दिल्ली हाईकोर्ट ने सीलबंद खाद्य पैकेटों पर बैच और लॉट नंबर न होने से जुड़े 31 साल पुराने एक आपराधिक मामले को रद्द कर दिया है। अदालत ने फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि यदि खाद्य उत्पाद मिलावटी नहीं है और पहली बार केवल तकनीकी लेबलिंग से जुड़ी खामी सामने आती है, तो संबंधित कंपनी को पहले लिखित चेतावनी दी जानी अनिवार्य है। ऐसी चेतावनी दिए बिना सीधे मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
न्यायमूर्ति स्वर्णा कांता शर्मा ने 14 सितंबर को पारित अपने आदेश में कांकोर इंग्रीडिएंट्स लिमिटेड और उसके अधिकारियों के खिलाफ निचली अदालत में लंबित आपराधिक शिकायत और उससे जुड़ी समस्त कार्यवाही को निरस्त कर दिया।
मिलावट के अभाव में पहली गलती पर मुकदमा अनुचित
अदालत ने कहा कि आरोपी पक्षों के खिलाफ दर्ज मामले में खाद्य सामग्री की गुणवत्ता को लेकर कोई शिकायत नहीं थी। सार्वजनिक विश्लेषक यानी पब्लिक एनालिस्ट की रिपोर्ट में भी यह कहीं नहीं कहा गया कि एकत्र किया गया नमूना मिलावटी, असुरक्षित, घटिया या तय मानकों के विपरीत था। पूरा मामला केवल पैकेट पर बैच, लॉट या कोड नंबर दर्ज न होने से जुड़ा था।
हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि सरकारी नीति के तहत पहली बार तकनीकी लेबलिंग उल्लंघन के मामले में लिखित चेतावनी जारी करने का नियम है। यदि संबंधित कंपनी चेतावनी मिलने के बाद दोबारा वही गलती दोहराती है, तभी मुकदमा शुरू किया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि खाद्य सामग्री में किसी भी प्रकार की मिलावट पाई जाती, तो कंपनी को चेतावनी नीति का कोई लाभ नहीं मिलता और उस स्थिति में मिलावट तथा लेबलिंग उल्लंघन दोनों के तहत एक साथ कानूनी कार्रवाई की जा सकती थी।
न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी के रेस्टोरेंट से जब्त हुए थे पैकेट
यह कानूनी विवाद 31 अक्टूबर 1995 को शुरू हुआ था, जब दिल्ली प्रशासन के एक खाद्य निरीक्षक ने न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी स्थित पेप्सिको के एक रेस्टोरेंट पर छापा मारा। वहां से ‘हॉट एंड स्पाइसी मैरिनेड’ के 680 ग्राम वाले तीन सीलबंद पैकेट जब्त किए गए। जांच के दौरान पाया गया कि पैकेट के लेबल पर बैच, लॉट अथवा कोड नंबर अंकित नहीं था।
सार्वजनिक विश्लेषक ने इसे मिसब्रांडिंग करार देते हुए प्रिवेंशन ऑफ फूड एडल्ट्रेशन (पीएफए) रूल्स, 1955 के नियम 32(ई) और 32(एफ) का उल्लंघन माना। यह खाद्य सामग्री पेप्सिको को कांकोर फ्लेवर्स एंड एक्सट्रैक्ट्स लिमिटेड द्वारा आपूर्ति की गई थी, जिसके बारे में आरोप था कि उसने इसे सिंगापुर स्थित निर्माता से आयात किया था। इसके बाद पीएफए कानून और नियमों के तहत कांकोर, उसके निदेशकों और महाप्रबंधकों सहित कुल 11 आरोपियों के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज कराई गई थी। वर्ष 2010 में निचली अदालत ने नोटिस तय करने के लिए याचिकाकर्ताओं सहित शेष आरोपियों को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया था।
1985 की अधिसूचना का मिला कानूनी लाभ
हाईकोर्ट में कांकोर इंग्रीडिएंट्स लिमिटेड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रमोद कुमार दुबे पेश हुए। उनके साथ अधिवक्ता पुनीत रेलन, रामचंद्रुनी बी सिद्धार्थ, खुशी अरोड़ा और शिवांगी मिश्रा ने दलीलें रखीं। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि पूरा मामला केवल बैच कोड या लॉट नंबर के अभाव के कारण मिसब्रांडिंग तक सीमित है, न कि खाद्य सामग्री में मिलावट का।
वकील ने 20 सितंबर 1985 की सरकारी अधिसूचना का हवाला देते हुए कहा कि नियम 32 के तहत पहली बार मिसब्रांडिंग का मामला सामने आने पर गलती करने वाले पक्ष को केवल लिखित चेतावनी दी जानी चाहिए, और भविष्य में उल्लंघन दोहराए जाने पर ही मुकदमा दर्ज होना चाहिए। उन्होंने अदालत को बताया कि वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता को शिकायत दर्ज करने से पहले कोई भी लिखित या मौखिक चेतावनी नहीं दी गई थी।
हाईकोर्ट ने 20 सितंबर 1985 की अधिसूचना पर सहमति जताते हुए कहा कि कई मामलों में सीलबंद खाद्य सामग्री तय मानकों पर खरी उतरती है, लेकिन लेबलिंग में नियम 32 की अनदेखी हो जाती है। ऐसे मामलों में जब सीलबंद पैकेट की सामग्री पूरी तरह मानक के अनुसार हो, तो लेबलिंग की खामी को केवल एक तकनीकी अपराध माना जाता है। चूंकि कंपनी का यह पहला तकनीकी उल्लंघन था और खाद्य सामग्री शुद्ध थी, इसलिए अदालत ने पूरे मामले को खारिज कर दिया।

