चुनावी याचिका पर अंतिम फैसला आने के बाद निर्धारित प्राधिकारी ‘फंक्टस ऑफिशियो’ हो जाता है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के ग्राम पंचायत चुनाव विवाद में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें पुनर्मतगणना (Recounting) के आदेश को रद्द कर दिया गया था। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने स्पष्ट किया कि जब एक निर्धारित प्राधिकारी (Prescribed Authority) किसी चुनावी याचिका पर अंतिम राहत का आदेश पारित कर देता है, तो वह ‘फंक्टस ऑफिशियो’ हो जाता है। इसका अर्थ है कि उस मामले में उसकी अधिकारिता समाप्त हो जाती है और वह पुनर्मतगणना के बाद नया परिणाम घोषित करने जैसा कोई भी अगला आदेश पारित नहीं कर सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद वर्ष 2021 में उत्तर प्रदेश के एटा जिले के ग्राम परौली सुहागपुर में हुए प्रधान पद के चुनाव से जुड़ा है। अपीलकर्ता उर्मिला देवी यह चुनाव प्रतिवादी संख्या 3, मनोज देवी से मात्र दो वोटों के मामूली अंतर से हार गई थीं। उर्मिला देवी ने मतगणना प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं और ‘यूपी पंचायत चुनाव नियमावली, 1994’ के नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए ‘यूपी पंचायत राज अधिनियम, 1947’ की धारा 12C के तहत एक चुनावी याचिका दायर की थी।

5 नवंबर, 2022 को उप-जिलाधिकारी (SDO)/निर्धारित प्राधिकारी ने याचिका को स्वीकार करते हुए पुनर्मतगणना का आदेश दिया। इसके बाद हुई दोबारा गिनती में उर्मिला देवी को 12 वोटों से विजेता घोषित कर दिया गया। इसी प्रक्रिया को प्रतिवादी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ता का पक्ष: अपीलकर्ता के वकील श्री अशोक आनंद ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने मतगणना की गड़बड़ियों के तथ्यात्मक निष्कर्षों को नजरअंदाज किया। उन्होंने कहा कि पुनर्मतगणना के नतीजों ने साबित कर दिया कि मूल गिनती में गड़बड़ी थी क्योंकि अपीलकर्ता वास्तव में चुनाव जीत चुकी थीं। इसके अलावा, यह भी तर्क दिया गया कि प्रतिवादी के पास जिला न्यायाधीश के समक्ष पुनरीक्षण (Revision) का विकल्प था, जिसे छोड़कर वे सीधे हाईकोर्ट चले गए।

प्रतिवादी संख्या 3 का पक्ष: प्रतिवादी के वकीलों ने दलील दी कि 5 नवंबर, 2022 का SDO का आदेश एक ‘अंतिम आदेश’ था। याचिका को “मंजूर” (Allow) करने और साथ ही पुनर्मतगणना का निर्देश देने के कारण SDO ‘फंक्टस ऑफिशियो’ हो गए थे। कानून के अनुसार, एक बार ट्रिब्यूनल अंतिम फैसला सुना दे, तो वह कार्यवाही को दोबारा नहीं खोल सकता। उन्होंने यह भी कहा कि पुनर्मतगणना केवल संदिग्ध आधारों पर आदेशित की गई थी, जो गुप्त मतदान की गरिमा के विरुद्ध है।

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कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या 5 नवंबर, 2022 का आदेश एक अंतरिम निर्देश था या अंतिम आदेश। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 12-C की योजना पर जोर देते हुए कहा कि चुनाव परिणाम को रद्द करने की शक्ति केवल निर्धारित प्राधिकारी के पास है।

कोर्ट ने टिप्पणी की:

“एक बार जब निर्धारित प्राधिकारी अंतिम राहत का आदेश पारित कर देता है, तो यह कानून में अच्छी तरह से स्थापित है कि चुनाव के संबंध में वह कोई और आदेश पारित करने का अधिकार खो देता है, क्योंकि वह उस मामले के संबंध में ‘फंक्टस ऑफिशियो’ बन जाता है।”

पीठ ने हरि विष्णु कामथ बनाम सैयद अहमद इशाक और अन्य (AIR 1955 SC 233) के फैसले पर भरोसा जताया। साथ ही, इलाहाबाद हाईकोर्ट के परशुराम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2022) के मामले में दी गई इस दलील को भी सही माना:

“एक बार चुनावी याचिका का फैसला हो जाने के बाद, निर्धारित प्राधिकारी ‘फंक्टस ऑफिशियो’ हो जाता है और पुनर्मतगणना के बाद मिलने वाले कम या ज्यादा वोटों का कोई अर्थ नहीं रह जाता, क्योंकि वह प्राधिकारी उस समय चुनाव परिणाम को दोबारा बदलने या नया विजेता घोषित करने की शक्ति खो चुका होता है।”

पीठ ने इस मामले को राज कुमारी बनाम आशा देवी (2024) के हालिया फैसले से अलग बताया, जहाँ पुनर्मतगणना के आदेश को ‘अंतरिम’ माना गया था क्योंकि वहां प्राधिकारी ने परिणाम की रिपोर्ट वापस माँगी थी। वर्तमान मामले में, SDO ने 5 नवंबर को सीधे याचिका को “मंजूर” कर दिया था, जिससे वह आदेश अंतिम प्रकृति का हो गया।

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सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि 5 नवंबर, 2022 को ‘फंक्टस ऑफिशियो’ हो जाने के बाद, निर्धारित प्राधिकारी 17 मार्च, 2023 को उर्मिला देवी को विजेता घोषित करने का दूसरा आदेश पारित नहीं कर सकता था।

कोर्ट ने स्पष्ट किया:

“चुनाव परिणामों को रद्द करने की शक्ति विशेष रूप से निर्धारित प्राधिकारी के पास होती है, और एक बार जब वह ‘फंक्टस ऑफिशियो’ हो जाता है, तो ऐसी शक्ति का प्रयोग उसके बाद नहीं किया जा सकता।”

इन निष्कर्षों के साथ, शीर्ष अदालत ने अपील को खारिज कर दिया और हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया। साथ ही, प्राधिकारी को चेतावनी दी कि वे भविष्य में चुनावी याचिकाओं पर विचार करते समय अधिक सतर्क रहें।

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केस विवरण:

  • केस शीर्षक: उर्मिला देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या 7427/2026 (SLP (C) संख्या 9638/2023 से उत्पन्न)
  • पीठ: जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले
  • दिनांक: 11 मई, 2026

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