निजी घर में हुई घटना SC/ST एक्ट के तहत अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने परिवार के खिलाफ दर्ज केस किया रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने एक पारिवारिक विवाद में चार व्यक्तियों के खिलाफ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 और भारतीय दंड संहिता (IPC), 1860 के तहत तय किए गए आरोपों को रद्द कर दिया है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने स्पष्ट किया कि SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत अपराध तब माना जाता है जब जातिगत अपमान “सार्वजनिक दृष्टि के भीतर किसी स्थान” (Place within public view) पर हुआ हो। कोर्ट ने पाया कि घर के भीतर हुई घटना इस दायरे में नहीं आती।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद स्वर्गीय श्री नंद किशोर की संपत्तियों को लेकर उनके परिवार के सदस्यों के बीच शुरू हुआ था। अपीलकर्ता संख्या 2 और 3 तथा शिकायतकर्ता (प्रतिवादी संख्या 2) सगे भाई हैं और अनुसूचित जाति से संबंध रखते हैं। अपीलकर्ता संख्या 1 और 4, दूसरे और तीसरे अपीलकर्ता की पत्नियाँ हैं, जो अन्य जातियों से आती हैं।

शिकायतकर्ता ने साल 2021 में FIR दर्ज कराई थी कि 28 जनवरी 2021 को, जब वह अपने घर का ताला खोलने की कोशिश कर रहा था, तब अपीलकर्ताओं ने उसके साथ दुर्व्यवहार किया। आरोप था कि अपीलकर्ता संख्या 1 ने शिकायतकर्ता के दोस्तों की मौजूदगी में उसके और उसकी पत्नी के खिलाफ “चूड़ा”, “चमार” और “हरिजन” जैसे जातिगत शब्दों का इस्तेमाल किया। ट्रायल कोर्ट ने इन आरोपों के आधार पर अपीलकर्ता संख्या 1 के खिलाफ SC/ST एक्ट और सभी अपीलकर्ताओं के खिलाफ IPC की धारा 506 (आपराधिक धमकी) के तहत आरोप तय किए थे। दिल्ली हाईकोर्ट ने 22 अगस्त 2024 को इन आदेशों के खिलाफ दायर अपील खारिज कर दी थी, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि चूंकि कथित घटना एक आवासीय घर के भीतर हुई थी, इसलिए “सार्वजनिक दृष्टि के भीतर” वाली अनिवार्य शर्त पूरी नहीं होती। इसके अलावा, यह भी कहा गया कि शिकायत के तथ्य IPC की धारा 506 के तहत आपराधिक धमकी की श्रेणी में नहीं आते।

दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि आरोप तय करने के चरण में अदालत को मिनी-ट्रायल करने की आवश्यकता नहीं है और गवाहों के बयान जातिगत अपमान और जान से मारने की धमकी की पुष्टि करते हैं।

READ ALSO  SC Clears Hurdle for Paramedical Admissions in Madhya Pradesh, Lifts HC Stay

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST एक्ट की धाराओं में प्रयुक्त वाक्यांश “सार्वजनिक दृष्टि के भीतर किसी स्थान पर” (In any place within public view) की कानूनी व्याख्या की। कोर्ट ने स्वर्ण सिंह बनाम राज्य (2008), हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य (2020) और करुप्पुदयर बनाम राज्य (2025) जैसे पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा:

“यह देखा जा सकता है कि ‘सार्वजनिक दृष्टि के भीतर’ होने के लिए स्थान ऐसा खुला होना चाहिए जहाँ जनता के सदस्य आरोपी द्वारा पीड़ित को कही गई बातों को देख या सुन सकें। यदि कथित अपराध चारदीवारी के भीतर होता है जहाँ जनता के सदस्य मौजूद नहीं हैं, तो यह नहीं कहा जा सकता कि यह सार्वजनिक दृष्टि के भीतर किसी स्थान पर हुआ है।”

READ ALSO  वायु प्रदूषण की लगातार बढ़ती चिंताओं के बीच सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में पटाखों पर प्रतिबंध बरकरार रखा

पीठ ने गौर किया कि FIR और चार्जशीट के अनुसार घटना रमेश नगर स्थित एक निजी आवास में हुई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता के दोस्तों की मौजूदगी एक निजी घर को सार्वजनिक स्थान में नहीं बदल देती। अदालत ने टिप्पणी की:

“एक आवासीय घर किसी भी तरह से ‘सार्वजनिक दृष्टि के भीतर’ वाला स्थान नहीं बन जाता… भले ही वह निजी स्थान हो, लेकिन ऐसी स्थिति में सार्वजनिक नजर की वहां तक पहुंच होनी चाहिए ताकि वह देख सके कि वहां क्या हो रहा है।”

READ ALSO  अदालत ने 'कदाचार' की रिपोर्ट सामने आने के बाद घोटाले के आरोपी कपिल वधावन को नासिक जेल में स्थानांतरित करने की अनुमति दी

IPC के आरोपों पर कोर्ट ने पाया कि धारा 503 के तहत “डराने के इरादे” का अभाव था और अपीलकर्ताओं के बीच किसी “साझा इरादे” (Common Intention) का भी कोई सबूत नहीं मिला।

अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालत ने गलत तरीके से आरोप तय किए थे क्योंकि FIR में अपराध के बुनियादी तत्व ही गायब थे। अदालत ने कहा:

“यह एक स्थापित सिद्धांत है कि यदि FIR के तथ्यों को उनके अंकित मूल्य पर लेने पर भी कोई मामला नहीं बनता है, तो ऐसी FIR रद्द किए जाने योग्य है।”

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के आदेशों को रद्द कर दिया। इसके साथ ही कीर्ति नगर थाने में दर्ज FIR संख्या 42/2021 और चार्जशीट को भी पूरी तरह से निरस्त कर दिया गया है।

केस विवरण:

  • केस शीर्षक: गुंजन @ गिरिजा कुमारी और अन्य बनाम राज्य (NCT दिल्ली) और अन्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2446/2026 (SLP (Crl.) संख्या 9198/2025 से उत्पन्न)
  • पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया
  • दिनांक: 11 मई, 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles