गुजरात हाईकोर्ट ने सोमनाथ मंदिर के नीचे कथित पुरातात्विक उत्खनन का ब्योरा सार्वजनिक करने की मांग से जुड़ी याचिका पर पुनर्विचार करने से इनकार कर दिया है। शनिवार को सार्वजनिक किए गए आदेश में अदालत ने स्पष्ट किया कि समीक्षा याचिका के जरिए मूल याचिका में नए दावे नहीं जोड़े जा सकते और न ही किसी तय हो चुके मुद्दे पर दोबारा सुनवाई की जा सकती है।
मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति डी एन राय की पीठ ने महाराष्ट्र के रहने वाले डॉ. विलास तुकाराम खरात की पुनर्विचार अर्जी को खारिज कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता की गुहार पर 25 जून को लगाए गए 2 लाख रुपये के जुर्माने की राशि जमा करने के लिए चार सप्ताह की अतिरिक्त मोहलत दी है। पीठ ने चेतावनी दी कि यदि विस्तारित अवधि में जुर्माना जमा नहीं किया गया, तो इसकी वसूली भू-राजस्व के बकाया के रूप में की जाएगी।
समीक्षा याचिका के दायरे पर हाईकोर्ट का स्पष्टीकरण
पुनर्विचार याचिका में उठाए गए नए बिंदुओं का संज्ञान लेते हुए पीठ ने कहा कि समीक्षा अर्जी का इस्तेमाल मूल याचिका के दायरे को बढ़ाने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि समीक्षा के स्तर पर पेश किए गए सभी नए दावे अस्वीकार्य हैं, क्योंकि स्थापित कानूनी सिद्धांतों के तहत समीक्षा के नाम पर मामले की पुन: सुनवाई की अनुमति नहीं दी जा सकती।
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील की अस्वस्थता का हवाला देकर स्थगन की मांग की गई थी, जिसे पीठ ने अस्वीकार कर दिया। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि मूल जनहित याचिका पर बहस करने वाली अधिवक्ता रत्ना वोरा अदालत में उपस्थित थीं, लेकिन उन्होंने समीक्षा याचिका के पक्ष में तर्क प्रस्तुत करने से इनकार कर दिया।
क्या है पूरा मामला
यह समीक्षा याचिका 25 जून के उस फैसले के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें हाईकोर्ट ने डॉ. खरात की मूल जनहित याचिका को खारिज कर दिया था। उस याचिका में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) और आईआईटी गांधीनगर द्वारा सोमनाथ मंदिर के नीचे किए गए कथित पुरातात्विक सर्वेक्षण की जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की गई थी।
25 जून के आदेश में अदालत ने उक्त याचिका को पब्लिसिटी पाने का जरिया करार देते हुए कहा था कि इसका उद्देश्य श्री सोमनाथ ट्रस्ट को बेवजह के विवाद में घसीटना है। पीठ ने पाया था कि याचिकाकर्ता के दावे केवल असत्यापित सोशल मीडिया पोस्ट और समाचार पत्रों की कतरनों पर आधारित थे। इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने सूचना मांगने के लिए पहले संबंधित सक्षम प्राधिकारियों से संपर्क नहीं किया था और न ही ‘सनातन धम्म’ नामक संस्था से अपने जुड़ाव के कोई साक्ष्य प्रस्तुत किए थे।

