केवल ‘खुफिया और सुरक्षा’ संगठन ही धारा 24(4) के तहत आरटीआई छूट का दावा कर सकते हैं; लोकायुक्त पुलिस विंग पात्र नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल वही संगठन सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 की धारा 24(4) के तहत आरटीआई के दायरे से बाहर रहने का दावा कर सकते हैं, जिन्हें विशेष रूप से “खुफिया और सुरक्षा” (Intelligence and Security) कार्यों के लिए स्थापित किया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से माना कि राज्य लोकायुक्त की पुलिस विंग इस छूट की हकदार नहीं है। जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की खंडपीठ ने मध्य प्रदेश विशेष पुलिस स्थापना (SPE) द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए यह ऐतिहासिक निर्णय सुनाया। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) द्वारा 25 अगस्त 2011 को जारी उस अधिसूचना को रद्द कर दिया, जिसके जरिए लोकायुक्त की इस विंग (SPE) को आरटीआई के दायरे से बाहर रखने की कोशिश की गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला मध्य प्रदेश के कटनी जिले के माधव नगर थाने में पदस्थ तत्कालीन टाउन इंस्पेक्टर कामता प्रसाद मिश्रा (प्रतिवादी) से जुड़ा है। 11 अप्रैल 2017 को मध्य प्रदेश लोकायुक्त के विशेष पुलिस स्थापना (SPE) भोपाल ने मिश्रा के खिलाफ भ्रष्टाचार के एक मामले में ‘ट्रैप’ की कार्रवाई की थी। इसके बाद, राज्य के गृह विभाग ने 20 मई 2020 को उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत मुकदमा चलाने की मंजूरी (अभियोजन स्वीकृति) दी थी।

मिश्रा ने 1 जुलाई 2020 को एक आरटीआई आवेदन दायर कर अभियोजन की मंजूरी से संबंधित निर्णय लेने की प्रक्रिया और लोकायुक्त द्वारा उठाए गए सवालों के विवरण मांगे थे। हालांकि, SPE और बाद में राज्य सूचना आयोग ने इस आधार पर जानकारी देने से इनकार कर दिया कि मांगी गई जानकारी आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(h) के तहत छूट के दायरे में आती है।

इसके खिलाफ मिश्रा ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सूचना आयोग के फैसले को पलटते हुए कहा कि चूंकि इस मामले में जांच पूरी हो चुकी है, इसलिए जानकारी देने से रोकने के लिए धारा 8(1)(h) का हवाला नहीं दिया जा सकता। हाईकोर्ट ने आरटीआई के तहत जानकारी देने का निर्देश दिया, जिसके खिलाफ SPE ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी।

पक्षकारों की दलीलें

विशेष पुलिस स्थापना (SPE) के वकील ने दलील दी कि हाईकोर्ट का निर्देश त्रुटिपूर्ण था। उनका कहना था कि मांगी गई जानकारी का खुलासा करने से चल रही आपराधिक कार्यवाही प्रभावित हो सकती है, इसलिए धारा 8(1)(h) के तहत वे जानकारी न देने के लिए बाध्य हैं। अपीलकर्ता ने राज्य सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) की 25 अगस्त 2011 की अधिसूचना का भी पुरजोर समर्थन किया, जिसके तहत SPE को आरटीआई अधिनियम से पूरी तरह छूट दी गई थी। उनका तर्क यह भी था कि चूंकि मिश्रा ने हाईकोर्ट के समक्ष इस अधिसूचना की वैधता को चुनौती नहीं दी थी, इसलिए सुप्रीम कोर्ट में भी इस पर विचार नहीं किया जाना चाहिए।

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मध्य प्रदेश सरकार के महाधिवक्ता ने भी SPE का समर्थन करते हुए तर्क दिया कि लोकायुक्त एक वैधानिक जांच संस्था है और SPE इसकी जांच शाखा के रूप में काम करती है। संस्थागत समानता (Institutional Parity) के सिद्धांत के तहत यह अधिसूचना पूरी तरह जायज थी और जांच के शुरुआती चरणों में आरोपियों को संवेदनशील सामग्री उपलब्ध नहीं कराई जानी चाहिए।

दूसरी ओर, प्रतिवादी मिश्रा के वकील ने तर्क दिया कि मामले में जांच पूरी हो चुकी है और कोर्ट में चार्जशीट भी दाखिल की जा चुकी है, इसलिए धारा 8(1)(h) का कोई औचित्य नहीं रह जाता। अभियोजन स्वीकृति की प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी साझा करने से आगे की मुकदमेबाजी पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा।

अदालत का कानूनी विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले इस तकनीकी पहलू पर विचार किया कि क्या निचली अदालत में चुनौती न दिए जाने के बावजूद क्या वह सरकारी अधिसूचना की वैधता की जांच कर सकता है। बिहार राज्य दफादार चौकीदार पंचायत बनाम बिहार राज्य मामले के फैसले का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक अदालतों के पास अधीनस्थ कानूनों (Subordinate Legislation) की असंवैधानिकता को स्वतः संज्ञान लेकर परखने की व्यापक शक्तियां हैं, बशर्ते राज्य को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका दिया गया हो।

पूर्व के इस फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने रेखांकित किया:

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“एक रिट कोर्ट, जब वह अपने विवेक को किसी दुर्लभ और बहुत ही असाधारण मामले में अपने सामने लंबित मुद्दे से जुड़े अधीनस्थ कानून की स्पष्ट असंवैधानिकता से आहत पाता है, तो राज्य को अधीनस्थ कानून का बचाव करने का पूरा अवसर देने और उसे सुनने के बाद, ऐसे कानून की असंवैधानिकता और/या अमान्यता की घोषणा कर सकता है।”

यूनियन ऑफ इंडिया बनाम मंजूरानी रौत्रे के मामले से इस केस को अलग बताते हुए खंडपीठ ने कहा कि मध्य प्रदेश सरकार को इस अधिसूचना की वैधता के संबंध में अपनी बात रखने का पूरा और पर्याप्त अवसर प्रदान किया गया था।

आरटीआई अधिनियम की धारा 24(4) की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने पाया कि इस धारा के तहत मिलने वाली छूट केवल राज्य सरकारों द्वारा स्थापित “खुफिया और सुरक्षा” संगठनों तक ही सीमित है। कोर्ट ने आरटीआई अधिनियम की दूसरी अनुसूची का विश्लेषण किया, जिसमें प्रवर्तन निदेशालय (ED), सीमा सुरक्षा बल (BSF) और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) जैसी केंद्रीय संस्थाओं का उल्लेख है, जो सीधे तौर पर खुफिया और देश की सुरक्षा से जुड़ी हैं।

इसके विपरीत, कोर्ट ने पाया कि मध्य प्रदेश विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1947 के तहत गठित SPE का कार्यक्षेत्र बेहद सीमित है। इसका काम मुख्य रूप से भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और दंड संहिता की कुछ विशिष्ट धाराओं (जैसे धारा 409, 420 और अध्याय XVIII) के तहत आने वाले अपराधों की जांच करना है।

अदालत ने कहा कि मध्य प्रदेश लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त अधिनियम, 1981 के तहत लोकायुक्त को “खुफिया” और “सुरक्षा” से जुड़े मामलों में कोई अधिकार क्षेत्र नहीं दिया गया है। उत्तर प्रदेश लोकायुक्त के संदर्भ में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा डॉ. नूतन ठाकुर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में दिए गए इसी तरह के एक फैसले का उल्लेख करते हुए बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि SPE को किसी भी तरह से एक खुफिया और सुरक्षा संगठन के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार की विशेष पुलिस स्थापना (SPE) की अपील को खारिज कर दिया और 25 अगस्त 2011 की अधिसूचना को उस सीमा तक रद्द कर दिया जहां तक वह SPE को आरटीआई अधिनियम के दायरे से बाहर करती थी।

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कोर्ट ने अपने फैसले के अंत में स्पष्ट निष्कर्ष देते हुए कहा:

“चूंकि एसपीई को केवल 1988 के अधिनियम, दंड संहिता की धारा 409, 420 और अध्याय XVIII के तहत दंडनीय अपराधों की जांच करने का अधिकार क्षेत्र प्रदान किया गया है, इसलिए इसे 2005 के अधिनियम की धारा 24(4) के प्रयोजनों के लिए ‘खुफिया और सुरक्षा’ संगठन नहीं कहा जा सकता है। दिनांक 28.05.2011 की अधिसूचना 2005 के अधिनियम की धारा 24(4) के अनुरूप नहीं है और इस प्रकार, यह प्रकृति में अत्यधिक है।”

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को पूरी तरह बरकरार रखा जिसमें प्रतिवादी को मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उन्होंने इस अधिसूचना की वैधता की जांच केवल SPE के संदर्भ में की है, राज्य आर्थिक अपराध जांच ब्यूरो (EOW) पर इस फैसले का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और उसके संदर्भ में यह अधिसूचना पूर्ववत लागू रहेगी।

मामले का विवरण

केस टाइटल: स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट बनाम कामता प्रसाद मिश्रा और अन्य
केस नंबर: क्रिमिनल अपील संख्या 3743/2024
बेंच: जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर
तारीख: 15 जून, 2026

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