आय से अधिक संपत्ति मामले में डिस्चार्ज और चार्ज तय करने के चरण पर गणितीय हिसाब-किताब नहीं, केवल प्रथम दृष्टया मामला देखता है कोर्ट: इलाहाबाद हाईकोर्ट

डिस्चार्ज आवेदन पर विचार करने और आरोप (चार्ज) तय करने के स्तर पर ट्रायल कोर्ट को कथित आय से अधिक संपत्ति का गणितीय हिसाब-किताब लगाने या मिनी-ट्रायल चलाने की आवश्यकता नहीं होती है। भ्रष्टाचार के एक मामले में दाखिल आपराधिक पुनर्विचार याचिका (क्रिमिनल रिवीजन) को खारिज करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने स्पष्ट किया कि जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री के आधार पर प्रथम दृष्टया मामला और गंभीर संदेह का होना ही मुकदमे की कार्रवाई आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला राज्य सरकार द्वारा जारी 15 नवंबर 2010 के एक शासनादेश (जीओ) से शुरू हुआ था। भ्रष्टाचार निवारण विभाग से प्राप्त पत्र के आधार पर, राजस्व एवं विशेष खुफिया विभाग, लखनऊ में पी.ए. के पद पर तैनात अनूप कुमार श्रीवास्तव के खिलाफ खुली जांच के आदेश दिए गए थे। प्रारंभिक जांच में उनकी आय के ज्ञात स्रोतों (10,89,199 रुपये) और पाई गई संपत्तियों (13,24,450 रुपये) के बीच 3,16,341 रुपये का अंतर पाया गया था।

इसके बाद, 20 जनवरी 2012 को लखनऊ के हजरतगंज थाने में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(ई) सहपठित धारा 13(2) के तहत अपराध संख्या 24/2012 दर्ज की गई। 1 अप्रैल 2004 से 31 दिसंबर 2004 की जांच अवधि (चेक पीरियड) के लिए भ्रष्टाचार निवारण विभाग ने 28 मार्च 2017 को अपनी जांच रिपोर्ट सौंपी। इसमें अंतर की राशि को घटाकर 1,69,815 रुपये कर दिया गया, जिसमें कुल आय 10,89,199 रुपये और कुल खर्च/आय का मूल्यांकन 12,59,014 रुपये किया गया। 9 अगस्त 2018 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19 के तहत अभियोजन स्वीकृति प्रदान की गई।

आरोपी ने विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम), कोर्ट नंबर 1, लखनऊ के समक्ष दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 239 के तहत डिस्चार्ज आवेदन दायर किया, जिसे 19 मार्च 2026 को खारिज कर दिया गया। इस आदेश से व्यथित होकर याचिकाकर्ता ने सीआरपीसी की धारा 401 / भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 442 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षों की बहस

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील श्री श्रेष्ठ श्रीवास्तव, सुश्री सारिका मित्तल, अवधेश कुमार वर्मा, तृषा पांडेय और राधिका सिंह ने तर्क दिया कि दिसंबर 2004 में जांच अवधि समाप्त होने और 2012 में एफआईआर दर्ज होने के बीच लगभग आठ साल की अकारण देरी हुई है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि अभियोजन पक्ष “आय के ज्ञात स्रोतों” को सही ढंग से साबित करने में विफल रहा और अभियोजन स्वीकृति देने वाले प्राधिकारी ने बिना विचार किए एक गैर-बोलता (non-speaking) आदेश पारित कर दिया। वकीलों ने इसके समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय सी.एस. कृष्णमूर्ति बनाम कर्नाटक राज्य (2005) का हवाला दिया।

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याचिकाकर्ता के वकीलों ने यह भी कहा कि मित्रों और रिश्तेदारों से लिए गए 45,00,000 रुपये के ऋण, 2025 में आईडीबीआई बैंक से लिए गए गृह ऋण और हिंदू अविभाजित परिवार (एचयूएफ) की संपत्तियों को गलत तरीके से आरोपी की व्यक्तिगत आय मान लिया गया। उन्होंने दलील दी कि एफआईआर में दर्शाई गई 3,16,341 रुपये की विसंगति का चार्जशीट में घटकर 1,69,815 रुपये रह जाना ही अभियोजन के मामले की कमियों को उजागर करता है।

इसके विपरीत, राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व करते हुए अपर शासकीय अधिवक्ता (एजीए) ने कहा कि आरोप तय करने के चरण में ट्रायल कोर्ट से गणितीय हिसाब-किताब लगाने या सबूतों की विस्तृत जांच करने की उम्मीद नहीं की जाती है। राज्य ने तर्क दिया कि अंतर की राशि का कम होना या कुल आय का छोटा हिस्सा होना डिस्चार्ज का आधार नहीं बन सकता, जब आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद हो।

कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी निष्कर्ष

हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(ई) और 13(2) (2018 संशोधन से पूर्व) के वैधानिक प्रावधानों और सीआरपीसी की धारा 239 के दायरे पर स्थापित नज़ीरों का पुनरावलोकन किया।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले स्टेट ऑफ तमिलनाडु बनाम आर. सोंदिररासू (2023) का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने रेखांकित किया कि एक बार अभियोजन पक्ष द्वारा आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति साबित कर दिए जाने पर, धारा 13(1)(ई) के तहत संपत्तियों का संतोषजनक हिसाब देने की जिम्मेदारी आरोपी पर होती है। कोर्ट ने आर. सोंदिररासू मामले से यह टिप्पणी उद्धृत की:

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“धारा 13(1)(ई) आपराधिक न्यायशास्त्र के इस सिद्धांत से अलग हटती है कि आरोपी पर लगाए गए अपराध के घटकों को साबित करने का भार हमेशा अभियोजन पक्ष पर होगा और यह भार आरोपी पर अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए कभी स्थानांतरित नहीं होता। धारा 13(1)(ई) का कानूनी प्रभाव यह है कि अभियोजन पक्ष को यह स्थापित करना होता है कि आरोपी के पास उसकी आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति थी, लेकिन ‘आय के ज्ञात स्रोत’ शब्द का अर्थ अभियोजन पक्ष को ज्ञात स्रोतों से है, न कि उन स्रोतों से जो केवल आरोपी को ज्ञात या उसकी जानकारी में हों। अपने पास मौजूद धन या संपत्तियों का संतोषजनक हिसाब देना आरोपी का काम है। इस संबंध में संतोषजनक स्पष्टीकरण देने का दायित्व आरोपी पर ही है। आरोपी दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 239 के चरण में इस दायित्व को निभाने का प्रयास नहीं कर सकता। धारा 239 के स्तर पर कोर्ट को केवल प्रथम दृष्टया मामला देखना होता है और यह तय करना होता है कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत मामला बेबुनियाद तो नहीं है।”

कोर्ट ने सेंच्युरी स्पिनिंग एंड मैन्युफैक्चरिंग कंपनी लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य (1972) का भी उल्लेख किया और नोट किया कि यद्यपि कोर्ट को यह तय करने के लिए अपना न्यायिक दिमाग लगाना चाहिए कि अपराध का अनुमान लगाने का आधार है या नहीं:

“यह नहीं कहा जा सकता कि आरोप तय करने के चरण में कोर्ट को यह विचार करने के लिए अपना न्यायिक दिमाग नहीं लगाना है कि आरोपी द्वारा अपराध किए जाने का अनुमान लगाने का कोई आधार है या नहीं। आरोप तय करने का आदेश व्यक्ति की स्वतंत्रता को मौलिक रूप से प्रभावित करता है और यह नहीं कहा जा सकता कि केवल इसलिए कि अभियोजन पक्ष धारा 173 के तहत संदर्भित दस्तावेजों पर भरोसा करते हुए मामला दर्ज करना उचित समझता है, कोर्ट को स्वचालित रूप से आरोप तय कर देने चाहिए। आरोप तय करने की जिम्मेदारी कोर्ट की है और उसे इस प्रश्न पर न्यायिक रूप से विचार करना होगा। रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर पूरी तरह से विचार किए बिना, उसे अभियोजन के फैसले को आंख मूंदकर स्वीकार नहीं करना चाहिए।”

इसके अलावा, अमित कपूर बनाम रमेश चंदर (2012) का हवाला देते हुए कोर्ट ने जोर दिया कि गंभीर संदेह होने पर भी आरोप तय किए जा सकते हैं। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

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“आरोप तय करने के शुरुआती चरण में, कोर्ट का सरोकार सबूत से नहीं बल्कि इस गंभीर संदेह से होता है कि आरोपी ने कोई अपराध किया है, जो मुकदमा चलाए जाने पर उसे दोषी साबित कर सकता है। कोर्ट को केवल यह देखना होता है कि रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री और तथ्य आरोपी की बेगुनाही के अनुकूल हैं या नहीं। अपराध के अंतिम सबूत का परीक्षण उस चरण में लागू नहीं होता है।”

विशिष्ट दलीलों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि जांच के दौरान अंतर की राशि का कम होना या राशि का अपेक्षाकृत छोटा होना याचिकाकर्ता को डिस्चार्ज करने का एकमात्र आधार नहीं बन सकता। कोर्ट ने पुष्टि की कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा जांच सामग्री का परीक्षण करने के बाद अभियोजन स्वीकृति वैध रूप से दी गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऋण की अनुमति, सेवा नियमों के तहत सूचना देने और एचयूएफ संपत्तियों से संबंधित प्रश्न बचाव पक्ष के विषय हैं, जिन्हें चार्ज तय करने के चरण के बजाय मुकदमे (ट्रायल) के दौरान सबूतों के माध्यम से स्थापित किया जाना चाहिए।

निर्णय

विशेष न्यायाधीश, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, लखनऊ द्वारा पारित 19 मार्च 2026 के आदेश में कोई अवैधता, अनिमितता या विकृति न पाते हुए हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: अनूप कुमार श्रीवास्तव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल रिवीजन संख्या 437 ऑफ 2026
पीठ: जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा
निर्णय की तिथि: 20 अप्रैल, 2026

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