नगर निकाय की सीमाओं का निर्धारण एक विधायी कार्य; सिविल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र वर्जित: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि महाराष्ट्र नगर निगम अधिनियम, 1949 (MMC अधिनियम) की धारा 3 के तहत नगर निगम की सीमाओं का निर्धारण या उसमें बदलाव करना एक विधायी कार्य (legislative function) है। अदालत ने कहा कि किसी सिविल कोर्ट द्वारा घोषणात्मक वाद (declaratory suit) के माध्यम से इसकी वैधता का फैसला नहीं किया जा सकता। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने उचगांव ग्राम पंचायत द्वारा दायर अपीलों को खारिज करते हुए कहा कि नगर निगम के अधिकार क्षेत्र और योजना नियंत्रण से संबंधित मामले निजी नागरिक अधिकारों के बजाय सार्वजनिक कानून (public law) के दायरे में आते हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद जनवरी 2013 में तब शुरू हुआ जब कोल्हापुर नगर निगम ने एक सार्वजनिक नोटिस जारी कर दावा किया कि उचगांव गांव की विशिष्ट जमीनें उसके निगम क्षेत्र के भीतर आती हैं। नोटिस में कहा गया कि इन जमीनों पर किए गए कुछ निर्माण निगम की अनुमति के बिना थे और उन्हें गिराया जा सकता है।

1943 में स्थापित उचगांव ग्राम पंचायत ने इस नोटिस को चुनौती देते हुए ‘रेगुलर सिविल सूट नंबर 193/2013’ दायर किया। पंचायत ने मांग की कि अदालत इन जमीनों को निगम सीमा में शामिल करने को अवैध घोषित करे और तोड़फोड़ पर रोक लगाए। कोल्हापुर की सिविल कोर्ट (जूनियर डिवीजन) ने शुरुआत में माना कि उसके पास सुनवाई का अधिकार है और अंतरिम रोक लगा दी। हालांकि, फरवरी 2018 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया और कहा कि सिविल कोर्ट के पास इस मामले में अधिकार क्षेत्र नहीं है क्योंकि नगर निगम की सीमाओं का विस्तार एक विधायी कार्य है।

पक्षों की दलीलें

पंचायत (अपीलकर्ता) के लिए: पंचायत के वकील ने तर्क दिया कि विवादित जमीन पूरी तरह से पंचायत के अधिकार क्षेत्र में आती है और निगम का इससे कोई लेना-देना नहीं है। यह भी कहा गया कि निगम 1945 की वह अधिसूचना पेश करने में विफल रहा, जिसके आधार पर इन जमीनों को निगम सीमा में शामिल करने का दावा किया गया था। पंचायत ने दलील दी कि महाराष्ट्र क्षेत्रीय और नगर नियोजन अधिनियम, 1966 (MRTP अधिनियम) की धारा 149 के तहत सिविल कोर्ट पर लगी रोक इस मामले में लागू नहीं होती।

नगर निगम (प्रतिवादी) के लिए: निगम के वकील ने हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि MMC अधिनियम की धारा 3 के तहत सीमा निर्धारण एक विधायी शक्ति है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि चूंकि नोटिस MRTP अधिनियम के तहत एक ‘नियोजन प्राधिकरण’ (planning authority) के रूप में जारी किया गया था, इसलिए धारा 149 के तहत सिविल कोर्ट का हस्तक्षेप स्पष्ट रूप से वर्जित है।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने राहत की प्रकृति और वैधानिक ढांचे की समीक्षा की। पीठ ने कहा कि MMC अधिनियम की धारा 3 राज्य सरकार को सीमाएं निर्धारित करने की शक्ति देती है। इस शक्ति की प्रकृति पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा:

“इस शक्ति की प्रकृति सामान्य अर्थों में प्रशासनिक नहीं है, बल्कि इसमें विधायी कार्य का गुण है, जिसमें नगरपालिका की सीमाओं की घोषणा और विशिष्ट क्षेत्रों के शासन के लिए स्थानीय निकायों का गठन शामिल है।”

अदालत ने आगे कहा कि एक बार वैधानिक शक्ति के प्रयोग में ऐसा निर्णय ले लिया जाए, तो उसकी वैधता सिविल सूट का विषय नहीं हो सकती। MRTP अधिनियम के संदर्भ में पीठ ने पाया कि चूंकि निगम ने अनधिकृत निर्माणों के खिलाफ एक नियोजन प्राधिकरण के रूप में कार्य किया था, इसलिए सिविल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र पूरी तरह बाहर था।

तथ्यात्मक विवादों पर पंचायत के तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा:

“तथ्यों के विवादित प्रश्नों का अस्तित्व, अपने आप में, अधिकार क्षेत्र प्रदान नहीं करता है, जहां कानूनन विवाद का विषय सिविल कोर्ट के दायरे से बाहर है।”

पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि जमीनों को शामिल करने की प्रक्रिया 1945 की अधिसूचनाओं से जुड़ी है। अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसे विधायी कार्य अंतिम रूप प्राप्त कर लेते हैं और दशकों बाद किसी ग्राम पंचायत द्वारा इन्हें चुनौती देकर अस्थिर नहीं किया जा सकता।

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निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि हाईकोर्ट ने अपने पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार (revisional jurisdiction) का सही उपयोग किया है। पीठ को हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष में कोई त्रुटि नहीं मिली कि सिविल कोर्ट के पास इस विवाद को सुनने की क्षमता नहीं थी। परिणामस्वरूप, अपीलों को खारिज कर दिया गया और 3 मई 2018 को दिया गया यथास्थिति (status quo) का अंतरिम आदेश वापस ले लिया गया।

केस विवरण

केस शीर्षक: उचगांव ग्राम पंचायत बनाम कोल्हापुर नगर निगम और अन्य

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केस संख्या: सिविल अपील संख्या 4684/2026

पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन

दिनांक: 22 अप्रैल, 2026

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