1993 के संशोधन के बाद नगर निगम कर्मचारियों के लिए कमिश्नर ही सक्षम अनुशासनात्मक प्राधिकारी; सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज की

सुप्रीम कोर्ट की एक खंडपीठ, जिसमें जस्टिस संजय करोल, जस्टिस मनोज मिश्रा शामिल थे, ने उत्तरी दिल्ली नगर निगम के एक पूर्व कार्यकारी अभियंता (एग्जीक्यूटिव इंजीनियर) की अपील को खारिज कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि वर्ष 1993 के वैधानिक संशोधन के बाद नगर निगम आयुक्त (कमिश्नर) ही ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों को सेवा से बर्खास्त करने के लिए सक्षम अनुशासनात्मक प्राधिकारी हैं। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने उस लंबे समय से चले आ रहे कानूनी विवाद का अंत कर दिया, जिसमें यह तर्क दिया जा रहा था कि वर्ष 1959 के पुराने सेवा नियम (जिसमें ‘निगम’ को सक्षम प्राधिकारी माना गया था) 1993 के संशोधन के बाद भी कमिश्नर की शक्तियों को सीमित करते हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता राजेश शर्मा उत्तरी दिल्ली नगर निगम में कार्यकारी अभियंता (सिविल) के पद पर कार्यरत थे। सेवा में रहते हुए, उन्हें 15 जुलाई 2011 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(d) और भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 420 व 120(B) के तहत दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई गई थी। इस दोषसिद्धि के बाद, नगर निगम आयुक्त ने 15 नवंबर 2011 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया था।

राजेश शर्मा ने इस बर्खास्तगी आदेश को केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट), प्रधान पीठ, नई दिल्ली के समक्ष चुनौती दी। उनका मुख्य तर्क यह था कि बर्खास्तगी के समय वे ग्रुप ‘ए’ अधिकारी थे और दिल्ली नगर निगम सेवा (नियंत्रण और अपील) नियम, 1959 के तहत उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार केवल ‘निगम’ (कॉरपोरेशन) के पास था, न कि कमिश्नर के पास।

7 अगस्त 2014 को कैट ने उनकी दलील स्वीकार करते हुए बर्खास्तगी आदेश रद्द कर दिया, लेकिन विभाग को नए सिरे से कार्रवाई करने की छूट दी। इस फैसले के खिलाफ निगम ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया। दिल्ली हाईकोर्ट ने 28 अगस्त 2019 को निगम की याचिका स्वीकार करते हुए माना कि कमिश्नर के पास अपीलकर्ता को बर्खास्त करने का पूरा अधिकार था। इस फैसले से असंतुष्ट होकर राजेश शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता के तर्क

अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि 1959 के नियमों के नियम 7 और अनुसूची के तहत, श्रेणी ‘ए’ के अधिकारियों पर बड़ी पेनाल्टी लगाने का अधिकार केवल निगम के पास सुरक्षित है, इसलिए कमिश्नर का आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर होने के कारण शून्य है। उन्होंने तर्क दिया कि 1957 के मूल अधिनियम की धारा 59(d), जिसे 1993 में संशोधित किया गया था, में कहा गया है कि कमिश्नर की अनुशासनात्मक शक्ति “इस संबंध में बनाए जाने वाले नियमों के अधीन” होगी। अपीलकर्ता के अनुसार, इसका मतलब यह है कि कमिश्नर की शक्तियां 1959 के पुराने नियमों के अधीन ही रहेंगी।

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इसके अलावा, अपीलकर्ता ने न्यायिक मर्यादा का सवाल उठाते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने इस मामले को बड़ी बेंच के पास न भेजकर गलती की, क्योंकि यह फैसला हाईकोर्ट की ही एक अन्य खंडपीठ के ‘एमसीडी बनाम वेद प्रकाश कनौजिया’ मामले के विपरीत था, जिसने ‘जी.एस. मथारू बनाम सीबीआई’ के फैसले को सही ठहराया था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि सामान्य खंड अधिनियम (General Clauses Act), 1897 की धारा 24 के तहत पुराने 1959 के नियम नए संशोधन के बाद भी सुरक्षित थे।

प्रतिवादियों के तर्क

नगर निगम और अन्य प्रतिवादियों की ओर से दलील दी गई कि 1993 के संशोधन का मुख्य उद्देश्य एस. बालकृष्णन समिति की रिपोर्ट की सिफारिशों के आधार पर दिल्ली के नगर निगम प्रशासन को अधिक सुव्यवस्थित और प्रभावी बनाना था। रिपोर्ट में इस बात को रेखांकित किया गया था कि पार्षदों के हस्तक्षेप के कारण कमिश्नर का प्रशासनिक और अनुशासनात्मक नियंत्रण कमजोर हो गया था, जिससे भ्रष्ट और लापरवाह कर्मचारियों को संरक्षण मिलता था।

संसद ने धारा 92 में संशोधन कर और धारा 59(d) को प्रतिस्थापित कर कमिश्नर को ही नियुक्ति और अनुशासनात्मक कार्रवाई दोनों का पूर्ण अधिकार देने का इरादा किया था। प्रतिवादियों ने स्पष्ट किया कि “इस संबंध में बनाए जाने वाले नियम” वाक्यांश केवल उन्हीं नियमों पर लागू होता है जो 1993 के संशोधन के बाद बनाए जाएंगे, न कि पुराने 1959 के नियमों पर। अंत में, यह तर्क भी दिया गया कि यदि किसी अधिनियम (कानून) और उसके तहत बने किसी नियम के बीच टकराव होता है, तो हमेशा अधिनियम ही प्रभावी माना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी व्याख्या

सुप्रीम कोर्ट ने वैधानिक ढांचे, 1993 के संशोधन के उद्देश्य और प्रतिस्थापन (Substitution) के जरिए किए जाने वाले संशोधनों के सिद्धांतों का गहराई से विश्लेषण किया।

प्रतिस्थापन के जरिए संशोधन और उसका प्रभाव

अदालत ने उस सिद्धांत पर विचार किया कि जब किसी कानूनी प्रावधान को ‘प्रतिस्थापित’ करके संशोधित किया जाता है, तो उसकी व्याख्या कैसे होनी चाहिए। कोर्ट ने ‘शामाराव वी. पारुलेकर बनाम जिला मजिस्ट्रेट, थाणा’ मामले में संविधान पीठ द्वारा दिए गए “पेन और इंक सिद्धांत” का उल्लेख किया:

“नियम यह है कि जब कोई बाद का अधिनियम किसी पिछले अधिनियम में इस तरह से संशोधन करता है कि वह खुद को या अपने किसी हिस्से को पिछले अधिनियम में समाहित कर लेता है, तो पिछले अधिनियम को उसके बाद इस तरह पढ़ा और समझा जाना चाहिए (सिवाय वहां जहां इससे कोई विसंगति या मूर्खतापूर्ण स्थिति पैदा होती हो) जैसे कि बदले हुए शब्दों को पेन और स्याही से पहले वाले अधिनियम में लिख दिया गया हो और पुराने शब्दों को काट दिया गया हो, ताकि उसके बाद संशोधन अधिनियम का संदर्भ लेने की कोई आवश्यकता ही न रहे।”

हालांकि, ‘राम नारायण बनाम शिमला बैंकिंग एंड इंडस्ट्रियल कंपनी लिमिटेड’ मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक संशोधन में स्पष्ट रूप से या आवश्यक रूप से भूतकाल से प्रभावी (Retrospective) होने की बात न कही गई हो, तब तक इसे पिछली तारीख से लागू नहीं माना जा सकता। चूंकि 1993 के अधिनियम 67 में ऐसा कोई संकेत नहीं था, इसलिए संशोधित धारा 59(d) को 1 अक्टूबर 1993 से ही प्रभावी (Prospective) माना गया।

“May Be Made” (बनाए जाने वाले) वाक्यांश का सही अर्थ

कोर्ट ने इस बात पर विचार किया कि क्या कमिश्नर की शक्तियां 1959 के पुराने नियमों से बंधी थीं। “इस संबंध में बनाए जाने वाले नियम” (subject to any regulation that may be made in this behalf) वाक्यांश की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने पाया कि इसमें भविष्य का संकेत छिपा है। ‘विजय कुमार शुकल बनाम लखपत राम’ मामले का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

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“वाक्यांश ‘इस संबंध में बनाए जाने वाले किसी भी नियम के अधीन’ उन नियमों को संदर्भित करता है जो 1993 के अधिनियम 67 द्वारा धारा 59 के खंड (डी) के प्रतिस्थापन के बाद बनाए गए हैं, न कि मौजूदा 1959 के नियमों को।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि संसद पुराने नियमों की सीमाओं को बनाए रखना चाहती, तो वह “इस अधिनियम के तहत बने नियमों” जैसे शब्दों का प्रयोग करती। यदि इसे पुराने नियमों पर भी लागू मान लिया जाए, तो “बनाए जाने वाले” शब्द पूरी तरह निरर्थक और बेकार हो जाएंगे।

सामान्य खंड अधिनियम की धारा 24 की दलील खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता की उस दलील को सिरे से खारिज कर दिया कि सामान्य खंड अधिनियम, 1897 की धारा 24 के तहत 1959 के पुराने नियम सुरक्षित थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पुराने नियम नए अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत हैं, तो धारा 24 लागू नहीं हो सकती। ‘मीरा गुप्ता बनाम पश्चिम बंगाल राज्य’ मामले का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा:

“विधायिका पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि उसने एक हाथ से कुछ देने और दूसरे हाथ से उसे वापस लेने की चालाकी या निरर्थकता का सहारा लिया है।”

अधिनियम और नियमों का सामंजस्यपूर्ण निर्माण

कोर्ट को अधिनियम की धारा 59(d) और धारा 95(1) के बीच कोई विरोधाभास नहीं मिला। धारा 95(1) केवल यह बताती है कि नियमों द्वारा निर्धारित प्राधिकारी ही सजा दे सकता है, लेकिन वह खुद किसी विशिष्ट प्राधिकारी का नाम तय नहीं करती।

अतः, जब तक 1 अक्टूबर 1993 के बाद कोई नया नियम बनाकर किसी अन्य प्राधिकारी को यह शक्ति नहीं सौंप दी जाती, तब तक कमिश्नर ही धारा 95(1) के तहत सजा देने के लिए एकमात्र सक्षम प्राधिकारी बने रहेंगे।

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न्यायिक मर्यादा और पूर्व उदाहरणों की स्थिति

हाईकोर्ट द्वारा अपने ही पुराने फैसले ‘जी.एस. मथारू बनाम सीबीआई’ से अलग राय रखने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मथारू मामले के खिलाफ दायर याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने सभी कानूनी सवालों को खुला रखते हुए खारिज किया था। इसका अर्थ यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने उस कानून को अपनी मंजूरी नहीं दी थी। कोर्ट ने ‘जी.एस. मथारू बनाम सीबीआई’ के फैसले को इस सीमा तक औपचारिक रूप से खारिज (Overrule) कर दिया, जहां तक वह इस वर्तमान फैसले के विपरीत था।

न्यायालय का अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि जिस तारीख को अपीलकर्ता को सेवा से बर्खास्त किया गया था, उस दिन नगर निगम आयुक्त ही सक्षम अनुशासनात्मक प्राधिकारी थे और उनके पास बर्खास्तगी का आदेश जारी करने का पूरा वैधानिक अधिकार था। अपील में कोई दम न पाते हुए न्यायालय ने इसे खारिज कर दिया और सभी लंबित अंतरिम आदेशों को वापस ले लिया।

मामले का विवरण:

Case Title: राजेश शर्मा बनाम नॉर्थ दिल्ली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन एवं अन्य

Case No.: सिविल अपील संख्या… वर्ष 2026 (एसएलपी (सी) संख्या 28644/2019 से उत्पन्न)

Bench: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस मनोज मिश्रा

Date: 17 जून, 2026

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