कासरगोड (केरल) केरल के कासरगोड स्थित जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने 19 वर्षीय युवक को नाविक (सीमैन) की नौकरी का झूठा झांसा देने के मामले में एक शिपिंग कंपनी को 1.80 लाख रुपये चुकाने का निर्देश दिया है। आयोग ने स्पष्ट किया कि रोजगार देने का दावा करने वाली कंपनियां अभ्यर्थियों से पैसे ऐंठकर और औपचारिक दस्तावेज जारी करके अपनी जिम्मेदारी से मुकर नहीं सकतीं।
आयोग के अध्यक्ष कृष्णन के. और सदस्य बीना के. जी. की पीठ ने 20 अगस्त को पारित अपने फैसले में विपक्ष को 30 दिनों के भीतर शिकायतकर्ता परिवार को कुल 1.80 लाख रुपये का भुगतान करने को कहा। इस राशि में वसूले गए 1.50 लाख रुपये की वापसी, सेवा में कमी और अनुचित व्यापार आचरण के लिए 25,000 रुपये का मुआवजा तथा मुकदमे के खर्च के रूप में 5,000 रुपये शामिल हैं।
गहने बेचकर जमा की थी रकम
मामले के अनुसार, 38 वर्षीय महिला के 19 वर्षीय बेटे ने वर्ष 2023 में एक विज्ञापन देखकर साधारण नाविक पद के लिए आवेदन किया था। कंपनी ने भर्ती प्रक्रिया के नाम पर 1.50 लाख रुपये की मांग रखी। बेरोजगार बेटे का भविष्य संवारने के लिए मां ने अपने सोने के जेवर बेचे और कंपनी के नाम वाले बैंक खाते में पहले 1 लाख रुपये तथा बाद में 50,000 रुपये जमा कराए।
भुगतान के बाद युवक को प्रबंध निदेशक के हस्ताक्षर और कंपनी की आधिकारिक मुहर वाला नियुक्ति अनुबंध पत्र भेजा गया। इस दस्तावेज में 850 अमेरिकी डॉलर प्रति घंटे के मूल वेतन के साथ अन्य भत्तों और सेवा शर्तों का उल्लेख था। इसके बाद कंपनी के निर्देशों का पालन करते हुए युवक 26 दिसंबर 2023 को ओडिशा के भुवनेश्वर पहुंचा और वहां एक गेस्ट हाउस में रुककर कंपनी के संपर्क का इंतजार करने लगा। हालांकि, वहां पहुंचते ही कंपनी के प्रतिनिधियों ने उसके फोन उठाने बंद कर दिए और उसे बिना किसी सूचना या काम के अकेला छोड़ दिया गया।
धोखाधड़ी और मानसिक प्रताड़ना से आहत होकर मां-बेटे ने अधिवक्ता चैत्रा एम. के जरिए उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने जमा की गई पूरी रकम, भुवनेश्वर आने-जाने में खर्च हुए 14,300 रुपये, ठहरने पर लगे 30,000 रुपये के साथ-साथ हर्जाने की मांग की।
कंपनी ने दी धोखाधड़ी और फर्जीवाड़े की दलील
कंपनी की ओर से पेश अधिवक्ता मुबाशिर कुंडूर ने तमाम आरोपों को खारिज करते हुए तर्क दिया कि शिकायतकर्ताओं के साथ उनका कोई सीधा लेन-देन या अनुबंध नहीं हुआ था। उन्होंने दावा किया कि किसी अज्ञात व्यक्ति ने कंपनी के नाम का दुरुपयोग कर फर्जी हस्ताक्षर और अनधिकृत दस्तावेजों के सहारे यह धोखाधड़ी की है। बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि इस संबंध में पुलिस आयुक्त के समक्ष शिकायत दर्ज कराई गई थी और आम जनता को सतर्क करने के लिए एक सार्वजनिक सूचना भी प्रकाशित की गई थी।
आयोग ने जताई कड़ी नाराजगी, भर्ती घोटालों पर चेताया
उपभोक्ता आयोग ने कंपनी के तर्कों को अमान्य करार दिया। आयोग ने रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों के आधार पर पाया कि युवक को सौंपा गया नियुक्ति पत्र कंपनी की सील, हस्ताक्षर और वेतन ब्योरे के साथ जारी एक प्रामाणिक पत्र जैसा दिखता है। आयोग ने अपनी टिप्पणी में कहा कि युवक बड़े सपनों और उम्मीदों के साथ कंपनी के पास गया था, लेकिन कंपनी के धोखे ने उसके सपनों को चकनाचूर कर दिया, जिससे पूरे परिवार को गंभीर मानसिक तनाव, पीड़ा और भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा।
इसके साथ ही पीठ ने नौकरी के नाम पर बढ़ते संगठित फर्जीवाड़े को लेकर भी गंभीर चेतावनी जारी की। आयोग ने रेखांकित किया कि फर्जी नियुक्ति पत्र या ईमेल भेजना, व्हाट्सएप अथवा टेलीग्राम समूहों के जरिए चयन का दावा करना, तुरंत पैसे ट्रांसफर करने का दबाव बनाना और बिना किसी सत्यापित कार्यालय के काम करना सीधे तौर पर धोखाधड़ी के स्पष्ट संकेत हैं।

