सुप्रीम कोर्ट ने 1998 के एक हत्या के मामले में मितेश @ टी.वी. वाघेला की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखते हुए उसकी आपराधिक अपील खारिज कर दी है। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मुकदमों में साक्ष्य की गुणवत्ता (quality) मायने रखती है, न कि गवाहों की संख्या (quantity)। कोर्ट ने कहा कि यदि एक अकेला गवाह पूरी तरह विश्वसनीय है, तो उसके बयान के आधार पर सजा सुनाई जा सकती है, भले ही अन्य गवाह अपने बयानों से मुकर गए हों।
इस मामले में मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या केवल एक चश्मदीद गवाह (PW-12) और मृतक के भाई (PW-1) को दिए गए मौखिक ‘डाइंग डिक्लेरेशन’ (मृत्युपूर्व कथन) के आधार पर सजा को बरकरार रखा जा सकता है, जबकि अन्य महत्वपूर्ण और ‘पंच’ गवाह मुकर (hostile) चुके थे। कोर्ट ने इन परिस्थितियों में ट्रायल कोर्ट और गुजरात हाईकोर्ट के निष्कर्षों की वैधता की समीक्षा की।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 11 दिसंबर, 1998 को अहमदाबाद में हुई एक घटना से जुड़ा है। मृतक सोमाभाई सांकाभाई रबारी की एक चाय की दुकान थी। घटना की पिछली रात, आरोपी मितेश ने सोमाभाई की चाय के कप धोने वाली बाल्टी में जलती हुई सिगरेट फेंक दी थी, जिसे लेकर दोनों के बीच झगड़ा हुआ था। सोमाभाई ने अपने भाई ईश्वरभाई (PW-1) को बताया था कि मितेश ने उसे “देख लेने” की धमकी दी है।
अगली सुबह, 12 दिसंबर 1998 को सोमाभाई अपनी दुकान के पास लहूलुहान हालत में मिले। ईश्वरभाई (PW-1) ने गवाही दी कि मौके पर पहुँचने पर सोमाभाई ने मितेश को हमलावर बताया था। अस्पताल ले जाते समय भी सोमाभाई ने ऑटो-रिक्शा में यही बात दोहराई, लेकिन अस्पताल पहुँचते ही उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। ट्रायल कोर्ट ने 18 अक्टूबर, 2000 को आरोपी को आईपीसी की धारा 302 और बॉम्बे पुलिस एक्ट की धारा 135 के तहत दोषी ठहराया था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता के वकील के. शारदा देवी ने तर्क दिया कि:
- अधिकांश चश्मदीद और पंच गवाह मुकर गए हैं, जिससे अभियोजन पक्ष की साक्ष्य श्रृंखला टूट गई है।
- चिकित्सा साक्ष्य के अनुसार मृतक बेहोश था और मौखिक डाइंग डिक्लेरेशन देने की स्थिति में नहीं था।
- एकमात्र चश्मदीद गवाह (PW-12) का व्यवहार “अस्वाभाविक” था क्योंकि उसने घायल को तुरंत अस्पताल नहीं पहुँचाया।
वहीं राज्य सरकार की ओर से पेश वकील स्वाति घिल्डियाल ने दलील दी कि PW-1 और PW-12 की गवाही “बेहतरीन गुणवत्ता” (sterling quality) की है और कड़ी जिरह के बाद भी उनके बयानों में कोई बदलाव नहीं आया है, जिससे मामला संदेह से परे साबित होता है।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने मकसद (motive), मंशा (mens rea) और घटना के कृत्य (actus reus) पर ध्यान केंद्रित करते हुए सबूतों का पुनर्मूल्यांकन किया।
1. मकसद और मंशा पर कोर्ट ने पाया कि सिगरेट को लेकर हुआ झगड़ा हत्या का स्पष्ट मकसद था। कोर्ट ने कहा: “झगड़े और घटना के बीच का कम समय, और पहले दी गई धमकी, आरोपी के मकसद और मंशा को स्पष्ट रूप से स्थापित करती है।”
2. मौखिक डाइंग डिक्लेरेशन पर बचाव पक्ष के इस तर्क को खारिज करते हुए कि मृतक बोलने की स्थिति में नहीं था, कोर्ट ने कहा कि कथन स्वाभाविक रूप से अपने भाई (PW-1) को दिए गए थे। कोर्ट ने कहा:
“यह इस न्यायालय के विभिन्न निर्णयों द्वारा स्थापित है कि एक सच्चा और स्वैच्छिक मृत्युपूर्व कथन (dying declaration), यदि विश्वसनीय पाया जाता है, तो बिना किसी अन्य पुष्टि के सजा का एकमात्र आधार बन सकता है।”
3. अकेले विश्वसनीय गवाह पर पीठ ने नामदेव बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि गवाहों के मुकरने से केस खत्म नहीं होता। कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“हमारी कानूनी प्रणाली ने हमेशा गवाहों की संख्या या बहुलता के बजाय साक्ष्य के मूल्य, वजन और गुणवत्ता पर जोर दिया है। इसलिए, एक सक्षम अदालत के लिए यह संभव है कि वह एक अकेले गवाह पर पूरी तरह से भरोसा करे और सजा सुनाए।”
कोर्ट ने PW-12 (रिक्शा चालक) की गवाही को “ठोस और विश्वसनीय” पाया और कहा कि उसका हमलावर को चाकू मारते हुए देखना एक स्वाभाविक वृत्तांत था।
निर्णय
निचली अदालतों के फैसलों में कोई खामी न पाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी। हालांकि, यह देखते हुए कि अपीलकर्ता अपनी सजा का एक बड़ा हिस्सा काट चुका है, कोर्ट ने उसे मौजूदा नीति के अनुसार समय पूर्व रिहाई (remission) के लिए आवेदन करने की छूट दी और निर्देश दिया कि ऐसे आवेदन पर शीघ्रता से विचार किया जाए।
केस का शीर्षक: मितेश @ टी.वी. वाघेला बनाम गुजरात राज्य
केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 212/2012
पीठ: जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले
दिनांक: 11 मई, 2026

