अयोध्या में जमीन अधिग्रहण पर हाईकोर्ट की रोक: कम मुआवजे को लेकर सरकार से मांगा जवाब

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने अयोध्या में उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद (UPAEVP) की विभिन्न योजनाओं के लिए चल रही जमीन अधिग्रहण की कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगा दी है। जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की डिविजन बेंच ने बुधवार को आदेश देते हुए राज्य सरकार और जिला प्रशासन समेत सभी संबंधित पक्षों को कार्यस्थल पर यथास्थिति (status quo) बनाए रखने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने पहली नजर में माना कि 1965 के पुराने राज्य कानून के तहत किया जा रहा अधिग्रहण, 2013 के केंद्रीय कानून की तुलना में जमीन मालिकों के लिए कम लाभकारी प्रतीत होता है।

यह पूरा मामला 11 रिट याचिकाओं से जुड़ा है, जिसमें आवास विकास परिषद द्वारा अयोध्या में जमीन अधिग्रहण के लिए ‘उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद अधिनियम 1965’ के इस्तेमाल को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं, जिनमें मुख्य रूप से स्थानीय किसान और जमीन मालिक शामिल हैं, का आरोप है कि सरकारी विभाग जानबूझकर आधुनिक और अधिक मुआवजा देने वाले कानूनों की अनदेखी कर रहा है ताकि कम कीमतों पर जमीन ली जा सके।

कानूनी बहस का मुख्य केंद्र 1965 के राज्य अधिनियम और ‘भूमि अधिग्रहण में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन अधिनियम 2013’ के बीच का टकराव है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जहां 1965 का अधिनियम लाभकारी प्रावधानों की बात करता है, वहीं 2013 का केंद्रीय कानून एक बेहतर मानक है जिसे इस मामले में लागू किया जाना चाहिए।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों ने दलील दी कि 2013 का कानून न केवल “काफी अधिक मुआवजा” सुनिश्चित करता है, बल्कि इसमें कई सुरक्षा उपाय भी शामिल हैं जो 1965 के कानून में नहीं हैं। इनमें शामिल हैं:

  • जमीन के लिए बेहतर वित्तीय मुआवजा।
  • अनिवार्य पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन के प्रावधान।
  • अधिग्रहण से पहले सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट (SIA) की अनिवार्यता।
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याचिकाकर्ताओं का कहना है कि 1965 के कानून के तहत कार्यवाही करके सरकार उन्हें इन आधुनिक लाभों से वंचित कर रही है, जिसके परिणामस्वरूप उनकी कीमती जमीन “कौड़ियों के दाम” पर ली जा रही है।

सुनवाई के दौरान, जब याचिकाकर्ताओं ने अपनी बहस पूरी कर ली, तो राज्य के आवास एवं शहरी नियोजन विभाग, अयोध्या के जिलाधिकारी और आवास विकास परिषद के वकीलों ने बुधवार को जवाब देने के लिए और समय मांगा।

इस देरी पर कड़ा रुख अपनाते हुए बेंच ने टिप्पणी की कि यह मामला लंबे समय से लंबित है और “अनुचित स्थगन (adjournments) उचित नहीं होगा।” कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि यदि अगली तारीख पर राज्य सरकार या आवास परिषद अपनी दलीलें पेश करने में विफल रहती है, तो उन्हें लिखित दलीलें (written submissions) दाखिल करनी होंगी।

अंतरिम आदेश में हाईकोर्ट ने नोट किया:

“प्रथम दृष्टया, 1965 के अधिनियम के तहत अधिग्रहण 2013 के कानून की तुलना में कम लाभकारी प्रतीत होता है।”

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इसी के आधार पर, बेंच ने साल 2020 और उसके बाद जारी की गई अधिसूचनाओं के तहत शुरू की गई अधिग्रहण प्रक्रिया पर रोक लगाना उचित समझा।

हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अयोध्या में आवास विकास की योजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण का काम फिलहाल थम गया है। मामले की अगली सुनवाई गुरुवार को तय की गई है, जिसमें राज्य अधिकारियों को यह स्पष्ट करना होगा कि वे 2013 के केंद्रीय कानून के बजाय 1965 के पुराने कानून को प्राथमिकता क्यों दे रहे हैं।

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