास्करराव बनाम महाराष्ट्र राज्य (2018) का संदर्भ देते हुए कहा कि यद्यपि रिश्तेदार की गवाही को सीधे खारिज नहीं किया जा सकता, लेकिन यदि उसमें विरोधाभास हो, तो सावधानी बरतनी जरूरी है। पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि घटना एक व्यस्त मुख्य मार्ग पर हुई थी, फिर भी अभियोजन ने किसी भी स्वतंत्र स्थानीय गवाह को पेश नहीं किया।

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अदालत का निर्णय

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी होस्टाइल गवाह का बयान विश्वसनीय लगता है, तो उसका उपयोग आरोपी को बरी करने के लिए किया जा सकता है। इस मामले में PW-3, PW-4 और PW-5 के बयानों ने अभियोजन के मामले की नींव ही हिला दी।

अदालत ने टिप्पणी की:

“…होस्टाइल गवाह की गवाही या उसके बयान का उपयोग अभियोजन के मामले को खारिज करने के लिए किया जा सकता है और इसके आधार पर दोषमुक्ति का निर्णय लिया जा सकता है।”

पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन घटना के होने को ही साबित नहीं कर सका। ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेशों को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तलारी नरेश को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया।

मामले का विवरण:

  • केस का शीर्षक: तलारी नरेश बनाम तेलंगाना राज्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या ___ ऑफ 2026 (SLP(Crl.) No. 13614 of 2025 से उत्पन्न)
  • पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया
  • तारीख: 13 मई, 2026

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